एक मुठ्ठी तोरी
१४७ दिन अगाडि
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२५ मंसिर २०८२
प्राचीन समय मे कोसल राज्य की राजधानी श्रावस्ती मे एक झुग्गी–झोपरपट्टी मे एकटा बहौत गरिब परिवार रहै छेलै। भैर दिन के कठिन परिश्रम के बाबजुद भि सन्तुलित आ पौष्टिक खाना के आभाव छेलै। चिन्ता आ परेशानी जकडल तनावपूर्ण जीवन मे एक लडकी के जनम भेलै। ओकर नाम गोतमी राखल गेलै। समय के साथ उ पैध भेलै आ बढलै। ओकर चेहरा त बहौत सुन्दर छेलै लेकिन कुपोषण आ कडा मेहनत के कारण ओकर शरीर केवल हड्डी के ढांचा मात्र रैह गेल छेलै जे उपर से चमड़ा से मडहल जेना लागै छेलै। उ बहौत भोलीभाली, अनुशासित आ मेहनती बठिनीयाँ (लडकी) छेलै। ओई टोल मे और भि गौतमी नाम के लडकी सब रहै छेलै जे हृष्टपुष्ट आ सुन्दर छेलै। अतः टोलबाला सब लेल ओकर नाम “किसा गोतमी” राइख देने छेलै।
समय के चक्र चलतै गेलै। कहै छै हर अन्हैरिया के बाद इजौरिय आबै छै। अचानक विधाता एक पल के लेल दया देखाइलकै। सुख तक पहुँचै के लेल ओकरा एक कच्चा धागा देल गेलै जेकरा हम सब कहै चियै वियाह। अट्ठारहे बच्छर के उमेर मे ओकर वियाह एक धनी घराना मे भेलै। पैहने त लागलै घर त स्वर्ग से भि सुन्दर छै, सौस ससुर बहौत दयालु छै, पति प्रेम से भरल छै, दियोर आ ननद सब मैत्रीपूर्ण छै आदि। लेकिन ई ब्यामोह कुछ बच्छर के बाद भंग हैले लाग्ले, टुटे लाग्लै। बहौत समय बितला के बाद जब ओकरा कोनो सन्तान नै भेलै तब सौस–ससुर के जीभ चोख भ्यागेलै आ नजर ठण्ढा। दियोर आ ननैद सब ओकरा उपेक्षा करे लागलै। घरबाला जेना तेना पत्नीब्रत के बोझ ढोबै छेलै। उ आपने घर मे नौकरानी से भी बदतर भ्यागेलै — एक भिन्सरे से पैहने उठनाई आ राइत बहुत देर बाद चौकी मे गिरके सुतनाई ओकर दिनचर्या भ्यागेलै।
फेन एक दिन चमत्कार भेलै। सैब आशा आ अपेक्षा के विपरित, उ गर्भबती भेलै, ओकर पेट बडहैले लाग्लै। तब एक दिन उ एक पुरा–मास पुगल बच्चा के जलम देलकै। बच्चा सुन्दर छेलै, कन्की कन्की हाथ टाँग आ सब अंङ्ग–प्रत्यङ्ग परिपूर्ण। रातोंरात घर के माहौल बदैल गेलै। मुस्कान लौट आइब गेलै, मदद के लेल हाथ बडहैले लाग्लै, मीठ–मीठ बात हैले लाग्लै। उ संसार के सत्यता देखलकै — उ मानव के रुप मे नै आनल गेल छेलै। उ या त बच्चा जन्माईबाला यन्त्र के रुप मे या त दिनो राइत फोकट मे काम करैबाला यन्त्र के रुप मे आनल गेल छेलै जेकरा मानौं प्रेम, स्नेह आ आराम के कोनो दरकार नै छेलै।
