बर्किमारः टुहिन बुझ्ना कर्रा बा

बर्किमारः टुहिन बुझ्ना कर्रा बा

२२२ दिन अगाडि

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१० असोज २०८२

गजलः डेख परट  

गजलः डेख परट  

२२५ दिन अगाडि

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७ असोज २०८२

                                                                                                                                                                                        फोटुः एआइ डियर अविरल     ठर्यन परड्यास छिर्क सुनसान गाउँ घर डेख परट  ओह ओर्से हुइ नेपाल डाइ झनझन डुब्बर डेख परट   बेरोजगार मनै मै, गोझ्यम एक फुटल कौरी नि हो, रहर जुन मनक् डरङ्गम फरल लडर बडर डेख परट  फोटु हेर्क मुटुक बाट बुझ नि सेक्जाइट लिरौसीसे, ख्याल कर्बी भोक्टा आँरा फे आँख्खर डेख परट   कबुकाल हमार आँखी फे ढ्वाखा पाइ स्याकट, ओसिख ट गैयक दुध हसक् फे जहर डेख परट  बिकासक नाउँम हमार देशक नेटन भिउ टावर बनैठ, हेरो ट गाउँ घर म जुन ढुर्या ढुर्कुन डगर डेख परट  जियम मुवम टुँहार संग ‘डियर’ कहुइया हेरा गिली, आभिन हुकाहार याड मुटुक् कोनी काटर डेख परट ।                                       बर्दिया नेपाल, हालः दोहा, कतार  

ए थारुः उठाे जागाे,  काजे निडाइटाे‌ ?

ए थारुः उठाे जागाे, काजे निडाइटाे‌ ?

२२६ दिन अगाडि

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६ असोज २०८२

दिबस थारु  इ अन्धर्या रातक  फट्कार‌ बड्रिम सारा‌ निडाइल टाेंरैयन‌ जागट‌ ट टुँ सट्द  जागल रना, आपन चहकार‌‌ ओज्रारसे सक्कुहुनक भुँख मेटाई सेक्ना थारु टुँ  उठाे जागाे काजे निडाइटाे ‌?‌ इ प्रकृतिके‌  इमान्दार‌ रगत टुँ, न लाेभ, ना‍ लालज‌ आपन‌ इमान्दारिताके रगत  इ ड्यासक‌ खुसिक लाग‌ कुर्वान कर्लाे  टुँहार रगतके माेल इ जगतके सबसे चहकार हिरा  आपन चहकार ओज्रारसे  इ राज्यक ढुकुटि भर सेक्ना  थारु टुँ  उठाे जागाे, काजे निडाइटाे ?‌ न वेद पहर्लाे, ना पुरान पहर्लाे आपन गाउँ समाजके आनबान पहर्लाे  न रिति पहर्लाे, न निति पहर्लाे  हजाराैँ अंख्रा ज्ञान मुहम ढर्लो  न साम्यवाद पहर्लाे, न समाजवाद पहर्लाे  टभुन्‌ कट्रा सहजसे व्यवहारमा उटर्लो, उ किटाबक पन्ना‌ नै हुइटाे टुँ  व्यवहारिक ज्ञानके‌ ज्योति हुईटाे  आपन चहकार ओज्रारसे  सक्कुहुन् डगर डेखाइ सेक्ना थारु टुँ‌ उठाे जागाे, काजे निडाइटाे ? टुँ एक्क मन्द्रक त्रासनसे  सारा स्वत्रा भगैठाे ट कसिक‌ यी ड्यासक‌  उपनिवेशकन भगाई नि सेक्बाे  ? टुँ आपन वाणीक किल्लासे  सारा ड्यास बहन्ठाे ट कसिक इ ड्यासक भ्रस्टन बान्ह नि‌ सेक्बाे ? टुँ आपन मधुर रसगर गितसे  सारा जगत मैयाँ जगैठाे ट कसिक‌ इ ड्यास हँ खुसि बनाई नि सेक्बाे‌ ?  टुँ‌‍ इ पिरथ्यामे जकर-मकर चम्कना बेगर्ह्या हुइटाे  आपन चहकार ओज्रारसे  एक्क घरिम सारा ड्यास हँ बनाई सेक्ना  थारु टुँ उठाे जागाे, काजे निडाइटाे ?                          बर्दिया

