कविताः जब चुनाव आउँछ

कविताः जब चुनाव आउँछ

१४०४ दिन अगाडि

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१४ कात्तिक २०७९

‘एक बागी’  नागरिक अगुवाको बखान

‘एक बागी’ नागरिक अगुवाको बखान

१४०५ दिन अगाडि

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१३ कात्तिक २०७९

२०७२ को त्यो दिन सम्झन्छु, खगेन्द्र सङ्ग्रौला, सिकेलाल, कृष्ण खनाल, विजयलाल कर्ण, कृष्ण हाछेथु, दीपेन्द्र झा, युग पाठकलगायत विराटनगर पुगेका थियौँ ।  हामीलाई त्यहाँ बोलाउने वा पुर्याउने विराटनगरका मित्रहरू थिए। उनीहरू मध्ये दुई जना चिनेका खुसियाली सुब्बा र राकेश मिश्रको सम्झन चाहान्छु । अरू अरु मित्रहरू त्यतिखेर नै नचिनेको र अहिले पनि। कार्यक्रमको मकसद थियो नेपालको संविधान, २०७२ जारी भयो, त्यस पछिको अवस्थाको बारेमा विमर्श गर्नु। एकदिवसीय कार्यक्रम सम्पन्न भई फर्कँदा खगेन्द्र संग्रौला दाइले भन्नु भयो, आजकल नितान्त एक्लो भएको महसुस हुन्छ । अरु त अरू मोर्निङ्वाक हिँडने मेरो साथीले पनि छोडे। म बाटाको वारि पट्टि हिँड्छु, पारिपट्टिकाले धारे हात लाएर मेरो कुरो काट्दै, सराप्दै हिँडछन्। के भएको यो, माबुहाङ सर ? म पञ्चहरूको जगजगीमा पनि यति एक्लो कहिले भएको अनुभव गरिनँ। खगेन्द्र संङ्ग्रौला जस्तो निस्वार्थी, देश र जनताको बोली बोल्नु सिवाय उसको भन्नू अरु केही थिएन र छैन। उनले भनेको कुरा के थियो भने भूईँ मुन्छे जनजाति, मधेसी, दलित, महिला, संविधानमा आँटेनन्। उनीहरूलाई बाहिर पारेर जारी गरेको संविधानको के अर्थ ? उनको अपराध जन्यबोली त्यही थियो र अहिले पनि छ। अर्थात् ०७२ को संविधानमा तत् तत् समूहले हारेको थियो, खसआर्य समुदायले जितेको भाष्य चौतर्फी बनेको थियो। खगेन्द्र दाईको कुरा सुनेर मनमा माया पनि लाग्यो। मानौ दाइलाई मर्निङ वाकमा साथी  दिन पाए हुन्थ्यो तर उनी बस्ने चाबहिलमा, म कीर्तिपुरमा। युग पाठकसित कुरो भएको पनि हो, दाइसित अलिक बाक्लो भेटघाट गरौँ न पनि भने। तर जुरेन।  दाइलाई त्यो बेला मैले भनेको बिर्सेको छुइन, ‘दाइ यो कथित नेपाली समाज कति विद्रुप र कुरुप छ भने परिवारको कुनै सदस्य, छोराछोरीलाई नै भनौँ  कुष्ठ रोगले भेट्यो भने उसलाई एकान्त जङ्गलमा बास पारेर त्याग्ने समाज हो। त्यति कुरुप परिवार र समाज हो। तपाईंले जुन कुराको पक्षमा उभिनु भयो, उनै मान्छेहरु हुन्, जो जङ्गलमा नै बास गरून् भन्ने समाज हुन, दाइ, सँधै अवस्था त्यस्तो रहन्न।’  कार्तिक १३ गते नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठानको डबली अटि नअटि भेला भएका मनुवाहरु एकसरो हेरेँ, खगेन्द्र सङ्ग्रौला दाइलाई सराप्ने मित्रहरू छन् कि भनेर । कसैलाई देखिन । उज्वल प्रसाईको एउटा ह्वाटस एपको खबर सुनेर भेला भएका मुन्छे रिटठो नबिराई गन्दा ५ सयको वरिपरि हुन पर्छ। खगेन्द्र दाइ को हुन् ? डा सविन निङ्लेकु को बखानमा, पाको जानकार, बुढोहरू सबै मरिसकेको अवस्था, युवा नयाँ पुस्ता जन्मि नसकेका वा हुर्कि नसकेको बखत पिसाचहरूले उत्पात मचाउँछन्, त्यो देखेर तिनका विरुद्ध लेख्ने खगेन्द्र सङ्ग्रौला, मैजिकल मार्कसिस्ट हुन्। सटिक विश्लेषण लाग्यो ।  खगेन्द्र सङ्ग्रौलाबारे उज्जवल प्रसाईंले लेखेको पुस्तक ‘एक वागी’को सार्वजनिकीकरण भएको आजको दिन उदघोषक गगन थापा, कमेन्टेटर डा सबिन निङ्लेकु, डा महेश मास्के, उषा श्रेष्ठ र लेखक उज्जवल प्रसाईंको विचारहरु सुनेर दिन फलदायी रहेको अनुभव गरेँ। लेखक उज्वल प्रसाई, र खगेन्द्र संग्रौलाको जय होस् ।