लेकिन बच्चा त ओकरे बच्चा छेलै, ओकरे कलेजा के टुकडा छेलै। बच्चा ओकरा शान्ति दै वाला, खुशी दै वाला आ सुरक्षा दै वाला अक्षय बटबृक्ष के छायाँ छेलै। अतः उ आपन सब कुछ आपन बच्चा के सौंप देलकै। दर्द से भरल हर घड़ी, अन्न से निकलल दूध के हर बूंद, आ थाकल हृदय से निकलल हर लोरी — सब कुछ ! उ आपन लाल (बेटा) के वातावरण के कौतूहलता से निहारैत देखै, ओकर अंङ्ग–प्रत्यङ्ग के चाल, डगमगावैत पहला कदम, बेझिझक खिलखिलावैत हँसी, भूख आ टट्टी पिसाब मे रोदन क्रन्दन। आपन कोंख से जन्मल औरस पुत्त देख के सालों साल से भोगल भुख प्यास के कठीन समय, अपमान आ तिरस्कार से ब्यथित क्षण आ जीवन के प्रति सम्पूर्ण वितृष्णा, कहिनो के जल्दी देह लीला समाप्त करैके उत्कट ईच्छा सैब कपूर जेना हावा मे बिला गेलै। आब त ओकरा आशा के किरण दैबाला सुरुज मिल गेल छेलै, ओकरा लोरी के गीत गवाइवाला चन्दा मिल गेल छेलै छेलै आ सारा संसार देखै वाला आँइख मिल गेल छेलै। साराशं मे उ बहौत खुश छेलै।
एक दिन कोनो परब मे लैहरा गेलै। ओते अचानक ओकर खुशी पर कोनो डायन के नजर लाइग गेलै। ओकर उपर महाविपत्ति के बज्जर गिर परलै। ओकर तीन बच्छर के बेटा के अग्हन के सर्दी के समय मे बुखार लाईग गेलै, बच्चा लगातार खोंखी करैले लागलै, बच्चा के साँस लैले कठीनाई हैले लागलै। बेचारी गोतमी घरेलु दवाई करलकै। लेकिन तेसरे दिन बच्चा खोंखी करैले बन्द कैर देलकै। बच्चा लारुबातु आ विहोश छेलै। उ बच्चा के आपन गोदी मे उठाके आँगना मे दौडे लागलै “उइठ जो बौआ रे, हमर राजा ! कतहेक सुतबिही”। उ बच्चा के कलेमचे हिलाबे डूलाबै, जुर गाल पर हाथ रगैड के गरम करै, बेचैनी मे कुल देवता के प्रार्थना करै, — लेकिन बच्चा के आँइख हमेशा के लेल बंद छेलै। ओकरा लागै जेना बच्चा त सुतल मात्र छै, अखैन उठतै आ खिलखिला के हाँइस देतै। ओकर संसार उजैर चुकल छेलै, ई बात ओकर दिल दिमाग मानै के नाम नै ल्यारहल छेलै।
आस पडोस के लोक सब हल्ला सुइन के जम्मा भेलै। उ आपन रिश्तेदार सब से गोहाइर माँगे लागलै। “कोई ओझागुणी के बोला दे। कोनो मंतर कोनो पूजापाठ — कुछो कैर के हमर बेटा के जगा दे !” एक बुजुर्ग बच्चा के देखलकै। बच्चा के धडकन जाँचलकै। नाक मे औंगरी राइख के साँस जाँचलकै। सब बन्द छेलै। ओकरो दिल टूइट गेलै। उ ब्यथित आवाज मे गौतमी के सम्झाइले कहलकै, “दैया, अब बौआ नै छौ। जीवन–चक्र सदा के लेल बन्द भ्यागेलौ।” अतेक सुइनते गौतमी के दिलके धडकन और बैढ गेलै। ओकर दिमाग सुन्न भ्यागेलै। ओकरा विक्षिप्तता के चादर लपेट लेलकै। “हमरा मद्दत करैले नै चाहै चिही। हम अपनेसे बौआ के धामी वैद्य लग ल्याजेबै। हमर बौआ ठीक भ्याजेतै।” कैह के ओइठाम से निकैल गेलै।
