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चलाख छौरा 

चलाख छौरा 

एकटा गाममे एकटा बुरहिया छेलै । ऊ बुरहिया आदमी के मासु खाइ छेलै । बुरहिया गामे गाम भिख माङैले जाइछेलै । कनकि बचासब के देखै छेलै त बच्चा सबके फुसल्या के बोरा मे कैस के घर नेने आबै छेलै । बच्चा सब के काइट के मासु खाइ छेलै ।

एकदिन बुरहिया भिख माङैले एकटा गाम जाइ छेलै । गाम के चौरी मे एकटा १२ वरिस के ठकुवा नाम के छौरा बकरी चराइ छेलै । ऊ छौरा ठकुवा अनाथ छेलै। अनाथ भेला के कारण से ऊ गाम के सबलोक के बकरी चराइ छेलै । गाम के लोकसब ओकरा भात खाइले दैछेलै या बकरी चराइले पठाइ छेलै । 

ठकुवा के देख के ऊ बुरहिया सोचलकै यी छौरा के काइट के मासु खाइले परतै । बुरहिया कठुवा के फुसलाइले ओकर लग बैठलै । ठकुवा बकरी चराइत बगिया खाइ छेलै । गाम के लोकसब ठकुवा के बगिया जलखै देने छेलै । ठकुवा के बगिया खाइत देख बुरहिया कहलकै, बौवा रौ हमरा बर भुख लागल आइछ । हमरो देने बगिया ।

ठकुवा एकटा बगिया दैले बुरहिया दिसर हाथ अगारी बरहाइल कै । बुरहिया ठकुवा के हाथ पकैर के बोरा मे कैस लेल कै ।

ठकुवा एकटा बगिया दैले बुरहिया दिसर हाथ अगारी बरहाइल कै । बुरहिया ठकुवा के हाथ पकैर के बोरा मे कैस लेल कै । बोरा के मुह टरट्रया के बानहल कै । मुरी मे बोइक के बोरा घरदिसर आबैले लागलै । बीच पेरा मे आइबके बुरहिया के झरा लागलै । बुरहिया बोरा राइख के झरा फिरैले गेलै । 

यह्या मौका मे ठकुवा बोरा खोइल के निकैल गेलै । बोरा मे ढेका, काटकुस या बिरहनी के छत राइख के बोरा के मुह बाइन्ह देलकै । बुरहिया बोरा बोइक के घर जाइ छेलै । बुरहिया बोरा पिठ मे बोकने छेलै । बोरा भितरके काटकुस, बुरहिया के पिठ मे गरै छेलै । बिरहनी चुटचुट के बुरहिया के धरै छेलै । बिरहनी जतेक धरै ततेक बुरहिया कहै, चल ने घर । तोरा त कुटिया कुटिया काइट के खेबौ । 

बुरहिया घर पुगलै । घर पुइग के बोरा खोलल कै त देखलकै ठकुवा भाइग गेलछै । बोरा मे ढेका, काटकुस, बिरहनी के छत ढुक्या देने छै । यी देख के बुरहिया क्रोधित भेलै । 

दोसर दिन फैन ठकुवा  के पकरैले गेलै । ठकुवा बकरी चराइत बगिया खाइ छेलै । बुरहिया के ठकुवा चिन्ह गेलै । बुरहिया के आबैत देख ठकुवा गाछ मे चहैर गेलै । बुरहिया ठकुवा के गाछ मे चरहैत देख लेलकै ।  गाछ के निचा मे ज्य के बुरहिया कहै छै, बौवा रौ ! हमरा वर भुख लागल आइछ । एकटा बगिया दे न । खेबै । 