थारु भसाके तिन धार

थारु भसाके तिन धार

१४०५ दिन अगाडि

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१३ कात्तिक २०७९

                                                                                                                                                    फायल तस्विर नेपाल भासिक आर जातिय  विविधता के देस छेकी । नेपालके संविधान २०७२ मे १२३ टा जातके पहिचान करल छी । महज अखनतक आरना छुटल जातके पहिचन हावेके क्रम जारी रहल छी । भसा आयोगके खोजके आधारमे थप ८ रा जात फेनसे पता लगलकिस जकर चल्ते येतेकर भसाके संख्यामे बढोतरी हेथै ज्या रहल छी । उना जातके बाहुल्यतता के आधारमे थारुके जनसंख्या चौथा स्थानमे रहल छी ।  थारु भसा पुरु मेचीसे ल्याके पछिम महाकाली तक तराइके बहुत जिल्लामे बोल्थै आवि रहल छी । महज एक जघके थारुसब दोसर जघके थारुसङे बातचित करछी जन त सम्पर्क भसा नेपालीके सहयोग लेछी । यिटा दुखके बात छेकी आपने जातसङे दोसर भसाके परयोग करनाइ ?  वेह्यासे थारु भसाके विकास आर एकताके खातिर थारु कल्याण कारिणी सभा आर थारु निमाङ मेडिया मानक भसा बनावेमे आ–आपन तरिकासे पहल करिरहल छी । यिटाके खातिर बहुत जुम मिटिङ भी करी चुकलकिस । महज वोकरसियाके पहलमे जे काम हाविरहल छी, उनाके विहयाके देखलासे थारु भसाके तिन धार देखा परछी । पुरातनवादी सोच खास करिके पहेनकर सरजक आर परम्परावादी सोचमे आधारित रहल विचारवादीसवके  धारना कुन छी की थारु भसा नेपाली भसाके आधार ल्याके निखेके चाही । नेपाली वरनमलामे जतन्याँ वरन रहल छी, उनाके मान्याता देवेके चाही । जकर चल्ते अखनकर पुस्तासव जे एकटा लैया सोच ल्याके आगु बढलिस उना विचारसे फरक किसिमके धारना राखी रहल छी । थारु भसामे एकोटा बरन नै छुटेके चाही । तकरवाद तत्सम आर आगन्तुक सवदके हकमे भी वेह्या किसिमके मान्याता राखी रहल छी ।  यि किसिमके पुरातनवादी सोच आर बार्निक चस्मा लग्याके थारु  भसाके मानक बनावे लगिन कतन्याँ सहज हेती या नै हेती आवे वला समय मे थाह लागती ?  दोसर बात कुन छिकी थारु बाहेक आरना जातसव भी आपन भसा पहिचानके क्रममे आगु बढी रहल छी, ओहोना के अध्ययन करना जरुरी छी कि नै ? ओकराका आपन मौलिकताके अधार बन्याँ के उच्चारनके आधारमे आपने वरनमलामे सिमित रहल छी । वोकराका नेपालीके सवटा वरन क्यामनी सुकारे साकल्की ? हमराका आपन मौलिकता आर उच्चारनके अधारमे कुछ वरनसव छोड़िके थारु भसा निखे साकवी कि नै ?  मध्य–पुर्विया सोच मध्य–पुर्विया चिन्तनवादीसव फरक धारसे आगु बढी रहल छी । थारु भसाके वरन निर्धारन करे लगिन त्रिभुवन विश्व विद्यालयके नेतृत्वमे बरसो बरसोतक झापासे ल्याके बारा पर्सातक खोज अनुसन्धान, भासिक सर्वेक्छन, ल्याव टेस्ट, कथा रेकर्डिङ लगायत बहुत जिम्मेवारी बहन करल छी ।  वरन पहिचानसे ल्याके वरन निर्धारन, लेखन सैली, व्याकरन, सवदकोस निकाली चुकलकिस । थारु भसाके प्रचार प्रसार आर जग बरिय बनावेके खातिर बहुत जिल्लामे तालिम, लेखन अभ्यासके खातिर पतरिका परकासन आर अनौपचारिक सिछाके सुरवात लगातार अभ्यासके रुपमे करिरहल छी ।  