अन्डक बडला

अन्डक बडला

२४० दिन अगाडि

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२३ भदौ २०८२

जितुवाके कथाः  जितिया कथा

जितुवाके कथाः  जितिया कथा

२६१ दिन अगाडि

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२ भदौ २०८२

भुलाई चौधरी प्राचीन समयमे उत्तरी भारतीय प्रायद्वीपमे सारीवाहन नामके एकटा महाप्रतापी तथा धर्मात्मा रजा रहै । वकरा राजकुमारी मसवासी नामके एकटा बेटी रहै । मसवासी सेहो बापे समान महाधर्मात्मा रहै । जब राजकुमारी जवान भेलै त वकर बियाहले रजा राजकुमार खोजे लागलै । मगर जब यी बात राजकुमारीके थाह भेलै त राजकुमारी बियाह नै करै के प्रस्ताव राखल्कै । मसवासी कहल्कै हमरा राजमहल से बाहर एकटा कुटी बन्यादे, वहै कुटीमे हम रहबै और भगवानके भजन-भाव करैत रहबै । पहिने त रजा बेटीके प्रस्ताव सुइनके आश्चर्यचकित भेलै तथा रजा बेटीके बहौत समझैल्कै मगर जब मसवासी आपन हठ नै छोरल्कै त रजा मसवासीके इच्छे अनुसार राजमहलसे बाहर लदी किनारमे एकटा कुटी बन्या देल्कै । अकर बाद मसवासी आपन कुटीमे रहे लागलै और वहै किसिमसे आपन जीवन बिताबे लागलै । मसवासी सुरुज उगैसे पैहिने अन्हारे उठै और लदीसे अन्हारे लहायके आबै और पूजापाठमे लिन भ्या जाय । उ कोनो पुरुषके मुँह तक नै देखै । एवम् किसिमसे कुछ समय बितलै । एक दिन दुर्भाग्यबस मसवासीके उठैले अबेर भ्या गेलै जै चलते जब मसवासी लहायके नदीसे घुमलै त सुरुज उइग गेल रहै और वकर प्रकाश मसवासीके शरीर पर परलै जै कारण मसवासी गर्भवती भ्यागेलै । एक कान दुई कान बयावान । रजा जब यी बात सुनल्कै तब वकरा बड दु:ख भेलै, मगर करतै त करतै की ? रजा मन माइरके रैह गेलै ।  बहौत गाइर-माइर सहैत नौ महिनाके बाद मसवासी एकटा बालकके जन्म देल्कै । बालक बहौत बिलक्षण स्वभावके रहै । समय बितैत गेलै और बच्चा पैध हैत येलै । परोसके अन्य बालकसाथ वहो बाहर खेले जाय । लेकिन उ केहेन रहै जे कोनो बच्चाके कोनो चीजमे नै जिते दै, तहै दुवारे सब कोई वकरा अनेर्वा मात्रे नै कि जितुवा सेहो कहै । एक दिन सब छौरा सब जितुवाके हराबैले योजना बनैल्कै और योजना अनुसार अन्हरा अन्हरीके खेलके रचना केल्कै जकर शर्त रहै जे मैयाके नाम ल्याके अन्हरा-अन्हरीके घरमे ढुक और बापके नाम ल्याके घरसे बाहर हो । जितुवा सेहो खेलमे भाग लेल्कै । जितुवा मैयाके नाम ल्याके घरमे ढुकलै मगर बापके नाम ल्याके बाहर नै हेवे सकल्कै कथिले त वकरा बापके नाम जे थाह नै रहै । वकरा घरे भितरे मे रहे परलै । जितुवा मैयाके नाम ल्याके घरमे ढुकलै मगर बापके नाम ल्याके बाहर नै हेवे सकल्कै कथिले त वकरा बापके नाम जे थाह नै रहै । वकरा घरे भितरे मे रहे परलै । सब छौरा सब हाँसे और कहे देखिही हौ आब अनेर्वा घरे भितरमे रहतै । कुछ साथी सब जितुवाके घरमे ज्याके मसवासीके यी बात कहल्कै और मसवासीके बड दु:ख लागलै । मसवासी दौडके बेटा लग येलै और कहल्कै तोहर बापके नाम सुरुज चियौ तब जितुवा बापके नाम लेल्कै और अन्हरा-अन्हरीके खेलसे बाहर भेलै या आपन घर येलै ।  मगर सबके विश्वास नै है जे जितुवाके बाप सुरुज चियै । जितुवा के आपनो ने विश्वास हेवे। तै दुवारे जितुवा बापके भेटैले संकल्प केल्कै और यी प्रस्ताव महताइर लग राखल्कै जे हम बाप के उदेश करे जेबै । महताइर बहौत समझैल्कै जे बाप लग नै ज्यासकविही, तो जैरके भषम भ्या जेबही, से नै जो । मगर जब जितुवा आपन हठ नै छोरै बाला भेलै तब जितुवाके महताइर जितुवाले सिधा-सामलके व्यवस्था क्यादेल्कै और तब जितुवा सुरुज (बाप) लग जायले प्रस्थान केल्कै । कुछ दिनके यात्रा पश्चात सुरुज सोचल्कै जे जितुवा हमर आइगसे जैरके भषम भ्या जेतै, तै दुवारे सुरुज भगवान लोगके भेषमे रास्तामे जितुवाके दर्शन दैले सोचल्कै और तब सुरुज लोगके भेषमे जितुवा लग आइबके कहल्कै रे बाबु तो के चिही और कते जाय चिही ? जितुवा आपन सारा बृतान्त वै लोगके कहल्कै । तब उ लोग कहल्कै बौवा घुर, घर जो, तो नै ज्या सकविही, जैरके भषम भ्या जेबही से घुम, घर जो । मगर जब जितुवा आपन हठ नै छोरैवाला भेलै तब सुरुज कहल्कै रे बाबु हमही सुरुज चियै,  हमही तोहर बाप चियौ से तोरे खातिर हम लोगके भेषमे अते येलियौ, जो घुम, घर जो । तब जितुवा कहल्कै ठीक छै हम घर जेवै लेकिन के विश्वास करतै जे जितुवा बाप लग गेल रहै ? तब सूरुज जितुवाके आशीर्वाद देल्कै जे जो मृतभुवनमे सबके सोर क्या दिहै जे आब से जे बिबाहित जनाना जितिया व्रत अर्थात् जितुवा (जितमहान) के व्रत लेतै और निमपूर्वक ब्रत समापन करतै अर्थात् आसिन अन्हैरिया सतमी तिथि सैन दिनके लह्याके खेतै, रैब दिन अठमी तिथि पुरे उपास बैठके जितियाके कथा सुनतै या सोम दिन नमी तिथिमे विधिवत पारन करतै त वै पवैनकरनी सबके बाल-बच्चा चिरंजीवी, दीर्घायु, सफल, वीर तथा बलवान हेतै और आई से तोहर नाम जितुवा नै तोहर नाम जितमहान भेलौ, सुरुज कहल्कै ताब जितुवा बापके बातमे विश्वास क्याके घर लौटलै और सबतर यी बात सोर क्या देल्कै । कुछ दिनके बाद ठीक समय येलै और वै राज्यके सब बिबाहित जनाना सब नियम निष्ठापूर्वक जितिया ब्रत लेल्कै और सबके वै किसिमके नीक फल भेटलै और ताब से यी ब्रत जितिया ब्रतके रुपमे थारु समाजमे खौब प्रचलित भ्याके आइ थारु समाजके एकटा महान तथा महत्वपूर्ण संस्कृति बैन गेलै ।                                                                                                                          लेखक थारू भसा साहित्य केन्द्र नेपालके अध्यक्ष हुइट ।

