जोतहनके गाउँ जोतपुरसे सिखे पर्ना सिख्खा

जोतहनके गाउँ जोतपुरसे सिखे पर्ना सिख्खा

४३० दिन अगाडि

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१८ फागुन २०८१

माघ मनैबी

माघ मनैबी

४७९ दिन अगाडि

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२८ पुष २०८१

- लब्लिन क्यानभास बन्वा जैबी काठी कर्बी माघ मनैबी । सुंग्रा कट्बी मच्छी मर्बी माघ मनैबी ।। भक्री फोर्बी झ्वार निटर्बी माघ मनैबी ।। धुम्रु गैबी ठेङ्ग्रा बर्बी माघ मनैबी ।। कोर्बी गैजी ओ तरुल् लाग्खेन दिनभर, सन्झ्या रातके ढिक्री पर्बी माघ मनैबी ।। उठ्के बिन्हे जैबी ट्ल्वा सब लहाए, डुब्की मार्के पैंसा गर्बी माघ मनैबी ।। डाइ पार्दे ठिक्क चाउर, न्वान उरुद ट, आके निस्राऊ कहर्बी माघ मनैबी ।। छोटी छोटी जे बा ढ्वाग लागि बर्कन, हम्रे बर्का दान डर्बी माघ मनैबी ।। भर्वा टाङ्के जैबी निस्राऊ डिहे ना, छोरी चेलिक् मान ढर्बी माघ मनैबी ।। गाउँ घर घर जाके नाची खोरी कैके, रुप्या मल्किन्या से झर्बी माघ मनैबी ।। काल पुर्खा आज हम्रे कर्टी लर्का, पुस्ता पुस्ता रीति सर्बी माघ मनैबी ।।                                        दाङ

लखागिन थारु साहित्यके छैठौँ श्रृङ्खला निम्जल

लखागिन थारु साहित्यके छैठौँ श्रृङ्खला निम्जल

५०७ दिन अगाडि

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३० मंसिर २०८१

सुर्खेतके वीरेन्द्रनगर नगरपालिकामा लखागिन थारु साहित्यके छैठौँ श्रृङ्खला निम्जल बा । लखागिन थारु उत्थान मञ्च, सुर्खेतके अध्यक्ष मान बहादुर चौधरी ‘पन्ना’के  घरगोस्याइ ओ थारु युवा सभाके अध्यक्ष पवन कुमार थारुके बर्का पहुनाइम कार्यक्रम निम्जलक हो । कार्यक्रमम स्रष्टाहुकनसे आ आपन कविता, गजल, ओ मुक्तकके संगसंगे माँगर, ढुमरु गीतफे प्रस्तुत कैगिल । कार्यक्रमम कवि मान बहादुर चौधरी पन्ना, लक्ष्मण चौधरी, गिटु चौधरी, जेबी डेमनडौरा, सलिन चौधरी  लगायतके स्रष्टाहुक्र रचना वाचन कर्ल रलह । कार्यक्रमम माघम गा जिना ढुमरु गित क्रिमलाल चौधरी गैल रलह । माँगर गित मानबिर थारु गैल रलह ।  कार्यक्रमके घरगोस्या मान बहादुर चौधरी ‘पन्ना’ कल₋ भाषा साहित्य जीवनके अभिन्न पाटो हो । यम रुचि जगाइक लाग श्रृङ्खलाके सुरुवात कैगिलक हो । आपन भाषा साहित्य, कला संस्कृतिके संरक्षण करक लाग एक्कले लाग्खन किल सम्भव नैहो । सबजन जुट पर्ना हुइलक ओहर्से लौव पिँढीक युवा युवतिन जोर्ना पुलके रुपम आघ बह्राइक लाग कार्यक्रमह निरनतरता डेटि बाटि ।’  कार्यक्रमम बर्का पहुना पवन कुमार थारु कल₋ थारु भाषा साहित्य श्रृङ्खलाले लौव ओ पुरान पुस्ता जोरजिना हुइलक कारन आपन कला संस्कृति बुझना मजा प्लेटफर्म हो । उहाँ असिन मेरके कार्यक्रम सुर्खेत जिल्लाके गाउँ गाउँम फे ढर पर्ना सुझाउ डेल । वास्तवम हमार कला संस्कृतिके बल्गर पाटो भाषा हो । सुर्खेतके स्रष्टा हुकनक गीत बास, बट्कुहि प्रकाशनके लाग फे सहयोग कर्ना बटोइल ।  कार्यक्रमम समाजसेवी पुर्खा मानबिर थारु असिन कार्यक्रमले लर्कन् हौसला बहर्ना, गित बास लिख्ना अभ्यास फे हुइना हुइलक ओहर्से अहमिन ढेर युवा लर्कन जोर पर्ना सुझाव डेल । कार्यक्रमके सञ्चालन साहित्यकार जेबी डेमनडौरा कर्ल रलह ।   