मध्य–पुर्वियासवके सोच कुन छी की थारु भसामे अनावस्यक रुपमे नेपालीके सवटा वरन ढेरियाके भसाके बोझ नै बनावम । भसा सरल आर व्यवस्थित बनावम ।  हरेक भसाके आपने सिद्धान्त आर नियम रहछी । भसा विग्यानके अधार ल्याके आगु बढेके चल्ते आपन छेतर व्यापक रुपमे विस्तार करिलेल छी । जकर चल्ते झापासे ल्याके बारा पर्सातकके लेखनमे एकरुपता आने लतिन सफल भेल छी । पैछमा सोच खास करिके पछिम महर रहल थारुसवके सोच दुइ धारमे देखा परछी ।  राना थारु  आर डंगौरा थारु ।  अख्ने राना थारुसव हमराका थारु नै छेखिन कहिके थारुसे छुटिके जनजातिमे सुचिकृत भ्या गेल छी । यिटासे थारुसवके बहुत घटा भ्या रहल छी । क्यामकी राना थारुसे छुटलाके वाद थारुके जनसंख्या घटिरहल छी । तकरवाद छुटै जातमे सुचिकृत भेलासे वोखरुका अल्पमतमे परिये जेती । यिना बात वोखरुका मनन करिके पाछु फेनसे थारु जातिमे येवे करती यिटामे दुइ मत नै छी । अख्ने राना थारुसव भसा आयोगके नेतृत्वमे थारु व्याकरन निखेमे जुटी गेल छी ।  डंगौरा थारुसव भी वरन पहिचान करि लेलकिस । वोकरसियाके वरनमे त,थ,द,ध नै भेटलिस जन त आरना चिज मध्य–पुर्वियासङे मेल ख्या रहल छी । ह्रस्व, दिर्धके सवलमे खाली ह्रस्व निखेके अभ्यास करिरहल छी ।  अखनतक पछिम महर बहुत साहित्यिक सिर्जना भ्या गेल छी, आर कुछ समय कृष्णराज सर्वहारी जी गोरखापत्र दैनिकके थारु भसाके पृस्ठमे यिटा सैलीके अभ्यास करी चुकलकिस ।  थारु भसाके मानक बनावे लगना तिनोरो धारके एकेटा जगमे आनना जरुरी छी । वेह्यासे तिनटा धारसे जे फरक फरक विचार आवी रहल छी सव्हैके भासिक चस्मा लग्याके देखना जरुरी छी । तकरवादे बुझे साकती थारु भसा किरङके निखेके चाही ।  जव भसा फरक छी जन त वरन फरक होना स्वभाविक छी । अख्ने जे किसिमके संवाद आर पहल हावी रहल छी, सवका आपने अडानमे रहती जन त थारु भसाके मानक बनावे नै साकती ।  पुरातनवादीसवके आपन सोचमे परिवर्तन करना जरुरी छी । हरेक भसाके आपने सिद्धान्त आर नियम रहछी । जेरङ कोइ फुटबल खेलाडी खेलमे अभ्यस्त भ्या गेलाके वाद जव भलिवल खेले जेती त वे ट्याङ ल्याके मारे खोझती त कुन हेती ? वोहिरङे नेपाली निखाइमे अभ्यस्त हावेके कारनसे आर थारुके वरन निर्धारन प्रकियामे योगदान आर तालिम नै देवेके वजसे यि किसिमके दिगभ्रममे फसल छी । आव बात रहली मध्य–पुर्विया आर पैछमामे । यिना दुनोराके सोचमे बहुत समानता पेल जेछी, क्यामकी थारु भसाके विकासके खातिर एकटा निखेके सैली तयार करल छी । थारु भसा आपन मौलिक उच्चारनके अधारमे निखेके चाही । उच्चारन आर वास्तविक लवज छोडिदेलासे थारु भसा कुन महर जेती पता नै छी ।  वेह्यासे सवका आपन अडान छोडिके लैया सिरासे जानइ जरुरी छी । थारु भसाके मानक बनावे लगिन एकटा साझा लेखन सैलीके विकास करना जरुरी छी । लेखन सैलीके अधार मानिके निखलासे निखाइमे एकरुपता येती ।  तकरवाद सावदिक भिन्नताके बात रहती उना पर्यायवाची के रुपमे आपन स्थान ग्रहन करती । यि किसिमसे सुरुवात करलासे थारु मानक भसा बनावे लगिन सहज हेती । बुढीगंगा–२, बौराह, मोरङ निवासी लेखक हाल थारू आयोगके सदस्य हुइट