परिणाम 

परिणाम 

२७२ दिन अगाडि

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२३ साउन २०८२

नवराज चौधरी   नवराज: शुभ-प्रभात पिताम्बर सर । अरुबेला नभ्याएपनि, जेहोस् मर्निङ वाकले चैं भेट गराउँदो रैछ । अँ सांच्ची, तपाईंको छोराको को रिजल्ट के भयो ?" पिताम्बर : "हेर्नुस् न, बाबुले ४ जिपिए त पक्कै आउँछ बाबा भन्थ्यो तर ३.८९  मात्रै पो आएछ । मेहनत पनि निकै पो गरेको थियो, बाबुले ! त्यतिका सम्झाएँ, रपनि बाबु अहिलेसम्म निराश छ । खोइ, त्यसलाई कसरी खुशी पार्नु ?" नवराज (फुर्किंदै):  "मेरो लण्ठुले त ३.१५ जिपिए ल्याएछ । त्यतिको राम्रो आउँछ भन्नेमा त्यसलाई नै विश्वास थिएन । लफंगाले परिणाम सुन्नासाथ साथीहरूलाई खुसियाली दिने भनेर,  मसंग रु. ५०००/ फूत्काइहाल्यो नि ! विराटनगर-३, मोरङ  चित्रः एआइ