बेटा के आपन छाती मे साटने उ भूलभुलैयाबाला गल्ली मे दौड़ैत रहलै — निराशा आ बदहवास् के एक करिया छाँया जेना। उ गल्ली के हर केवाड मे खटखटावै, दारुण आवाज मे हर आदमी आ हर जनानी से बिन्ती करै, “कोनो दवाई दियौ, हमर बच्चा के गँहैर नीन्द से जगाईले कोनो दवा दियौ !” आदमी जनिजाइत सब ओकर गोदी मे पड़ल बच्चा के शव आ जिद्दी उम्मीद से भरल ओकर याचक आँइख के देखके मन मसोइस के रैह जाई। कोइ कहै, फलाना गल्ली मे एकटा बडका बाबा छै ओतै जो तोहर बच्चा के जीया देतौ। लोक सब के कहलहा हर नामी ओझा के पास उ गेलै, लेकिन सब के सब झूठा निकललै। बहौते पूजा पाठ आ प्रार्थना के बाद भि बच्चा नै उठलै । मरलहा व्यक्ति सिरिफ कथा–कहानी मे हुहआइतै जी उठै छै, लेकिन असल जिन्दगी मे कदापि नै। ओकर दारुण अवस्था देख के कोनो दयालु स्वयं कानैत कहलकै, “मृत्यु के अपरिहार्य सच्चाई स्वीकार कर ले, दुखिया बेटी ! होश मे या।” कोई ओकर पागलपन से डराके केवाड खिड़की सब खट से बन्द कैर लै। कुछ क्रुरुर आदमी सब लाठी देखा के, पत्थर फेक के तामस देखावैत चिल्लाबै, “भाग पागल औरत ! आपन श्राप ल्याके अइ ठाम से भाग !” लेकिन आपन मरल बच्चा के छाती से लगाके उ बेतहाशा चैलते रहलै। ओकर नंगा पाँव से पर खून बहै लागलै, साडी फाइट के चेथरी भ्यागेलै, श्रृंगार उजैर गेलै लेकिन उ मद्दत के गोहाइर माँगैले नै छोरलकै। ओकरा विश्वास छेलै कि अगला मोड़ मे कोई त हेतै जे ओकर बच्चा के नीन्द से जगा देतै, जिया देतै।
भूख, प्यास आ थकान ओकरा चकनाचूर कैर रहल छेलै मगर एक उम्मीद हृदय मे ओकरो से भि प्रबल तेज बैर रहल छेलै। एक बेरवा के उ एक बुजुर्ग के घर पहुँचलै जेकर चेहरा पर सदियों के अनुभव अंकित छेलै। उ विपदा देखलकै — निर्जीव बच्चा, महताईर के टूटल शरीर, सजल आँइख। ई देख के ओकर हृदय द्रवित भ्यागेलै। उ आपन मन मे सोचलकै, “कोनो भि मानवीय औषधी एकर बच्चा के जिया नै सकै छै मगर महान मनोचिकित्सक तथागत बुद्ध ओकर यातना–ग्रस्त विक्षिप्त चित्त के शान्ति प्रदान कैर सकै छै।” तब उ कोमल स्वर मे स्नेह के बोली बोललै, “हे कुलीन नारी, भगवान बुद्ध के शरण मे जो, महान वैद्य के पास। तोहर आवश्यक ईलाज हुन्के पास छै।”