असौंक डस्या कसिक मनैना ?

असौंक डस्या कसिक मनैना ?

५७६ दिन अगाडि

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२१ असोज २०८१

सामाजिक सञ्जालमे असौंक डस्या कसिक मनैना कहिके मेरमेरिक विद्वान आअपन विचार ढैटि बटाँ । इहे क्रममे डा गोपाल दहित असौंक डस्या मनैना तालिका डेले बटाँ (हेरि फोटुसंगे रहल तालिका) । इहे सिलसिलामे यहाँ दिलबहादुर थारू ओ चूर्ण चौधरी थप दुइ विद्वानके विचार ढै गैल बा । सबजे उज्जर टीका लगाई दिलबहादुर थारू  संयोजक, थारू नागरिक समाज, कैलाली  थारू समाजमे दशैंक अपने महत्व बा । सब दिनके अपन महत्व बा । मने सप्तमी, अष्टमी, नवमी ओ दशमीक कुछ ढेर महत्व बा । ओम्ने फे सबसे ढेर नवमीक महत्व बा । का करे कि नवमीक दिन हमरे पुर्खन भात डेठी अथवा कही कि नवमी हमार पुर्खनके श्राद्ध तिथी हो । बिहानके पिट्टर भात डेना ओ साँझके घरे नेउटल पितृदेउटन नाचगानासहित बिदाई कर्ना अस्रैना दिन हो ।  टबेमारे अष्टमी, नवमी अक्के डिन पर्लेसे अष्टमीहे आगे टस्कैना चाही । नवमी ओ दशमी अक्के डिन पर्लेसे दशमीहे पाछे सर्ना, टस्कैना चाही । यी साल अष्टमी ओ नवमी सँगे परल बा । टबेमारे अष्टमीहे आगे टस्कैले मजा रही । टस्कैलेसे यी साल (२०८१) हमार दशैं अइसिक रहीः  २३ गते पैनस टोपी ढोई ओ साँझके पुर्खन नेउटी  २४ गते ढिक्री चरहाई २५ गते पिट्टर भात दी  २६ गते टीका लगाई, उ फे सबजे उज्जर टीका लगाई धार्मिक मान्यता अनुसार डश्या पुजा पुजी  चूर्ण चौधरी,  केन्द्रीय कोषाध्यक्ष, थारू कल्याणकारिणी सभा  म्वार विचार म पुर्खासे मन्टी अइलक धार्मिक मान्यता, रिति थिति, चलन ओ अभ्यास म हम्र बर्का डश्याम सप्तमी के दिन ढक्या ओ पैनस्टोपी गंगाम च्वाखा कराइक लाग ढ्वाए जैठी । यी सर्वमान्य संस्थागत चलन ओ अभ्यास बा । यी बर्षक (२०८१) सप्तमी ह असोज २४ से असोज २३ म सरना सायद उपयुक्त नि हुइ । हम्र महा अष्टमी म जैह्या फे सन्झ्याख ढिक्री (कौनो थर क थारू मुर्गी फे) पुज्ना यी संस्थागत हुइल चलन, अभ्यास ओ सर्वमान्य धार्मिक मान्यता बा । ओ महानवमी म बिशेष कैख विहान ख मुर्गी पुज्ना ओ आपन पुर्खन पिट्टर डेना धार्मिक ओ संस्थागत मान्यता बा । यी वर्षके २०८१ क बर्का डश्या म महा अष्टमी ओ महा नवमी तिथि (असोज २५ गते) एक्कम मिलल बा कलसे महा अष्टमी क दिन  उहो २५ गते जो पुर्खा से चल्टी अइलक आपन तिथिम जो आपन आपन चलन, रितिथिति, अभ्यास ओ धार्मिक मान्यता अनुसार डश्या पुजा पुजी । ओ महा नवमी म कर्ना पुजा विजया दशमी असोज २६ गते क दिन शुभ साइत म कर्लसे जो टनिक धार्मिक विधि बिधान ओ महत्व हुइ कना म्वार सोच ओ बिचार बा। ओहमार २०८१ असोज २४ गतेः सप्तमीम गंगा म पैनस्टोपी धुइना । २०८१ असोज २५ गतेः महाअष्टमी म सन्झ्याक आपन आपन चलन अनुसार ढिक्री (कौनो थारू थर मुर्गी फे) पुज्ना । २०८१ असोज २६ गतेः विजया दशमी अर्थात बिजयी प्राप्त कर्लक शुभ साइत क दिन म विहान सक्कार मुर्गी पुज्ना वलि देना ओ आपन आपन पुर्खन क सम्झना म पिट्टर डेना उत्तम साइत हो । ओ यह दिन हमार बर्का डश्यक टिका के शुभ साइत रहि । संसारी गँवल्या टीका ब्यबस्थित तरिकासे उज्जर रहि ट आपन धर्म, संस्कार ओ पहिचान रही ।

