दिपक चौधरी ‘असीम’
श्याम लाल कपार पकर्ले ओसरह्वाम बैठल रहे । मनमे कुछ सोंच्टि मन लेले लम्मा साँस लेहल ओ टुटल खट्यामे ‘हुस’ कैह्के सुट्गैल । ओहे समयमे जन्नि भाँरा बर्टन ढोके अइलिस् ओ कहलिस्– ‘का हुइटा हो बड्डो ? हुस कर्टि सुटटो बरा सोंच परल हस ।’
–‘अरि का हुइ ? सोंचटु कहाँ जाके पस्ना बहैना हो टे ढेर रुप्या आइ । यहाँ टे जट्रा पस्ना बहाव खैहिं भरिक् ठिक्क हुइट् । लर्कन डसैंह्या जरावर फे डेहे नै सेक्जाइठ । काल्ह ढिक्रह्वा हो सक्कु जहनके लर्का लावा लावा झुल्वा घल्हिन, हमार लर्का टे ओहे पुराने लुग्गा घलहिं । बर्का छावा टे भारि होगिल बा, समझ जाइट । छुटकि फेर जिउ जारि,’ कहटि कहटि आँखिसे आँस बहगैलिस श्याम लालके ।
श्याम लालके मनहे ढिर्खा बँढैटि जन्नि कहलिस, ‘असौं नै सेक्लि टे का पोर साल डेब टे काहुन् । टुँ छोट मन का करे कैठो ?’
–‘सालो सालो ओहे बाट कना ठिक नै हो बड्डि । लर्कन सब बाट याड रठिन । कहाँ सम झुठ झुठ बोल बोलके ठग्बे । बरु डस्या मानि ओ मै कहुँ कहुँ कमाइ जाउँ,’ कहल श्याम लाल ।
–‘लेउ लेउ चल्जिजहो, मै जसिक टसिक घर हेर डारम् । अब ढेर ना सोंचो,’ कह्टि सम्झैलिस्, श्याम लालके जन्नि ।
ओइने डस्या भलमन मनैल । डस्या फे ओराइल ।
.....
आझ श्याम लाल झोला झम्पट् लेले आनक डेस भारतमे चलल् रुप्या कमाइ ।
श्याम लाल राटडिन मेहनट कर्के पस्ना बहा बहाके भुख्ले प्यासे रैह् रैह्के कुछ रुप्या कमाइल । आउर डोसर बरस डस्या मनाइ अपन घरे आइ लागल ।
लर्कन लग भुजा गुडा ओ लावा लावा लुग्रा झोलम लेले रेलमे बैठके आइटहे ।
राटके श्याम लाल डुइठो रोटी हाँठम् लेले खाइटहे । टब्बे एकठो बज्या लग्गे आके कलिस, ‘भैया सुख्खा रोटी क्यों खा रहे हो । ए लो, आलु टमाटर कि सब्जी ।’
राटके श्याम लाल डुइठो रोटी हाँठम् लेले खाइटहे । टब्बे एकठो बज्या लग्गे आके कलिस, ‘भैया सुख्खा रोटी क्यों खा रहे हो । ए लो, आलु टमाटर कि सब्जी ।’
श्याम लालके फे सुख्ले खा नै जाइटहिस् । उ बज्यक् डेहल टिना रोटी संगे खाके सुट्गिल ।
जब श्याम लाल निडाइल, टब बज्या श्याम लालके झोला लेके डोसर डब्बम जाके बैठ्गैल । जब डोसर स्टेसन आइल, टब बज्या रेलमसे उटर गैल ।
श्याम लालके कुछ पटै नै हुइस । उ सुट्लेक सुटले बा । अपन उटर्ना स्टेसन अइलक् फे पटा नै हुइस ।
जब उ जागल टे अपनठें अपन झोला नै हुइस । एहोंर ओहोंर खोजल । आँजर पाँजरके बाजिन् पुछल । सक्कु जे पटा नहीं कैह्डेलिस । स्टेसन आइल । रेल रुकल, उ रेलमसे उटरल । अपनहे बिल्कु अन्जान ठाउँमे पाइल ।
बाजिन्से पुछल अपन उट्रना स्टेसनके नाउँ । टे बाजि कहलिस, ओ टो पिछे छुट् गया । तुम तीन टेसन आगे आ गए । आप ऐसा करो अभि एक ट्रेन आएगा । उसमे बैठ्के आप पिछे चले जाउ । उ ओस्टेक करल ओ जसिक टसिक भग्भुन्डारे भग्भुन्डार अपन घरे पुगल ।
जन्नि पुछ्लिस, खै टे झोला बा, उहाँ लर्का डसैंह्या जरावरके अस्रम् बटै ।
अट्रा बाट जन्नि पुछ्टि किल श्याम लाल रोइ लागल । रुइटि कहल, ‘मोर कमाइल रुप्या पस्ना बहे हस बह्गैल बड्डि । बजिया झोला चोरा लेहल । हमार जिन्गिम् सुख नैहो, डुख केल भरल बा । (उहे बिचेम् गिट बजे लागल)
मेहनट कर्के फराइरल उ रुप्या बह्गैल प्यारि ।
सुखके खोजिम कमाइल उ रुप्या बह्गैल प्यारि
डिन राट एक्के समझ्के भुखले प्यासे रैह् रैह्के,
एक एक पैंसा बचाइल उ रुप्या बह्गैल प्यारि ।
फेरसे ओहे हालमे सुख डुख अपन परिवार संग डस्या मनाइल श्याम लाल ।
कैलारी–२, बसौटी, कैलाली
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