कविताः छोरीको बाउ

कविताः छोरीको बाउ

१४०७ दिन अगाडि

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११ कात्तिक २०७९

ठाकुर बेलवासे   मौसम अनुसारका फूलका रङ फूलकै सुवास फूलको हाँसो अनि फूलको घुर्की खोज्न कुनै वनजंगल या कुनै बागबगैँचा धाउनु पर्दैन छोरीको बाउलाई प्रकृतीका अनेकन रुप खोज्दै भौँतारिनु गर्मी छल्न चौतारो खोज्नु जाडो छल्न घाम खोज्नु यी सबै सबै झन्झट बेहोर्र्नु पनि पर्दैन छोरीको बाउलाई दिनभर हिँडेर साँझको थकित जोगीजस्तो अनेकन पीडा बिसाउन साथको भीख माग्दै दौडिरहनु पनि पर्दैन छोरीको बाउलाई मनबाट खुसी उम्लिएर बाटो भरि आफै पोखिनु अँ, रित्तोरित्तो बन्नु या हिमालको टुप्पोमा पुगेर हाँसोलाई जमिनतिर उडाईरहन खोज्दा आफ्ना भन्ने कोही नदेखिनु मान्छे भन्ने कोही नलाग्नु उमङ्ग हठात् वादल बनेर आफ्नै आँखामा भरिनु यी सब कुरा दन्त्यकथा जस्तै हुन छोरीको बाउलाई छोरीका गालामा लालीगुराँस फुल्छ ओठमा चमेली झुल्छ आँखामै छ बिहानको कलिलो सूर्य अनि परेलीमै छ मध्यान्नको तेजिलो घाम छोरीले मन दुखाउँदा क्षणभरमै सिङ्गो आकाश कालो बादलले छोपिन्छ छोरी हाँस्दा चक्रवातले थलिएको पृथ्वी खुल्छ दुःख दुःखेर मनभरी पीडा सुसेल्दै घर पुगेको बेला छोरीको स्पर्शले दुःख सुकेको पातजस्तो उडेर क्षणभरमै हराउँछ कहिलेकाँही खुसीले मन मान्छेको जम्काभेटमा परेको सिंहजस्तो गर्जिएका बेला छोरी आगाडि आएपछि मन हरिणजस्तो कोमल कोमल बन्छ खुसी विहानीको दुवोजस्तो शीतल शीतल बन्छ छोरीको बाउ हुनु मान्छे बन्नु हो रहेछ छोरीको बाउ हुनु दुःख जित्नु रहेछ के तपाईँ पनि छोरीको बाउ हो ।