आजउरा प्रतिष्ठानसे थारु भासाके ३ ठो पोस्टा प्रकाशित 

आजउरा प्रतिष्ठानसे थारु भासाके ३ ठो पोस्टा प्रकाशित 

६२९ दिन अगाडि

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३१ साउन २०८१

आदिवासी जनजाति उत्थान राष्ट्रिय प्रतिष्ठान, सानेपा, ललितपुरसे इ बरस (२०८१ सालमे) थारु भासाके ३ ठो पोस्टा प्रकाशित हुइल बा । प्रकाशित पोस्टामे भूमिका थारुके कविता संग्रह कहियासम अनागरिक, मानसिंह महतोके ललपुरीया थारुहरुको संस्कृति, भुलाई चौधरी, बुद्धसेन चौधरी ओ सियाराम चौधरीके प्रारिम्भक थारु ब्याकरणके पोस्टा निक्रल बा ।  मानसिंह महतोके ललपुरीया थारुहरुको संस्कृति पोस्टाके सिर्सक नेपाली भासामे बा । मने पोस्टा ललपुरिया थारु भासामे बा । प्रारिम्भक थारु ब्याकरण सप्तरी क्षेत्रके थारु भासामे बा । आदिवासी जनजाति उत्थान राष्ट्रिय प्रतिष्ठानसे परटेक बरस डस्याओर पोस्टा प्रकाशनके लग प्रोपोजल खुलठ । यम्ने स्रस्टालोग पाण्डुलिपि दर्ता कराइ सेक्ठा ।  प्रतिष्ठानके कोनो फेन प्रकाशन ओकर आफिससे सेंट्टिम मिलठ ।