खँरिया

खँरिया

२७५ दिन अगाडि

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२० साउन २०८२

माइक्रो बसक सबसे पाछेक सिटेम बैठल मै खलसियक ‘कोही नयाँबजार झर्नु छ ?’ टोंटफारे बोलले एकफाले झसक उठलुँ । केने का करे मै गाडीम अल्पटरे निन्डा जैठुँ । टपकि आइबेर टे पाँगक गाडीम सिंउरल रहुँ । पाँगा बसपार्क जो पुगा डेले रहे ।  झेंउ–झेंउ झेंउ–झेंउ कुकुर महि काटे आके । गोख्खै ! आफट छुट गैल रहे मोर टे । ‘छ दाइ !’ मै सिटेमसे बैठ्ले बैठ्ले चिल्लैलुँ ।  उँट्रे बेर मै कार्ड डेटि भाडा डेलुँ । मुस्किलले गाडी भेटैले रहुँ आझ । ‘ओहो दिदी, बेलुका ८ बजेपछि त कार्डको छुट छैन है ।’ मै २० रुप्या डेलु टे खलसिया कहल । १० रुप्या आउर ठप माँगल । एक टे मोरले भारी बिल्गाइटा दिदी कहटा । खोब ठपम १० रुप्या । ‘छैन, त्यति नै हो,’ कहिके उटर गैलुँ । खलसिया भुनभुनाइ लागल, ‘कस्तो कस्तो खालको मान्छे चढ्छ भन्या ।’   कीर्तिपुर अइना गाडी जुन सहि भिर, सिन्की ठेसलहस । साँस ओस उटमुटा जैनाहस । गाडी मनसे उटरटसम झोलपट अन्ढार हु रख्ले रहे । गोझुमनसे मोबाइल निकारके ओकरेहे जो टर्च बर्लुँ । ओहो मोर डाइक ओ संघरियनके कइके १५ मिसकल आइल रहे । कलब्याक करक खोज्लुँ । फोने नै लागल । ब्यालेन्स चेक कैलुँ टे एक रुप्या कुल नै रहे । डेरम पुगके संघरियक मोबाइल मनसे करम कलुँ ।  उहे लगत्ते डाइक फोन आइल, ‘हेलो छोट्की, टम्हे टोर भैया बट्वाइक टन रहे । यहाँ इ लवन्डा कान खा राखल । घोस्ले रहट । दिदी कहिया आइ कहिके । असौँ डसियम फेन नै अइले । कहिया अइबे छोट्की ?’  ‘ले ले डाइ, हलि अइम । अब्बा टुहि डेरम जाके फोन करम ना । अबे डगरेम बटुँ ।’ कहिके फोन ढइडेलुँ । कैसिक कहुँ डाइहे मोर ठन घरे जइना बसक भाडा कुल नै हो कहिके । डेरा पुगे लग्बो टे रोज डिन इहे भर्‍याङ उच्यइबो । केने जिन्गिक भर्‍याङ कहिया उच्याइ सेकम ? आप टे टोले मनिक कुक्कुर फेन चिन्ह रख्ला । बेन अठ्ठे छेउ छाउक घरक मनै नै चिन्ह्ठा । गाउँमन रहुँ टे भला छोट्की कहिके कोइ डेख्टि साइट बोल्कारे । बेन इहे कुक्कुर भुके लग्ठा टे कुछु पुछट्टा कि हस लागठ । यहाँ टे मनै का धरती, बडरी सब पराया लागठ ।  डेरक टरे रलक किराना पसल अभिन बन्ड नै हुइल रहे । आझ खाना बनैना पाला मोर रहे, बल्ले पो सम्झलुँ । कुछु लैजाउँ, रुप्या नै हो । इहे चाउचाउक झोर ओर खाइक परि आझ । कहलुँ, ‘अंकल एउटा वाइवाइ चाउचाउ दिनु न भेजमा ।’  ‘लिनु नानी । ड्युटीबाट आउनु भको हो ?’ उ पुछल, मै मुरि टोकैलुँ ।  मै डेरक डवार खोले नै पैले रहुँ । रुम पार्टनर संघरिया भुजा फुटेहस भरभराइ लागल, ‘नाहि छोट्की, का ताल हो इ टोहार ? न फोन उठइना हो, न टाइममे अइना हो । पहिले टे टुँ असिन नै रहो टे ? आझ फेन पाला नै आइल ?’ मै डेरक डवार खोले नै पैले रहुँ । रुम पार्टनर संघरिया भुजा फुटेहस भरभराइ लागल, ‘नाहि छोट्की, का ताल हो इ टोहार ? न फोन उठइना हो, न टाइममे अइना हो । पहिले टे टुँ असिन नै रहो टे ? आझ फेन पाला नै आइल ?’ मै कुछ नै बोल्लुँ । उ फेन बोल्ना सुरु कैल, ‘टुँ आइबेर कुछ लनहो कहिके फोन कर्लक, फोन उठइबे नै कर्लो । कुछ लेहे मै चोकसम जाउँ कलक इहे बेला पिरियड हो गइल । ठन्चे चिउरा रहे, ओहे फँक्यइलुँ । आब टे मै कुछु नै खइम, सुटम ।’ ‘नाहि, चाउचाउ लेके आइल बटुँ मै । झोरहा पकैबु, भुख्ले भर ना सुटो का ।’ झोला बिसैटि मै कलुँ, ‘काल्ह हालि घुमम्, टब टोहार मन पर्ना टमाटरके चटनि बना डेम ।’ मै चपबोर्डमन मर्चा ओ पियाज कट्ना सुरु कैलुँ ।  ‘का पटा, काल्ह फेन अस्टेक ढिल अइना टे हुइ ?’ आशा पठ्रिमन घोपट्या हुइटि कहल ।  ‘नै हुइ का आशु । यहाँ सुनो न ।’ ‘सुन्टि बटुँ जे । बट्वाइ बेर टुहिन हेरहि पर्ना हो ? निंन लाग राखल महि यहाँ ।’ ‘उहाँ टे नै, आपन चिन्हल चिन्हल मनैन किल भिट्टर बलैठाँ । हम्रे बाहरके मनै टे हेरटिक हेरटि । आज टे मोर बलटल पाला आइल । भिट्टर जाइ पैले नै रहुँ, हेरो न एकठो मनैया फोटु खिच्डेहल मोर । लुक टेस्टके लग कटि । महि टे ओकर बेहोरा मने नै परल । एकघचि पाछे डिरेक्टर बलाइल कहिके जनाइल । भिट्टर गैलुँ । महि टे खै का जे हो, कसिन अप्ठ्यार लागल । उ डिरेक्टर कहुइया का कहल पटा बा ? ‘का कहल छोट्की ?’ ‘तपाईलाई यो क्यारक्टरको लागि यङ देखिने भयो । सरि फर रोल रे ।’ कट्रा रिस उठल ।  ‘अब टुँ असिन अडिसन सडिसनमे ना जाउ का । बेन यसो मै टप्कि कलक टिचरके लग अप्लाइ करो कहि टे सेक्लुँ । आब फेन महि यम्ने रुचि नै हो कहबो...।’    एकघचिक केने का का बाट सोचके कवा गैलुँ ।  ‘हेरो, इ मनैया के जाने का सोचटा । पानी ढिक सेकल, चाउचाउ डार हालि ।’ पोकिया मनिक चाउचाउ डरलुँ । डल्बलाइ लागल टे ग्यास मनसे उटरलुँ । केने कैसिक छेउटा पकरले रहुँ । कराहि मनिक झोर टे हाँठेम फलक गैल ।  अइया डाइ रि, वाह ।  आशा मोर हाँठेम पानी उलिड डेटि कहल, ‘इ बठिन्या फेन का का सोच्के बैठठ् ।’  हाँठ भोभैटि रहे । मै कलुँ, ‘टुँ खाउ, महि नै खैनास लागठो ।’  ‘नाहि कसिन हो इ । पहिले भर महि कर लगैना । आब..., खाउ ठन्चे हुइलेसे फेन ।’  ‘लेउ लेउ, मै पाछे खैम ।’ आशा चाउचाउ खाके निन्डा गैल ।  पेटक भुखेले नाहि, सपनक भुखेले निन्डैहि नै सेक्लुँ मै । फुरेसे मोर रुम पार्टनर आशा ओ मै कट्ना ढेर आशा कैके काठमान्डु आइल रहि । मने, सोचलहस काठमान्डु कहाँ बा झे ? गाउँसे कुछ सपना बोकके काठमान्डु अउइयन हमारहस विद्यार्थीन टे आउर कर्रा बा । स्कुल पह्रबेर उ ओ मै बेस्ट फ्रेन्ड रहि । ओकरे करेले टे हो मै काठमान्डु पह्रे अइलक । यहाँ आइक लग, मोर परिवारहे मनाइक लग भारि जोरबल रहिस् आशक । राटभर सक्कु पाँजरसे करोट लेलुँ । निन्डे नै परल । इ जिन्गी सुखके करोट कहिया लि ना ?       ‘छोट्की उठो, हट लेमन पिइ संगे ।’  ‘ओहो कट्रा हालि उठ्लो ?’ ‘टुँ राटके निंडैबे नै कर्ठो टब ।’  ‘हाँ, बिहान हुइट निंन परल ।’ ‘छोट्की नै ठगके कहो टे, टुहिन का हुइल बा अज्कल ?’ ‘कुछ नै हुइल हो आशु !’ ‘हुइट हुइट अब ठगे फेन सिखसेक्लो । टोहार मिल्ना गोहि हुँ । टुँ दुःखी हुइलक मै हेरे नै सेकम ।’ लम्मा सास टन्टि कलुँ, ‘कुछ डिनके लग डाइ गाउँ बलाइटहि ।’ ‘ओसिन हे टे जाउ ना टे छोट्की ।’ मै रोइन छोइन मुह बनैटि टरे मुरि लगैलुँ ।  आशा कुछ रुप्या मोर हाँठेम ठम्हैटि कहल, ‘आजु नाइट बससे जाउ छोट्की ।’  ‘आशु टुहिन पहिलक फेन डेने बा ।’ मै लेहक मन नै कैलुँ ।   डोसरओर मुह घुमैटि आशा कहल, ‘संघरिया नै मन्ठो टे महि ? संघरिया मन्ठो कलेसे लेउ ।’ आशा ओट्ना कहटि साइट मै सुकसुक रोइ लग्लुँ ।  आशा मोरओर हेरल । बडे सजोक लगाके ढैलक मन्टेस्वरीसे पहै्रलक रुप्या मै आशक हाँठे मनसे लेलुँ । उ कहल, ‘अब्बे अट्रे बा छोट्की ३ हजार । चिन्ता ना करो, जहिया डेलेसे फेन हुइठ ।’ गोझुम एक रुप्या नैरलक बेला ओट्ना रकम मोर लग बरवार रहे । हमरे डुनु जाने उक्वार भेट कैटि रोइ लग्लि । मोर जैना डिन कहिके आशा खाना बनाइ नै डेहल । ‘छोट्की महि आज हलि पुगे परना बा ।  अप्नेहे लेके खइहो ना ।’  ‘टुँ नै खइलो ?’ मै पुछ्लुँ । ‘टिफिन बोक्ले बटुँ । हाँ, फुरे काकीहे मोर सम्झना सुनाडेहो । मजासे जइहो ना । टब चाभि भर नैबिस्राके टरक अंकलके डोकानेम छोर डेहो ना ।’  ‘हुइठ आशु ।’ हाँठ हिलैटि मै कलुँ ।   कलवा खाके, भाँडा मिसके ओ प्याकिङ कैके टरे अंकलहे चाभि डेके मै हल्लिलहे निकर गैलुँ । यहाँसे कलंकी डुइठो गाडी फेरे परठ कहिके ट्याङला फाँटके डगर नेङटि गैलुँ । संघरियक नाउँमे एकठो भिंरना झोला रहे ।  कलंकी पुग्लु टे एकठो जनेवा मोर मुहे मुहे लुग्गा कराइटेहे । ‘५ सयको दुइटा बैनी’ कहिके । हेर्लुँ टे जंघिया रहे ।  ‘२ सयमा आउँदैन आन्टी ?’  ‘कहाँ त्यति त हामीलाई पर्छ बैनी ।’ मै नेंगेहस कैलुँ । महि गोहरैटि जनेवा मोर कहल डाममे डै डेहल । छुुछ्छे जैनाले भैयक लग एकठो जंघिया किनडेलुँ घरे घल्ना ।  टिकट नैकट्लुँ । दाङक गाडी आघे पाछे फालाफाल जो रहठ । गाडी टे मनके गैल । मने, सिट महा पाछक । एकठो गाडी आइल ।  ‘बैनी कहाँसम्म ?’  ‘लमही ।’  ओट्ना कहटि साइट खलसिया महि फुस्लाइ लागल, ‘आउनुस्, बैनीको लागि राम्रो सिट छ ।’  बार्गेनिङ करट करट साह्रे बाह्र सयसम मिलैलुँ । महि मोंका ओरिक सिट चाहि कलक ओरसे पँज्रक मनैयाहे सहरवाओर कैके मै मोकाओर सिट पैले रहुँ । बैठ्लुँ टे गाडी टे झ्याङ झ्याङ आवाज निकारे लागल । सिसा कौन मेर हिले लागल । कैसिक पो निन्डैना हो । गाडी पुरान हो कहिके ओस्टे पटा मिलगैल । डट्करलक मारे फोन ओन नै करले रहुँ आइटु कहिके । डाइक मन फोन कैलुँ । काने काने भैयक बोल सुन्लु । खोब फोंहाइटेहे । डाइ कहल, ‘सुटल लर्का कुल जागगैल ।’ आशाहे फेन गाडी सिउँरलु कहिके जनैलुँ ।  मै एकघचिक का निन्डाइल रहुँ । महि पंज्रे बैठुइया मनैया छाती ओर छुए हस लागल । एकघचिक टे कुछु कना अप्ठ्यार लागल । डगर फेन बिगरलक मारे छु गैल हुइहिस सोच्लुँ । डुस्रा बेर टे डहिजरा जान बुझके पो छुवटेहे ।  मै टोट्टैटि कलुँ, ‘ओ, दाइ ! लाज लाग्दैन तपाईलाई यस्तो गर्न ?’ मनैया कुछ नै बोले सेकल ।  ‘तपाईँको घरमा दिदी बैनी छैन ?’ फेन बोल्लुँ । ओकर मुहे मनसे बलटल डुइठो शब्द निकरलिस, ‘सरि, सरि । निन्द्रामा छोइयो ।’ मै सिटे मनसे आघे जाके खलसियइ कलुँ, ‘दाइ, यो मान्छेसँग म बस्न सक्दिन ।’      खलसिया बोल्नासे आघे प्यासेन्जर केउ का, केउ का कहे लग्ला ।  ‘अलि अलि त छोइ हाल्छ नि । यस्तो मान्छेले त प्राइभेट गाडी चढ्नु नि । के खान चढ्नु पब्लिक गाडी ।’ सक्कु जाने ओकरेहे पक्षम बोले लग्ला । का करे जहिया फेन पीडितहे जो डोख लगैठा ? आज ‘भिक्टिम ब्लेम’के अर्थ बल्ले मजासे बुझ्लुँ । एक मन टे कहटेहे उटर जाउँ, औरे गाडी पकरके चलजाउँ । फेन अट्रा उटरके कहाँ जैना ? कौन ठाउँ पुगैले बा कहिके फेन पटा नै पाइटहुँ । गाडीक रफ्टारले टे मोर डिमागके रफ्टार जोरसे चलटेहे । एक मन टे कहटेहे उटर जाउँ, औरे गाडी पकरके चलजाउँ । फेन अट्रा उटरके कहाँ जैना ? कौन ठाउँ पुगैले बा कहिके फेन पटा नै पाइटहुँ । गाडीक रफ्टारले टे मोर डिमागके रफ्टार जोरसे चलटेहे । फुरे का करु का करु हुइल । बहुट कमजोर महसुस कैलुँ अपनहे । औरे उपाय फेन नैरहे । डोसुर मन कहल । पुरा भाडा टिर रख्लुँ । का करे उट्रुँ ?  केने कब निन्डा गैलुँ । बिहानके उठ्ठु टे गाडी टे नवलपरासी, डण्डा कना ठाउँमे रुकल रना, पट्टा टुटके कटि । लेउ डोसुर आफट आ गैल आब । घरे ढिल हुइ कहिके जनैलुँ । आशक मन जुन फोने नै लग्लिस् । बलटल २२–२४ घण्टा परसे गिरट पिरट डोसर रोज अढ्ढा राट अपन गाउँ पुग्लुँ ।  .......   डोसर रोज काकीसे भेट हुइल । ‘ढोक लग्लुँ काकी ।’  ‘कहिया अइले छोट्की ?’  ‘काल्ह पुग्लु राटके । जाम रहे । डग्गर कुल अको नै मजा । टस्टे गाडी बिगर गैल रहे । पट्टा टुटगैल रहिस । बरको राट पुगाइल ।’   ‘टोर बाबा कुलि लेहे गैल रहल हुइहि, ना रि छोट्की ।’  ‘राटिक २ बजे के बोलाइ काकी ? निन्डाइल हुइ कहिके नै कुछ कलुँ । बनगावाँसे नेङटि चलअइलुँ ।’   ‘अइ डाइ रि, टै टे छिटि मन अइसिन डरपोक रहिस झे । सहि मनैया हो एकलि चल आइल । लेहक टे बला लेना हो । टोर काकुहे कटे टे कुल बाइक लेके लेहे चलजैटाँ ।’  ‘काकी आब केक्रो डर ओर नै लागठ । फुरे इ समय, परिस्थिति मनैन बलगर बनाडेहठ । (एकघचि रहिके पुछ्लुँ) काकी, इ आरुक रुख्वा का करे गेंरडेलो ?’ ‘अइ छोट्की, सालो सालो फारा भर लग्ना मने सक्कु लज्र्‍या जाए । बस गेंरडेली ।’ असौँ टे मुहेम एक ओकठो खँरिया फेन नै डारे पा गैल । घरे रहुँ टे बुडि जहिया फेन खँरिया बनाडेहे । कि टो गब्डम लट्पट्वाइल कि टो केरक पटियम । खोब खाऊँ । अस्टे सोच्टि रहुँ, काकी महि डोनिया मन खँरिया नानडेहल ।  ‘ले बाबु खा उबरल टुबरल । डसियम अइबे नै कैले । माउक हस टे कहाँ बनाइ जानम ।’  ‘मिठ टे बनल बा काकी’ कहिके खाइ लग्लुँ ।  खँरिया सोझे उहज्वाके पकाइल किल रहे साडा । मोर जिन्गि हस । फुरे मोर बुडिक बनाइल खँरिया मछरियक खँरिया हस बनिस् । स्कुलिम जे हो जे खैटि तारिफ कैना । संघरियनके लग लैजाडिउँ टे कहिट, ‘टोहार बुडिक पकाइल खँरिया महा मिठ बा ।’ खँरिया लिले कुल नै पैले रहुँ । काकी पुछे लागल, ‘का कैठे बाबु कठमन्डुमे ?’ मै खँरिया लिलटि कलुँ, ‘कुछु नै काकी, उहे लोकसेवक टयारी करटुँ । कबो काल्ह नाटक फेन कैठुँ ।’ काकी कलि, ‘अइ अभिन नै निकरल ना टोर नाउँ ?’ मै खँरिया हाँठेम लेले पर फेन डोनियम ढइ डेलुँ । बिन कुछ बोलल मुरि हिलैलुँ ।  काकी कहे लागल, ‘पटा पैले बटे, मोर छाइ टे अस्टरलिया गैल बा ।’  ‘हुँ काकी फेसबुकमनसे जन्लुँ । जैना बेला एक ओकचो जनैटो टे एयरपोर्टसम पठाइ जइटुँ ।’  ‘अइ एकफाले भिसा लागगैलिस । कुली ओरसे डटकरल ।’  ‘ठिके बा काकी । छिटिम खोब कोना बोकको यस खेलैलुँ । भारि हुइल टे बिस्रा ढारल । पह्राइमे तेजे रहे । का करे गैल ना ? महि कुल एक ओक चो सल्लाह नै कैल ।’ ‘यहाँ बैठके कामे नै हो मम्मी कहल । बस, रिन ढन कुल कैके पठाडेलि ।’ ‘फुरे काकुहे नै डेखठु झे ?’ ‘अइ आलु लगाइ गैल बटाँ, ओहपारिक डिहुवा मन । पहिले अठ्ठे ठोरिक लग्गे रहे टे सन्हलान परगैलिन । अझकल टे बरको डुस जाइ परठ । टोर काकाहे मिझनि टे डेहे जाइटुहुँ । टुपलुकसे टै आ पुग्ले ।’  ‘ले टे काकी । जा टे मिझनि डेहे । मै फेन जाउँ, पाछे मजासे बट्वाब । डाइ फेन टिना बेचे गैल बा । बाबा ओ भैया डिहुवा ओर गैल बटाँ । कलुवा बनैना बा, जाइटु टे ।’  जैटि जैटि घारिमन मंडरा झुराइल डेख्लुँ, ‘काकी का करे मंडरा नै सेहेरके ढैले होउ ?’  ‘आब केउ बजैबे नै करठ । मै अइले पर कुल टोर बाबा ओ काकु डस्यम हाँठेम फटंगा परा परा मन्डरा बजाइट । टोर फुइ यस नाचिन् । मोर जुन नच्ना ढंगे नै ।’  काकी मुरिमे ढैके ढकिया मन मिझनि लैगैल । घरे पुग्लुँ टे डाइ टिना बेच्के रख्ले रहे । मै कलुँ, ‘यल हलि आ गैले डाइ ।’  कहलि, ‘कोलही गाउँ ठेन बिक गैल । लमही नै पुगे परल ।’  ‘का टिना पकाउँ डाइ ?’ ‘चउचउ ओ सोबिन बनाडे । किनके नन्ले बटुँ । उहे टोर भैया खोब रुचठ । जा छिट्नि मनसे निकारिस् ।’  हमरे छाइ डाइ अंगनम रहि । डल्ले कोडरा बोकके बारी ओर जाइटेहे । सँगसँगे एकठो लवन्डी फेन रहिस् । डुनु जाने ढोग लग्लाँ । ठोरिक डुस पुग्लाँ टे डाइहे पुछ्लु, ‘इहे हुइस जनेवा ?’ ‘हुँ...। पैनाहा उह्रारके नन्ले रहे ।’  ‘अइ डाइ रि, पैनाहा बटिस ? भक्खरिक बिल्गाइटेहे ।’  डाइ मुँह बिच्कोइलि, ‘अझकलिक लर्का पह्राइ, लिखाइ छोरो, भकाभक जनेवा नानो । लर्का इहे टे अझकल सिख्ले बटाँ ।’   ‘डाइ आझ मै खँरिया बनैम सिखाडिस् ना ?’  ‘औरे डिन बनाइस छाइ ।’ मै जिड्डी करे लग्लुँ । डाइ बारी मनसे गब्डा टुरके नानल । महि लट्पट्वाइक सिखाइल । पैनिमे उहज्वाइ डारके एघचिक परसे टेलेम फ्राइ कैलुँ ।  ‘डाइ पहिले बुडिहे डेम टब खैम ना ।’ ... छोट्की टेपरी लेले फुलरिया जाइठ । एक डोना खँरिया बुडिहे चह्राइठ ।   बुडिक माटि डेहल ठाउँमे जाके खोब रोइठ । ‘बुडि टुहि पट्ठरि परल रहे टे कट्ना खँरिया खाइक माँगिस् । उरुडके डालक् खँरिया । खा बुडि, टोर नटिन्या पहिलि बार बनैले बा । टोर नटिन्या थारु संस्कृति नै बिस्राइ ।’ डोनिया उरके बरे डुर पुग जाइठ । ओट्ठे रहल खँरिया बुडि खाइलहस लग्ठिस छोटकीहे । लमही नगरपालिका–४ छुटकी घुम्ना दाङदेउखर निवासि खिस्साकारके ‘कहियासम अनागरिक ?’ (२०८१) थारु कविटा संग्रह प्रकासिट बटिन । साभारः लवाङ्गी, अंक २, माघ २०८१  