कविताः पागल

कविताः पागल

१४११ दिन अगाडि

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७ कात्तिक २०७९

महाकवि लक्ष्मीप्रसाद देवकोटा  जरूर साथी म पागल ! यस्तै छ मेरो हाल। म शब्दलाई देख्दछु ! दृश्यलाई सुन्दछु ! बासनालाई स्वाद लिन्छु। आकाशभन्दा पातला कुरालाई छुन्छु। ती कुरा, जसको अस्तित्व लोक मान्दैंन जसको आकार संसार जान्दैन ! म देख्दछु, ढुङ्गालाई फूल ! जब, जलकिनारका जल चिप्ला ती, कोमलाकार, पाषाण, चाँदनीमा, स्वर्गकी जादूगर्नी मतिर हाँस्दा, पत्रिएर, नर्मिएर, झल्किएर, बल्किएर, उठ्दछन् मूक पागलझैँ, फूलझैँ- एक किसिमका चकोर फूल ! म बोल्दछु तिनसँग, जस्तो बोल्दछन् ती मसँग एक भाषा, साथी ! जो लेखिन्न, छापिन्न, बोलिन्न, बुझाइन्न, सुनाइन्न। जुनेली गङ्गा-किनार छाल आउँछ तिनको भाषा साथी ! छाल छाल ! जरुर साथी म पागल ! यस्तै छ मेरो हाल ! तिमी चतुर छौ, म वाचाल ! तिम्रो शुद्ध गणित सूत्र हरहमेशा चलिरहेको छ मेरो गणितमा एकबाट एक झिके एकै बाँकी रहन्छ ! तिमी पाँच इन्द्रियले काम गर्छौ, म छैटौँले ! तिम्रो गिदी छ साथी ! मेरो मुटु। तिमी गुलाफलाई गुलाफ सिवाय देख्न सक्तैनौ, म उसमा हेलेन र पद्मिनी पाउँछु, तिमी बलिया गद्य छौ ! म तरल पद्य छु ! तिमी जम्दछौ जब म पग्लन्छु, तिमी सँग्लन्छौ जब म धमिलो बन्छु, र ठीक त्यसैका उल्टो ! तिम्रो संसार ठोस छ। मेरो बाफ ! तिम्रो बाक्लो, मेरो पातलो ! तिमी ढुङ्गालाई वस्तु ठान्दछौ, ठोस कठोरता तिम्रो यथार्थ छ। म सपनालाई समात्न खोज्दछु, जस्तो तिमी, त्यो चिसो, मीठो अक्षर काटेको पान्ढीकीको बाटुलो सत्यलाई ! मेरो छ वेग काँडाको साथी ! तिम्रो सुनको र हीराको ! तिमी पहाडलाई लाटा भन्दछौ, म भन्छु वाचाल। जरुर साथी। मेरो एक नशा ढिलो छ। यस्तै छ मेरो हाल !