ठुम्रारके १००औं साहित्यिक श्रृंखला प्रज्ञामे हुइना

ठुम्रारके १००औं साहित्यिक श्रृंखला प्रज्ञामे हुइना

६४५ दिन अगाडि

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१५ साउन २०८१

            ठुम्रार साहित्यिक बखेरीके ९९औं साहित्यिक श्रृंखलामे साहित्यकार मानबहादुर पन्नाहे स्वागत कैटि डा सर्वहारी, साथमे नन्दुराज चौधरी । ठुम्रार साहित्यिक बखेरीके १००औं साहित्यिक श्रृंखला नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठानके देवकोटा सभाहलमे हुइना बा ।  अइना साउन २६ गते दिनके १ बजे १००औं साहित्यिक श्रृंखला हुइना जानकारी श्रृंखलाके संयोजक थारु लेखक नेपाल संघ नेपालके केन्द्रीय अध्यक्ष डा कृष्णराज सर्वहारी डेलाँ । प्रज्ञा प्रतिष्ठान लगायत मेरमेरिक थारु संघसंस्थाके सहकार्यमे हुइना कार्यक्रमके लग कविता पठैना अर्जि कइगइल बा । १००औं साहित्यिक श्रृंखलाहे भव्य बनाइक लग डा कृष्णराज सर्वहारीके संयोजकत्वमे मूल तयारी समिति बना गइल बा । जेम्ने नन्दुराज चौधरीके संयोजनमे आर्थिक, शत्रुघन चौधरीके संयोजनमे प्रचारप्रसार, सिताराम चौधरीके संयोजनमे मञ्च व्यवस्थापनलगायट समिति बना गइल बा ।  इहिसे पहिले साहित्यकार मानबहादुर चौधरी पन्नाके बरका पुहनाइमे ठुम्रार साहित्यिक बखेरीके ९९औं साहित्यिक श्रृंखला असार २९ गटे सनिच्चरके कीर्तिपुर, पाँगास्थित बरघर रेस्टुरण्टमे निम्जल रहे ।  २०६९ साल माघ महिनासे डा सर्वहारीके नयाँबजार, कीर्तिपुरके डेराके छतसे ठुम्रार साहित्यिक बखेरी सुरु हुइलक हो । पाछे त्रिवि परिसरके बालकुमारी खाजा घर हुइटि हाल कीर्तिपुर, पाँगास्थित बरघर रेस्टुरण्टमे महिनक अन्तिम शनिच्चरके बिहानके कार्यक्रम नियमित बा । कोरोना अवधिमे कार्यक्रम बन्द रहे । बखेरीमे वाचन कइगइल रचना ‘परगा’के रुपमे पोस्टा निकार गइल बा । स्मरण रहे, थारु भसा साहित्य केन्द्रसे हरेक महिनक पहिल शनिच्चरके दिनके ललितपुर, कुपण्डोलस्थित नाइटिंगेल स्कूलमे थारु साहित्यके रचना वाचन बसघरा हुइठ । २०८१ असारसम यकर ७२ भाग निम्जल बा ।  

कहियासम अनागरिक ?

कहियासम अनागरिक ?

६४९ दिन अगाडि

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१२ साउन २०८१

इ डेसके नागरिक हुके फेन अनागरिक कहलुइया “मै” एक आदिवासी जनजाति मोर पुर्खा सालोसे जोगैटि अइलक जमिन  हिंस्रक जनावरसँगे लरके मलेरिया पचाके बइठ्वाइल बस्टि जल, जंगल, जमिनसँगे गँस्टि अइलक डोस्टि एक डिन अचानक आके टुँ ‘तँ त घोंघी खाने जात यो जल, जंगल, जमिन तेरो होइन !’ कहिके उ बस्टिसे खडेरके बुह्रान जैना बाढ्य बनाके हमार अस्तित्व मेटैलक टुँ अट्ना हलि बिस्रा ढरलो ? मोर पुर्खन्के बट्ठामे फोहाके सुन्नामे सुन्ना ठपके सौकि टिराके छुछ्छे भौकि कैके  कमैया ओ कमलह्रि बनाके हमार जमिन हडप्लक पसुहस हमरिहिन जोटैलक मै नै बिस्रैले हुँ ओ, आझ अभिन फेन हमरिहिन कमैया ओ कमलह्रि डेखुइयन  कहिया फेर्बो विभेडके चस्मा ? हुइना टे सक्कु चिज बावइ टोहार कब्जामे टुहिन टे जा कैना फेन छुट  हमार रकट, पस्ना, परिसरम लुट  हमार सपनम बजैठो बुट  मै यहाँ पहिचानके नारा घन्कैलेसे फेन कि कोच्डेठा जेल बर्सैठा लाठि खाइक परठ गोलि टुँ भर झुठ आस्वासन डेखाके मौसमहस बडलटि रठो बोलि मने अहँ नैसेक्ठो बडले टबे टे बोक्ले टो अभिन  उहे अन्यायके झोलि बह्राइटो डमन ओ विभेडके रूख्वा सुस्टाइटो स्वार्ठके बिसौनिमे आज संघर्सके लहरामे यात्रा कैटि रलक मै जबसम रहि इ जिउ नै अँटियइम बोइटि रहम जहिया फेन मोर पहिचान, अधिकार, समानटाके बिया । समानटाके बिया ।।               कहियासम अनागरिक ? (२०८१) कविता संग्रहसे