यि रेडियो नेपाल हो....

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२९४ दिन अगाडि

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१ साउन २०८२

अघनके मैन्हा । गाउँभर ढान डवाँइ मचल बा, बरसभरिक कमाहि घर भिट्रेइना ढ्याउन्नमे सब्जने लागल बटाँ । बुधराम फेन ढान डवाइँमे लागल बा ।  जम्मा दुइएठो गोरुन्ले बुधरामके घाना अक्को नै निख्रठुइस । ऊ अक्के अक्के घरिम रहिके घाना सिमोट्टि बर्बराइठ– खै यि का ढान हो सस्सुर, निख्रबो नैकर्ना ।  आज बुधराम बहुट डंगडास बा । उ जिन्गिभर मलिक्वक् वरपर झुम्टिरहल, जिम्डरवक लग ढान डैटि रहल । मर मर कमाइल, टबो जिम्डरवैसे सापटि लेके जिन्गि बिटाइ पर्लिस । मने यि वरसके धान भिट्रेइटि बा, उ अपने घरेक डेहरिम ।  २०५७ साल साउन २ गते सरकार कमैयन् मुक्तिक् घोसना करल, बुधराम फेन मुक्ट हुइल । उहि सबसे खुसि लेहल रिन टिरे नै पर्ना हुइलिस । उ जौन जिम्डरवक घर कमैया रहे, ओहे जिम्डरवक अढिया जोटे पैले बा । मने अढिया जोटे पैना बरा मँहगा मोल चुकाइ परल बटिस उहि, छाइहे कमलह्रिया लगाके । पह्राडेम कहिके लैगैलक ओकर छाइ जिम्डवर्क छावक् खै कौन सहरमे डुठाहा भाँरा मिसटिस, उहि टे सहरके नाउँ टक पटा नै हुइस । बुधराम बहुट सुढ बा । ऊ बुधराम हो कि सुढराम हो अपनेहे छुट्याइ नै सेकठ ।  बुधराम ढान डाँइबेर जौन गोरुन्ले मालि घुमाइटा, ऊ गोरु फेन ओकर नै हुइस । जिम्डर्वक् गोरु जो हुइस, भुट्टि पर लेले बा उ । साँेचठ यि एक जोर गुँइ आपन बनाइ सेकम कलेसे ओट्ठे से गँठ् लेम । ओकर सोचाइ टब भंग हुइठिस, जब डुनु गोरु सँगसँगे हस हेगे लग्ठिस ।  ऊ हालि पैँरा उठाके डुनु हाँठेले गोरुन्के गाँरिटिर गोबर डोगठ, गोबरेम ढान किल बिल्गैठिस । बर्बराइठ– सारन् कब कब ढान पो खैठाँ । सब टुहरे खा डरबो टे हम्रे का खावि रेउ । उहे बिचेम बुधरामके जन्नि खेरहन्वम् कलवा लेके आ जैठिस् । टठियक् आढा भाट खैले रहठ कि ओकर लजर जन्निक् जिउमे पर्ठिस् । ढुंगाहा डग्गर टौन जन्नि उब्ढे गोर आइल बा । गोन्या फेन एक डु ठाउँ ढसक्के फेर्ना अर्जि कर्टि बा । ना टे नाकेम, ना कानेम कौनो गहना हो । घेँचा फेन खालि बा । बस् रंग उरल एक दुइठो चुरिया ओ माठेम सामान्य टिक्लिले फेन ओकर जन्नि जुग्नि ज्वागसे बरल बिल्गाइस । आपनहे जरजर जरजर हेरट डेख्के जुग्नि अपन ठरवैहे हकारठ– का हेरटो खाइक छोर्के, कबु नै डेखे पाइल हस । बुधराम कहठ– जुग्नि टुहि मै कबु सखु डेहे नै सेक्लुँ । यि माघेम टे टोर लग जसिक फे लावा जरावर ओ एक ना एक ठो कौनो गहना जोर डेहे परि । जन्नि कठिस– चुप्पे खाउ । सपनक् महल नाबनाउ । फे भंरागिमसे गिर रख्बो । नै चाहि महि गहना सहना । एक जोर लुगा हुइल से पुग जाइ । छाइहे टे जिम्डर्वा जरावर डेबे कर्हिस । बेन डोसर बाट मोर मनेम खेल्टि बा । जोग्नी बिच्चेम बाट रोकठ ।  –का बाट ? बुधराम मुहेँम कौरा डर्टि डर्टि पुँछठ् । –पहिले खाउ, टब बट्वइम जन्नि कठिस ।  –ले, आज मोर पेट भर गैल । आब हो गैल । (जन्निक् आगे डुठाहा भाटक् टठिया सारठ बुधराम । जन्नि एकफेरा घुँरेर घुँरेर हेर्ठिस् ओ फट्कर्ठिस्– अन्न डुठाहा छोर्वो टे अन्न सरापठ हुँ । यि ठारुन् टे मै का कहुँ । बुधराम टठियक भाटे फे आपन ओर सारठ ओ छोट लर्का हस ढेक्रिक बाट बिना सानल सुख्ले खाइ लागठ । घेँचम अँटक्के किक्लिक किक्लिक करे लागठ टे करुवक् पानि हालि हालि छँकियाइ लागठ । जन्नि ऊ डेस्य डेख्के ठिठ्ठा मारेक हँस्ठिस । पानि सटक्के बुधराम खाेंखे लागठ । खोँखि रोक्टि बुधराम पुँछठ– ले कोह टे, टोर मनेम का बाट खेल्टि बा ?     –अइ का बाट खेलि । अइना माघसे छाइहे फे बला लन्हो । खै कौन पो सहरमे हम्रहिन समझके आँसके समन्डर बहैटि बा बिचारि । (जोग्नीक अत्रा कहटि टपसे आँस चुहठिस, मने बुधरामहे जन्निक आँस फे नै छुठिस ।)  ऊ कहठ– हाँ, खोब सहजिल बा नै टे का, यि बर्डा फेन टे जिम्डर्वक हुइस जे । हर वर्डे अछोर लि टे किहिले खेटि कैना ? जुग्नि आँस पोँछटि कहठि– महि मघहा जरावर फे नैचाहि, बेन यि गोरु किन्ना उपाय करो । गाउँक डोसर जिम्डरवा अढिया लगुइया नै भेटाके ओस्हे जग्गा परटि बटिस । अपन गोरु रहिहि कलेसे उपाय लग्बे करि । असिक जुग्नि आपन टालले भाँरा सिमोटके घरेओर चल्जैठि । बुधराम बेंरि सुंगाइठ । ढुँवा हावम छोर्टि मनेम मेरमेरिक बाट खेलाइ लागठ । २०५८ मंसिर ८ गते घोराही सदरमुकाम माओवाडि कब्जा कर्ला, लडाइमे ढेर सुरच्छाकर्मि मुँला । राटिएसे घोराही नगर वरपर कर्फयु लागल बा । राट विराट ढान डैना फेन कर्रा बा । बुधरामके ढान डैना आब अक्के घाना बाँकि बटिस । ओहेसे आज डिन कलवा खवाही हुइ टे का जैसिक कैके फे ओरवइहि परि कहिके मन बनैले बा ।सुट्ना से पहिले बुधराम डम्पट्टिक बाटचिट हुइलिन । अइ कै डेहरी ढान हुइल रि सुक्निक डाइ ? –बुधराम पँुछल ।  जुग्नि कहल– चार डेहरि जम्मे टे भर्गैल बा । नै अटाके २ ठो बोरिम बा । आज डाँके टे ढैना ठाउँ नै हो । बेन्से डिनके मै एक घरि मालि घुम डेम, टुँ बजार जाके ढान ढैना बोरि किन्के लन्हो ।  बुधराम मने मने हिसाब मिलाइ लागल । डुइ डेहरी ढान बेचके कैसे नै बर्डा किने सेक्जाइ । वर्डक् भुट्टि असौ २ बोरा ढान हो । कठेक खाबि जे, २ डेहरि ढान टे खा पिके टरटिउहारमे जाँर लगाइ फेन पुग्जाइ । बाँकि बोरम रलक ढान बेच्के जन्निक जरावर टे कहुँ नै जा ।      अस्टे सोच्टि बुधराम भिन्सारे चारे बाजे घारिम से वर्डा छोरे लागल ।      जन्नि कलिस– अइ अभिन टे राटे बा । पाँच ओच टे बजे डेउ । एक घाना ढानक् लग, ओरा टे जाइ काहुन् ।     मने बुधराम नैमानल । उ कहल– आब निने खुल्गैल टे का कर्ना हो । ऊ मनपुरान बाजे टम्नेहे हाँक पर्टि गै सेक्लाँ । बेन टै फे हालि कलवा रिझाइ उठिस । वर्गडही गाउक्ँ करिब १०/१२ घरक् खेरहन्वा अक्के ठाउँमे रहे । मालि बनाके सक्कुजाने एक ठाउँमे जुृटके एकघरि बेंरि पिए लग्लाँ । मनपुरान बाजे बुधरामहे खिझ्वाइ लग्लाँ– इहे नाटिक मस्टि बाटिन् राम रे । छाइहे डुर डेस पठा डेलाँ । लौलि लौला हस राट भर नम्हरैन्हिक बौंरा बाझल हस बुढिया बुढिवा परल रठाँ । सबजाने ठिठ्ठा मारके हँस्ला । डोसर हसनपुरान काका कहलाँ– अरे बेंरि फे पिके ओराइल, आब मालि घुम्ना हो । चलि सब्जे ।  मने ठिक उहेबेला उहाँक् डृश्य अचम्म बिल्गाइल । बरे ढेर गोलिगठ्ठा सहिट पुलिस ढान डउइया किसानन् घेर सेक्ले रहिन । पुलिसनके अगुवा डिएसपि बुधरामहे छाटिम गोली डघैटी कहल– कफ्र्यु लागेको भनेको थाहा छैन ? साले थारु । बुधराम लग्लगैटि कहल– हम्र ट ढान डाँइ आइल बटि हजुर ।  डिएसपि फे कड्कल– धान दाँइ गर्न हिँड्या हो कि, कसैको घर लुट्न ? कसैको हत्या गर्न ? सब चिमचाम हो के सिट्टिमिट्टि गुम हो गैलिन । बगालके किसान चेचुराम हे हेगास मुटास लागे लग्लिस । उ बगालसे कुछ खरके लागल– ए कहाँ डिँडेको साले थारु ? रुक् । हेगास लागटा हजुर– चेचुराम बोलल ।  –के हेर्छौ केटा हो । गोली ठोक निशाना लगाऊ । यी सबका सब थारु माओवादी हुन् । कर्फयु तोड्ने ? हाम्रो निद हराम गर्ने ? असिक डिएसपिके आडेस भुइयम मजासे गिरहि नैपाइल रहे । ११ भाइ किसान एक चिहान हो गैलाँ ।  बिहान ७ बजेक समाचार फुँक्टि रहे– यो रेडियो नेपाल हो । अब समाचार सुन्नुहोस् । दाङको घोराही सदरमुकाम नजिकै बर्गडहि गाउँमा आज बिहान साढे चार बजे ११ जना माओवादी कार्यकर्ता प्रहरीसँगको भिडन्तमा मारिएका छन् । उनीहरुसँग व्यापक मात्रामा हात हतियार पनि फेला परेको छ । तिनीहरु घोराही सदरमुकाम कब्जा गर्नमा संग्लग्न रहेको बताइएको छ । बर्गडहि गाउँमे सन्नाटा छा गैल । उ समाचारहे बुधरामके जन्नि जोग्नि लगायटके डिल हिलैना रुवाइ ढुमिल बना डेहल ।  ....... साभार बिहान, २०७३  