कविताः तिहार

कविताः तिहार

१४११ दिन अगाडि

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७ कात्तिक २०७९

  कविशिरोमणि लेखनाथ पौड्याल   सुखमय पारी सब संसार आयो रसिलो चाड तिहार बन्दछ मानू सबको काम खुसी छन् राजा रैति तमाम । अन्न छ सबका घर घर घर पूर्ण छैन कसैको पेट अपूर्ण काग र डुलुवा कुत्तासम्म भात नहेर्ने यो छ अचम्म। घर घर सबका भाँती भाँती झकमक बल्छन् दीपक ताँती झिलिमिली झिलिमिली वारी पारी यो छ मजाको रमिता भारी। जय जय लक्ष्मी आउ आउ स्थिर गर हाम्रा घरमा पाउ भन्दै हिन्दू सब नरनारी गर्छन् पूजा भवन शिंगारी। खेती पाती पूर्ण तयारी ढकमक फूलले ती फूलबारी हँसिला मुखलका सब नर नारी सब तिर लक्ष्मी पूजा भारी। वरपर सबका दाजु भाइ बटुलिन थाले टीकालाई हिँड सब जाउँ बहिनीबाट पहिरौं टीका पारौं ठाँट। सब सिद्ध्याई टीकाटाला पहिरि गलामा लामा माला चिजबिज खाउँ चाड मनाउँ बेर नलाउँ जाउँ जाउँ।।  

कविताः मूर्ख रहेछ रेशम चौधरी 

कविताः मूर्ख रहेछ रेशम चौधरी 

१४२३ दिन अगाडि

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२६ असोज २०७९

श्रेष्ठ रन्जिता चौधरी न आफू मन्त्री बन्यो न कालो चिल्लो गाडी चढ्यो न स्वास्नी छोरालाई बिदेश पठायो कालकोठरीलाई दरबार ठानी बस्यो हो मूर्ख रहेछ रेशम चौधरी । पहिचानको लागि लड़ी बस्यो आरोपितको उपनाम पायो  त्यै पनि सहेरै बस्यो  एउटा मन्त्रीले आज भेट्यो  आउ न रेशम पार्टीमा, अनि मन्त्री बन  अर्को मन्त्रीले फेरि भेटयो जाउ न रेशम पार्टीमा, अनि मन्त्री बन  अहॅ  मान्दैन त्यो मूर्ख मन्त्री बन्न  मान्दैन त्यो मूर्ख सुखसयलमा बस्न  किनकी उसलाइ आफ़्नो पहिचान प्यारो छ  आफ़्नो माग अनि मुद्दा प्यारो छ  पशु सरी बाँधिएर बाँच्न तयार छ बरु  सेरिएर मर्न पनि तयार छ  तर  तयार छैन आफ़्नो पहिचानलाई लिलाम गर्न  तयार छैन आफ़्नो माग मुद्दालाई बेच्न  तयार छैन आफ़्नो अधिकार लिलाम गर्न । किन थाह छ ? किनकि मूर्ख हो रेशम चौधरी  टिकट वितरणमा कोही भूगोल मिलाएन भन्दैछन्  कोही कलस्टर मिलाएन भन्दैछन्  जालीको जालझेलमा फस्दैछन्  त्यही भएर त म भन्छु  रेशम तिमी एक्लो छौ । सारा देशलाई मिलाऊन खोज्दा  आज आफ्नै भूगोल मिलाउन सकेनौ  सारा नेपालीलाई मिलाउन खोज्दा  आज आफ्नै कठरिया, राना, डंगहा, देसाउरी थारु मिलाउन सकेनौ । तिमी त भन्थ्यौ हामी सब थारु एक हौ  तर होइन रहेछ  हामीलाई टुक्र्याउने खेल तिमीले बुझेनौ  हामीलाई  कमजोर बनाउने खेल तिमीले बुझेनौ किनकि तिमी  मूर्ख छौ  हो  तिमी  महान छौ  निडर छौ  मर्न तयार छौ  तर  आफ़्नो पहिचान अधिकार  अनि माग मुद्दालाई लिलाम गर्न  तयार छैनौ ।  आफू मरेर हज़ारौ रेशमलाई बचाउन तयार छौ  इतिहासले तिमीलाई यही भनेर चिन्ने छ  रेशम माग  रेशम मुद्दा  अनि  रेशम पहिचान  न कि रेशम चौधरी एउटा श्रीमान्  न कि रेशम चौधरी एउटा बुबा ।