                                                                                                                            कथाकारः मुना चौधरी

बुरहिया के बात सुइन के ठकुवा कहै छै, 
तोहे ठकहि बुरहिया चिहि । हमरा पकैर के ल्या जेबहि । हम नै देबौ बगिया ।
हम नै पकैर के ल्याजेबौ बोवा रै । फुसलाइत बुरहिया कहलकै 
हम फेकके देबौ बगिया । ठकुवा कहलकै ।
फेक के फेक्यान फेक्यान गनहेतै । बौवा रौ । बुरहिया कहलकै
टाङ से देबौ बगिया । ठकुवा कहलकै
टाङ से टङ्यान ट्ङयान गनहेतै बगिया । बौवा रौ । बुरहिया कहलकै ।
ताब हाथ से देबौ बगिया । ठकुवा कहलकै
हाथ से हम नै लेबौ । हथ्यान हथ्यान गनहेतै । बुरहिया कहलकै ।
त तोहे कथि से लेबहि बगिया ? ठकुवा पुछलकै 
हमरा टिकमे बाइन्ह के दे । ताबेटा लेबौ । बुरहिया कहलकै ।

ठकुवा टिकमे बाइन्हके बुरहिया के बगिया देलकै । ठकुवा के बगिया बन्हलाहा टिक पकैर के बुरहिया बोरामे कैस लेलकै । बोरा के मुह बाइन्ह के बुरहिया घर दिसर जाइले लागलै । जाइते जाइते पेरा मे बुरहिया के मुतकि लागलै । लेकिन बुरहिया बोरा नै राखल कै । नै मुतल कै । एकेचोटी घर गेलै ।

घरमे बुरहिया के बेटी छेलै । बोरा खोइल के ठकुवा के निकालैत कहलकै, दैया गै ! हम तोहरले भैया आइन देने चियौ । भैया सङे खेलहे ।

ठकुवा बुरहिया के बेटी सङे दिनभोइर खेललकै । दोसर दिन बुरहिया बेटी के कहलकै, दैया गै ! हम करैले र  जाइ चियौ । भैया के ढेकीमे भटभट के कुइट के तिमन निन्ह के राखहे । 

बुरहिया के बात कठुवा सुइन लेलकै । बुरहिया सिकार आनैले घरसे निकललै । ओकर बेटी ढेकी मे धान कुटै छेलै । कठुवा बुरहिया के बेटी लग येलै । बुरहियाके बेटी ठकुवा के पुछलकै, भैया गै ! तोहर टीक कथिले बरीटा छौ ? 

ओकर बात सुइन के ठकुवा कहलकै, कनियेटामे हमर मैयाँ ढेकुमे हमर मुर कुइट देलक ।  ताब हमर टिक बरीटा भेलै ।

हमरो मुर ढेकी मे कुइट देन गै भैया । ताब हमर केस नम्हर हेतै । बुरहिया के बेटी कहलकै । 

बुरहिया के बेटी ढेकीके उखरी मे मुर राखलकै । ठकुवा भटकट के मुर कुइट देल कै । बुरहिया के बेटी मोइर गेलै । ठकुवा ओकर बेटी के मासु काइट के मासु, या भात निन्हलकै । 
बुरहिया छुछे हाथ घर येलै । घर येलै त बेटी के खोजल कै । ठकुवा बुरहिया के कहलकै, दैया गाम दिसर खेलैले गेलछौ ।

बुरहिया के मासु भात ठकुवा  खाइले देलकै । बुरहिया मासु भात खौम मनसे खेलकै । ख्या के कहै छै, आइके मछाह खेने चियै । चल बौवा रै ! पोखैर लहाइले । बुरहिया खैर, माइट ल्या के पोखैर लहाइले गेलै । बुरहिया सङे ठकुवो गेलै । बुरहिया पोखैर के पाट मे बैठ के खैर, माइट से मुर माजैले लागलै । ठकुवा हेलैत पोखैर के दोसर घाट चैल गेलै । दोसर घाट ज्या के बुरहिया के कहै छै, गै बुरहिया ! गै बुरहिया ! आपन बेटी के आपने खेलहि । तोरे बेटी के ढेकीमे कुइट के मासु निन्हने छेलियौ ।

यी बात सुइन के बुरहिया छाती फाइट के पोखैरेमे मोइर गेलै ।

प्रकाशित:

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