बुद्ध के नाम सुइनते ओकर मानसपटल मे एक स्मृति के बिजली चमकलै। बहौत दिन पैहने दूरे से उ भगवान बुद्ध के शान्त आभा देखने छेलै। तखैन श्रद्धा से ओकर चित्त भावविभोर भ्यागेल छेलै। नयाँ जोश के तरंग ओकर देह मे उठलै। भगवान के आश्रम ओइ ठाम से बहौत दूर नै छेलै। उ तुरन्ते बेटा के लाश आपन गोदी मे उठाइने मूलगन्धकुटी विहार के तरफ दौडलै।
भगवान बुद्ध आपन श्रावक भिक्षु संघ के साथ एक चौकी मे बैठल छेलै। हजारौं उपासक आ उपासिका सब भगवान के सामने बैठके सुभाषित प्रवचन एकाध्यान से सुइन रहल छेलै। किसा गौतमी ओते पहुँचके सीधा भगवान बुद्ध के चरण मे गिर पड़लै आ दोनो हाथ जोइड के साँस के नियन्त्रण कैरके कल्पैत आवाज मे प्रार्थाना करलकै, “हे भगवान बुद्ध ! हमरा उ दवाई दियौ जे हमर लाल के गँहीर निन्द से जगा सके।” तथागत बुद्ध तुरन्त ओकर विक्षिप्त मनःस्थिति समझ लेलकै। हुन्कर मन मे असीम करुणा जागलै, तब मृदु स्वर मे भगवान बोललै, “अवश्य बेटी ! हमर पास मे तोहर लेल दवाई छै, लेकिन एकर असर के लेल तोरा नगर से एक मुठ्ठी तोरीके बिया भिक्षा माँइग के आनैले परतौ।”
“जी, हेतै भगवान !” बुद्ध के वाक्य पूरा है से पैहनिए खुशी आ आशा से ओतप्रोत भ्याके उ चिल्लाईले “हम तुरन्त आनै चियै !” आ उच्छैर के ठार भेलै। तोरी त सबसे सस्ता मसाला छेलै, आकेरा अनुमान छेलै कि हर घर मे उपलब्ध हेतै।
लेकिन बुद्ध ने बात पूरा नै भेल छेलै अखैन तक। “बेटी”, बुद्ध कहलकै, “शर्त ई छै कि तोरी ओकरे घर से लाबनाई छै जेकर घर मे कहियो ककरो मृत्यु नै भेल हौक।” किसा गोतमी के भगवान बुद्ध के उ शर्त के अर्थ तखन समझ मे नै एलै। अतः बुद्ध के आज्ञा स्वीकार कैर बच्चा के कोरा मे बोइक के उ दौड़ गेलै।
वस्ती मे ज्याके पहौलका घर के केवाड पर आत्मविश्वास से खटखटाइलकै। तोरी से भगवान बुद्ध ओकर बच्चा के पुनर्जीवित करतै से बात कहलकै। घरवासी ओकर दयनीय हालत देखलकै। उ घरवासी उदार आ दयालु रहै। उ बिना बहस करने कहलकै, “यदि तोरी से बच्चा पुनर्जीवित भ्यासकै छै त एक मुठ्ठी किया एक सेर (किलो) तोरी ल्याजो” कैह के एक झोला तोरी आइन के ओकर हाथ मे देलकै। किसा गौतमी सन्तुष्ठी के मुद्रा मे लौटे के घुमैले चाहलकै कि बुद्ध के दोसर शर्त याद एलै, अतः पलैट के पुछलकै, “एकटा बात पुछैले बिसैरए गेलयै, कि अहाँ के परिवार मे कहियो ककरो मृत्यु भेल छै ?”
