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मातुभूमि

मातुभूमि

                                                                                                                                स्केचः बासु क्षितिज

हम आपन मातुभूमि से प्रेम करै चियै
लेकिन अजीब छै हमर प्रेम

जेकरा हमर बुद्धि कहियो भेद नै सकै छै ।
नै बलिदान के खून से किनल गौरव
नै गर्व से भरल भरोसा के शकुन 
आ नै सतजुग से चलल कोनो परम्परा
प्रज्वलित करै छै हमर भितर 
कोनो सुखद सपना के ।
लेकिन माया करै चियै मातुभूमि के, कथिले? 
हमरा खूद नै छै मालुम,
गरम तराई के उ जूर जूनेली शान्ति
चैत के पुवैरया हावा मे
हरिहर भरिहर झुमैत चारकोसे झाडी
धान गहुँ आ मौरवा के लहलहाईत बाली
हिमाल से निकलल समुन्दर जेना ढेह फोरैत
कोशी गण्डकी कर्णाली आ महाकाली
गाम के डगहर मे बैलगाडी के सवारी
कारी अन्हैरया राइत मे आँइख निराइर के
प्रियसी के याद मे डगहर के ढेंग मे बैठ के
गाम के टिमटिमाइत पुलटी के ईज्जोत देख के 
आह भरनाई कंपकपाईनाई पसन्द छै।
पसन्द छै हमरा गुहाली के घुर से उठैत धुआँ,
गाडीवाना बच्छा के घण्टी के टुनटुन आवाज ।
खोरिया के मकई के खेत मे
बर–पिपर के उ एक जोडी विहङ्गम गाछ
हमरा बहौत पसन्द छै ।
नाम विहीन खुशी के साथ
ढेकी मे कुटैत गदरी च्युरा के खुश्बु
मालदह आ नेगरा बम्बैया रसगर आम
अगहनी धान के ढेरी से भरल खरीहान
लेरुवा पुआर के टाल के टाल
बगरा उरै बाला उ कोरो बाला मचान
नक्काशीदार केवार आ छोटका खिडकी
पोखरा पाटन घर के बडका आँगन  
होरी खेलाइत मतवाला निर्मम
जोगी सरारा जोगी सरारा के 
ताल मे ताल मिलाईत ढोलक के थाप
चौरगर उटुँग टुटुँग ओसरा मे बैठ के
देखैले सुनैले पसन्द करै चियै
भाँगविहीन आ रंगविहीन मौन हम ।
दोसर के खुशी हमर खुशी
दोसर के गम हमर गम ।।


    थारूकरण: रंजन लेखी 
सप्तरी, हालः साज, बाहिया, ब्राजिल

         Friday, August 1, 2025

Homeland

I love my motherland,
 but with a strange love!
My reason will not conquer it.
Neither glory bought with blood,
nor peace full of proud trust,
nor the cherished traditions of dark antiquity
stir in me joyful dreams.
But I love - 
why, I do not know myself -
the cold silence of her steppes,
the swaying of her boundless forests,
the spills of her rivers, like seas;
I love to ride 
along country roads in a cart and, 
with a slow glance piercing 
the shadow of the night,
to meet on the sides, 
sighing for a night's lodging,
the trembling lights of sad villages;
I love the smoke of burnt stubble, 
the wagon train spending the night
 in the steppe
and on a hill in the yellow cornfield
a pair of white birches.
With a joy unknown to many,
I see a full threshing floor,
a hut covered with straw,
a window with carved shutters;
and on a holiday,
 on a dewy evening,
I am ready to watch until midnight
a dance with stomping and whistling
to the chatter of drunken peasants.
                         

मुल कविः मिखाईल लेर्मोन्तोव (सन् १८४१)

               

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