१०वा थारू साहित्य सम्मेलनके पोस्टा स्टलमे लेखक शेखर दहित (डाहिन पाँजर) ।
सक्कु अग्रजहुकन सेवा लागटु ! साहित्यके महाअभियान २०२८ साल (गोचाली आन्दोलन) से लग्ढार नेंङ्गुइयन फे अस्टक ठेस लग्टि नेङ्गल रल्ह । टब दिन राज्यसे सटावा पैल, काराबास बैठ्ल। अब्ब थारू साहित्यम लगुइयन फे आपन समुदाय, आपन कबिलनसे जो उस करावा पाइट।
साहित्यके १ दशके म्वर यात्राम ढ्यार साँसट देख्नु, हर बरस कुछ ना कुछ बहानामे बाट बाझल देख्नु। पाेर साल जन्नयावन नैहुइल, समाबेशी नैहुइल, युवन नैहुइल बाट आइल। यी बरस पुरस्कारके बाटसे अट्रा ढ्यार बाटह जो लक्षित बिल्गत। बर्तमानम ट अट्रा झेल्टि भविष्यम आउर असिन सवाल भुट बन्ख डुर्वाई।
हम्र सबके बिचारम भेद बा टब्बु फे सवाल उड्गुरैना ओ लागमेल कैक समाधान कर्ना फरक बाट हो। ढ्यार साहित्यकार यी मन्चम जोर गैल, छुट फे गैल । सायद केक्रो समय, केक्रो बिचार नैमिल्क जो हुई। टब्बु फे साहित्यम निस्वार्थ भावसे लगुइयन अभिनसम आपन रूप्या खर्च कैख पुरूवसे पच्छिउ टक ३५-४० घन्टा यात्रा कैख यी अभियानम पुगल बाट।
१ कप चाय माङ्गक ट कार्यक्रम कर परट, उ ट सबजहन पटा बा। यिह हो आब्बक थारू साहित्यके धरातल।
८वाँ सम्मेलनके पुरस्कार पउइया रामसागर दाजु पाइल पुरस्कारम थप कैख ५० हजार उल्ट डेल । असौ फे हृदयनारायण काकु पाइल पुरस्कारके राशीसे रूप्या २० हजार डेल । कह खोज्लक यी महायात्राह लिरौसि बनाइक लाग बहुट जहनके योगदान बा । यी छोट दुरीके यात्रा नै हो।
हुई सेकट काम करबेर कमिकमजोरी हुईठ, उहिन सवर्टि जैना हो । सम्पुरन कुछ चिज जै हो यी संसारम। १ कप चाय माङ्गक ट कार्यक्रम कर परट, उ ट सबजहन पटा बा। यिह हो आब्बक थारू साहित्यके धरातल। कमजोरह आउर कमजोर जिन बनाई, सक्कुजे एकगठ होक यी फँट्वा फरगर बनाई,आब बिख वमन, दन्त बझान कैख यी अमूल्य समयह सृजनशिलताम बदलि। जय गुर्वावा ।
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२२ माघ २०८२
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