लक्ष्मणकिशोर जोगेठ्वा थारु
"सावन परल सवनियाँ रे... बरसैं झिन बुँदे..।
कहिया अयहिँ नैहरवाके लोगवा कि गुरिया माने जयटुँ।"
बर्खा छेंक बियार लगाइबेर जब जब यी सजना (गीत) सुन मिलट,टब टब लौली भोजहिन् के मन अकुलाइ / छट्पटाइ लग्ठिन। गीतमे गुरिया नाउँके शब्दसे लौली दुलहनियाँके मन ओ मानसपटलमे लैहेर याद ताजा होके आ जैठिन।
गुरही कलेक गुडिया/ गुरिया(doll) परब हो। थारु जाती ओ उत्तर भारतीय हिन्दु समाज गुरिया हे सावन पञ्चमी तिथिके दिन साँझके गाउँक गौह्री तथा सहर बजारमे जुन चौकचौराहामे अस्रैठैं।पारम्परिक भेषभुषामे सँपरके छोट लौरामनै हाँठेम् सोंटा( hunter) लैके ओ लवरिया हुँक्रे जुन चिरकुटिक गुरही/ गुरहा(doll) हे सुप्लिमे लैके अैठैं। चौकमे गुरही अस्रैटिकी लर्काहुँक्रे सोंटासे गुरहीहे गरियैटिक् पिटेलग्ठैं । संगसंगे घरपरिवार ओ गाउँसमाजके रोगब्याधि ओ दुखडलिड्डर दुर लैजा कठैं। यिहे समयमे घरघरसे पर्सादके रुपमे नन्लेक "घुघरी"/ गुडा, भुजाहे सक्कुहुन् बाँट जाइठ।
गुरिया/ गुरही क दिन सक्कारे घरेक देउदुर्गन् के पाटा निप्ना,दीया बर्ना, छाँक ढर्कैना कै जाइठ। साँझके जिटासे आइल सुरिक सिकार,घोंघी, गेंगटाक् टिना , मुर्गा मच्छिक् टिना ओ कोँहरी पतोस्नी, गब्दक पतियक खँरिया जैसिन टिनाटाँवन निंढ पका जाइठ। ओस्टहँके खुर्मा,टेल्हा रोटी ओ अण्डिक् बरिया फे बिशेष रुपसे पका जाइठ। नेउटल अपन भोजही चेलीबेटी लग्घेक नातपाँतहे संगे सपरिवार गुरियक् सामा करल जाँर, दारु ओ मेरमेराइक पकवानसे खानपिन चलट। थारु लोकगीत ओ परम्परागत बाद्यवादन से सारा गाउँ गुञ्जायमान हो जाइठ।

मनो, थारु शब्दावली मे गुर्हन्याँ (dragon fly) फे गुरही कहिके अर्थ लग्ना हुइलेक ओरसे कतिपय थारु अभियन्ता ओ अगुवा हुँक्रे गुरिया पर्व हे फरक तरिकासे मनाइल बिल्गाइठ। हुइना टो गुरही जीव गर्मी ओ साहबर्खा छेंकमे भुस्की,मच्छरहे खाके भैंसगोरु ओ मनैन राहत डेहुवैठैं। यी समयमे गुरही सावनमे आहाराके खोजीमे अत्यधिक फे डेखा पर्ठैं। ओहेसे, यिहे गुरही/ गुर्हन्याँहे यैनके पर्व मानके गुरिया पर्वसे जोरके परिभाषित फे कर्टि आइल बिल्गाइट। जेकर कारण हाल धनगढी के क्याम्पस चौक मे गुर्हन्याँ ( dragon fly) के मूर्ति स्थापना कै सेकल अवस्था फे बा।
आज लावा पिंढीके थारु ओ युवा हुँक्रे गुरही कलेक dragon fly के टिहुवार कना मानके गुरहीक् फोंटुहे टाँगके व्यापक पर्चार पर्सार कर्टि जाइटैं। जौन कि गुरही पर्वके वास्तविकता से दुर हुइटी जाइटैं। कहना यी चाही कि धनगढी या कौनो गुरही चौकमे गुरिया/ गुडिया (doll) असराइ जैना कार्यक्रम बा।
कार्यक्रम के नाउँमे थारुन् के धार्मिक / साँस्कृतिक रितिरिवाजमे भारी प्रहार शुरु हो गैल बा। सँस्कृति हस्तान्तरण ओ पुस्तरान्तरण के नाँउमे बिकृति फैलैना काम हुइटा। यिहिन रोकके वास्तविक ऐतिहासिक कथावस्तु,पुरान आख्यान मे आधारित गुरही पर्व मनैना जरुरी बा। थारु अगुवा, बुद्धिजीवी,सँस्कृतिविद् ओ कलाकार ओ संघसँस्था हुँक्रे गँहिरसे अध्य्यन अनुसन्धान कैके तथ्यमे आधारित गुरही /गुडिया हे समाजमे पस्कना बहुत जरुरी बा। नि टो एकठो थारु कहकुट, "सामा ना जामा कँटियाले बेगारी" कहेहस् जबरजस्ती सँस्कृति ढकेलेहस् हो जाइ।
अन्टमे, गुरही/ गुरिया पर्व २२०८२ के सक्कु जहन् ढेउर ढेउर धुमधाम शुभकामना ।
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