“हँ दैया”, जवाब एलै, “कुछ महीना पैहने हमर बाबुजी के स्वर्गवास भ्यागेलै। देखही ने भरखरे क्रियाकर्म करने चियै।” किसा गोतमी मायूस भ्यागेलै। तोरी लौटाइत कहलकै, “तब त अहाँ के सहयोग कोनो काम नै करतै। हमरा त कोई नै मरल घर के तोरी चाही।”
उ सोचलकै, “पहौनका घरे दुर्भाग्यशाली निकललै। खैर कोइ बात नै, अैगला घर मे मिल जेतै कि ।”
उ दोसरो घर मे ओहिने अभ्यर्थाना करलकै। घरपट्टि बिना विवाद करने तुरन्त सहयोग करैले तयार भेलै लेकिन दोसर शर्त मे फेनो ओहिने भेलै। तोरी छेलै लेकिन ओई परिवार मे ककरो ने ककरो मृत्यु अवश्य भ्याचुकल छेलै। उ एक एक कैर के घर–घर जाइते गेलै। ककरो बाप त ककरो महताइर, ककरो बेटा त ककरो बेटी, ककरो नाइत त ककरो नातीन, ककरो बाबा त ककरो दादी, ककरो काका त ककरो काकी, ककरो भाई त ककरो बहैन, ककरो मुन्शा त ककरो घरबाली, हर घर मे काई ने कोई मरल छेलै। तेकर बाद त उ तोरी माँगनाइए छोइड़ देलकै — तोरी हर जगह छेलै — बस केवाड खटखटाके सीधा पूछै, “कि अहाँ के परिवार मे कहियो ककरो मृत्यु भेल छै ?” एहेन प्रश्न सुइन के घरधनी सब अचकचा जाई लेकिन ओकर विक्षिप्त हालत देखके दया लागै अतः बिना तामस करनै बता दै कि ओकर घर मे के मरल छै। गौतमी झट से अगला घर के केवाड खटखटाबैले चैल दै।
साँझ परैले लागलै। उ सैकडौं घर के केवाड खटखटाइलकै। तब ओकर मन मे ई बात समभल मे एलै कि मृत्यु से अछूता कोनो घर नै छै संसार मे। ओकर मन आखिरकार मानैले लागलै कि बच्चा गमावै बाली मे उ असगरे नै छै या ई घटना असामान्य नै चियै। विद्याता ओकरेटा विशेष दुख श्राप नै देने छै। ओकर बच्चा के मृत्यु के मतलब ई नै छेलै कि सृष्टि खराब भ्यागेल छै। बस ऐहना है छै कि—जेना पुलटी के तेल ओराला पर अपना आप मुझ्हा जाइ छै। नगर मे चक्कर काइट के सैयकडौं परिवार के अन्तरवार्ता लेला के बाद ई बात स्पष्ट भेलै कि अकाल मृत्यु भि बहौत हैछै। उ त ओइ तमाम शोक–संतप्त माता–पिता जे अकाले मे बच्चा गुमाइलकै तैं मे से एक छेलै। ओकरो भि वह्या करना चाही जे एक माता पिता आपन मृत बच्चा के करै छै — लाश के श्मशान मे ले ज्याके श्रद्धापूर्वक सारा गाडनाई। अखैन्यो ओकर हृदय मे दुःखी माता के ममता दर्द से तडैप रहल छेलै लेकिन अज्ञान आ तृष्णा के बोझ हैट चुकल छेलै। किसा गोतमी बेटा के मृत्यु के सत्य भित्री दिल से स्वीकार कैर लेलकै आ ममता से ओकर अंतिम यात्रा पर श्मशान ल्यागेलै।
मरल बेटा के श्मशान मे गाइर के उ आपन ब्यथित चित्त के शान्त करलकै आ ओहै मूलगन्धकुटी विहार मे लौटलै जते बुद्ध ठहरल छेलै। बुद्ध के पास पहुँचके उ श्रद्धा से पञ्चाङ्ग प्रणाम करलकै आ आपन अंग–प्रत्यङ्ग सम्हाइलके होशपूर्वक बैठ गेलै। बुद्ध त ओकर चाल ढाल आ स्मृतिजन्य ब्यवहार से जाइन गेलै कि ओकरमे आमूल परिर्वन भ्याचुकल छै फिर भि सत्यापन के लेल सस्नेह मुस्कान के साथ पुछलकै, “दैया, तोरी के बिया मिललौ ?”