जीवनस्तर अलिक उकास्नु पर्यो कविज्यू

जीवनस्तर अलिक उकास्नु पर्यो कविज्यू

३०० दिन अगाडि

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२६ असार २०८२

प्राडा प्राज्ञ खेमराज खनाल          शङ्कर पढिरहन्थ्यो, लेखिरहन्थ्यो । किताबहरू छापिएका थिए । पत्रपत्रिकामा लेखरचना छापिन्थे । पाठकहरू उसलाई धेरै मन पराउँथे । उसले ठुलै पुरस्कार पायो । पाठकहरूले भने, "को होला यस्तो पुरस्कार पाउने लेखक ?" धेरैले चिनेका थिएनन् । "आफ्नै गाउँठाउँमा भएको लेखक नचिन्नू ? साह्रै भएन ।" केही पाठकले गुनासो गरे । सोधीखोजी सुरु भयो । लेखकको डेरामै पुगे । सामान्य जीवनशैली, छरपस्ट किताब, सानो टेबुल, भुइँमा बसेर लेखिरहेको व्यक्ति; सबै छक्क परे । कतिपयले भने, "उहाँ त बेलुकीतिर यही बाटो हिँड्नुहुन्छ ।" कतिले विश्वास गरेनन् । भित्ताभरि सम्मानपत्र रहेछन् । एक जनाले भन्यो, "यत्रो पुरस्कार पाउनुभो । जीवनस्तर अलिक उकास्नु पर्यो कविज्यू ।" "मैले जीवनस्तरमा पुरस्कार पाएको हैन त, लेखनस्तरमा हो; त्यो अवश्य सुधार्नेछु ।" शङ्करले भन्यो ।                                                                          पिण्डेश्वर क्याम्पस, धरान-१४, सुनसरी ।  

बज्रपात

बज्रपात

३२३ दिन अगाडि

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३ असार २०८२

एक तुफानी राइत मे, एक ईसाई पादरी आपन गिरजाघर मे प्रार्थना कैर रहल छेलै । तख्निए एक गैरईसाई स्त्री ओकर पास आईब के पुछे लाग्लै,“हम ईसाई धरम नै मानै चियै । कि हमरा नरक के अनिष्ट से मुक्ति मिल सकैछै ?” पादरी वइ महिला के ध्यानपूर्वक देखल्कै आ ई कैहत उत्तर देलकै, “नै कदापि नै, ईसाई धरम के अनुसार मुक्ति केवल ओकरेटा मिलतै जेकर शरीर और आत्मा के शुद्धिकरण कैरके बपतिस्मा दीक्षा द्याल गेल्छै ।” जखिनए पादरी एहेन शब्द कहल्कै, तखिनए गिरजाघर पर आकाश से तेज गर्जना के साथ बज्जर गिरलै आ ओई गिरजाघर मे आइग लाईग गेलै । शहर के लोगसब दौडैत भागैत एलै आ वइ महिला के बचा लेलकै, महज पादरी के आग के दर्दनाक ग्रास से कोइयो नै बचा सकल्कै । ७ अक्टोवर २०१९ सप्तरी, नेपाल, हालः साज, बाहिया, ब्राजिल मूल लेखक— खलील जिब्रान