गोतमी उत्तर देलकै, “नै भगवान ! तोरी त हर जगह मिल गेलै आ सब काई दैले तयार छेलै लेकिन मृत्यु से अछूता घर कतौ नै मिललै। ”
तथागत बुद्ध बोललै, “बेटी, जब हम कहलयौ कि हमर पास तोहर लेल दवाई छै त शायद तुँ सोचलही कि हम तोहर बेटा के पुर्नजीवित कैर देबौ। लेकिन साँच बात त ई छेलै कि उ दवाई तोहर बेटा के लेल नै बरु तोहर लेल छेलै। हम देख रहल चियै कि हमर दवाई असर कैर रहल छै।”
गोतमी कृतज्ञ मुद्रा मे आपन सीस झुकाइत कहलकै, “जी भगवान, आब हम हमर मोह आ राग से मुक्त भ्यागेलयै। अब हम स्पष्ट देख रहल चियै कि जरा, रोग आ मृत्यु से कोई नै बैच सकै छै। ई त हर जीव की एक तीत सच्चाई के हिस्सा चियै।”
तब भगवान बुद्ध कहलकै, “हँ बेटी, हमरा खुशी भेल कि तुँ हमर शिक्षा के प्रथम आर्य सत्य के सम्प्रजन्य अनुभूति कैर लेलही— जाति पि दुक्खा। जरा पि दुक्खा। व्याधि पि दुक्खा मरणं पि दुक्खं। अप्पियेहि संपयोगो दुक्खो। पियेहि विप्पयोगो दुक्खो। यं पिच्छं न लाभति तं पि दुक्खं। संखित्तेन पंचुपादानक्खन्धा पि दुक्खा।”
तब गोतमी कहलकै, “जी भगवान, हम गरिब परिवार मे जन्म लेलयै, सब कुछ के अभाव छेलै, कुपोषण से रोगी छेल्यै, स्वार्थी आ अप्रिय परिवार मे वियाह भेलै आ ओते विषाक्त माहौल मे कुण्ठापूर्ण जीवन बिताइले परलै, जब प्रिय बेटा जन्मलै त हम सोंचलयै हमर जियै के सहारा मिल गेलै लेकिन ओकर मृत्यु के वियोगान्त दुख मे हम पागल भेलयै। लेकिन भगवान के करुणा से आब हमरा ज्ञानचक्षु मिल गेलै आब उ दुख के विहोशी मे भोगवेटा नै करै चियै सम्प्रजन्य विष्लेषण करै चियै।”
तब भगवान बुद्ध गोतमी के साधुकार दैत कहलकै, “बहौत निमन बेटी, अब तोरा चतुर आर्य सत्य के बाँकी सत्य सिखना चाही।”
ई सुइन के गोतमी बुद्ध–संघ मे प्रवेश के अनुमति माँगलकै आ भिक्षुणी बैन गेलै। कुछ बच्छर के बाद एक साँझ आपन कुटिया मे एक दीया के लौ के देख रहल छेलै — एक हल्का–सा हवा के फूक भि ओकरा बुझा सकै छेलै। कतेक नाजुक छै जीवन के धागा, क्षणभंगुर प्रकृति के ओकरा गहरा बोध भेलै आ अर्हत्व प्राप्त भेलै। तब ओकर चित्त भगवान के चित्त के तरंग से मिल गेलै। भगवान बुद्ध के मालुम भेलै कि किसा गौतमी अर्हत्व प्राप्त कैर लेलकै। तब भगवान बुद्ध उपोसथागार मे ध्यानस्थ भिक्षु संघ के अप्रमाद के उत्साह जगाई के लेल ई खुश खबरी सूचित करलकै आ ई गाथा कहलकैः
यो च वस्ससतं जिवे, अपस्सं अमतं पदं ।
एकाहं जीवितं सेय्यो, पस्सतो अमतं पदं ।।
भावार्थः “कोनो व्यक्ति एके दिन के जीवन किया के नै जियौक लेकिन यदि उ अमरत्व (निर्वाण पद) के सक्षात्कार करै छै त ओकर जीवन कोनो मुक्ति–विमुख व्यक्ति के सौ बच्छर के जीवन से भि अधिक सार्थक छै।”
आई भि किसा गौतमी भगवान बुद्ध के प्रमुख शिष्या सब मे से एक अग्रणी मानल जाई छै जे भिक्षुणी शासन के अगाडी मात्र नै बढहाइलकै बल्कि बुद्ध शिक्षा के परम फल प्राप्त कैर के एक प्रेरणादायी श्रोत बन्लै। अन्हारिया चीर के ईजोरिया निकलबेटा करै छै।
समाप्त
सप्तरी, नेपाल, हालः साज, बाहिया, ब्राजिल
१६ नोभेम्बर २०२५