जितिया

जितिया

२३४ दिन अगाडि

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२९ भदौ २०८२

जेबै लैहरा  येलछै बाबु, भैया लैले जितिया करीके लैले येलहा बाबु,  भैयाके पेरवाके मासु देलियै खाइले तेलपौर रोटी या दही, चुरा सनेस  बोइकके पुगलियै लैहरा । येलछै लैहरा गामभोइरके दैया, बहैन सब बिानके सबसे सुख, दुःखके बात करैत  माजलियै मुरी खैर, माइटसे  घेराके पतामे दही, चुरा या घेराके फूल चरहाइत  करलियै पूजा जितमहान बाबाके नामसे पहैनका दिन लहयाके खेलियै भिनसरमे मैया उइठके निन्हलकै  माछ, ओल, अलहु, सजुवाइन या भन्टाके तरूवा  बनेलकै मरूवाके रोटी  हमरौके सब बहैन भिन्सरमे मैयाके निन्हलाहा ओटघन खाइले बैठलियै तखैनते मैया कहलकै जितिया पावैन बर भारी धियापुताके ठोइक सुतेलि अपना लेली भोइर थारी  खेलियै ओटघनमे माछ, चुरा,  तरूवाबघहरूवा या मरूवाके रोटी, दही, केरा, गुर   यी भेलै ओटघन । ओटघन ख्याके दिनभोइर गामके सब सखी मिलके सुनैले गेलियै जितमहानके कथा बुझहलियै चुलही, सियारीके चरित्र बाबा जितमहान बाबाके पूजा कैरैत  करलियै कामना सन्तानके सुख, शान्ति या दीर्घायुके । दिनभोइर, राइतभोइर निवाला व्रत बैठके  बिहानके सुरूज उगलै ताब लहया सोन्याके घेराके पता या फूल चरहेलियै कुश नोहसे खोइटके फेकलियै चारूभरा जिमहान बाबासे फैन सन्तानके दीर्घायुके कामना करैत बौटरा घोटैत व्रत तोरलियै  । शैन दिन ओटघन ख्याके रैव दिन उपास बैठै छै सोम दिन व्रत तोरै छै  तेकरा कहैछै सुइध लगनाइ  भर्खर बियाह भेलहा दैया, बहैन या छुतका परलासे टुटल रहै छै जितिया सेसब सुइध लागैछै से साल मात्रे फैनसे  उठाइछै  जितिया ।  जितिया पर्व बहौत उदार छै  यी पुरूष प्रधानके ओकालत नै करैछै दैया, बहैन सब घरवलाके लेल नै आपन सन्तानके लेल जितियाके व्रत करैछै  सन्तानके रक्षक महताइर चियै  अपना भुख सैहके सन्तानके दीर्घायुके कामना करै छै तैदुवारे कहैछै  महताइर धरती  शान्ति ममताके खानी सहनशीलताके प्रतिमूर्ति चियै । सन्तान उपर कोन‍ो वज्रपात आबैले लागैछै ताब महताइर दुर्गा, काली , लक्ष्मी, सरस्वती  सब बैन जाइछै । ...... नेपाली भाषामा जितिया   जान्छु माइती बा र दाइ लिन आउनु भएको छ जितिया गर्ने दिदी, बैनीलाई  लिन आएका बा र दाइ- भाइलाई परेवाको मासु र भात खान दिँदै गरेँ स्वागत तेलपौर रोटी, दही, चिउरा  कोसेली बोकी पुगेँ माइती । आएका छन् माइती गाउँभरि दिदी, बैनीहरू सबै दिदी, बैनीहरूसँग  सुख, दु: खका कुरा गर्दै पहिलो दिन बिहान पिना र माटोले कपाल धुँदै नुहाएँ नुहाइवरी घिरौलाको पातमा दही, चिउरा र  घिरौलाको फूल चढाउँदै  गरेँ पूजा जितमहान बाबाको नाममा  पहिलो दिन बिहान नुहाएर पूजा गरि खाएँ त्यही दिन मध्य रातमा आमा उठेर  माछा, ओल तरकारी, आलु, भेन्टा,  लौकाको तरूवा र मरूवाको रोटी पकाइन् । हामी सबै दिदी, बैनीहरू उठेर आमाले पकाएको तरूवाहरूसित चिउरा, दही, केरा र गुड खायौँ यसलाई ओटघन खानु भनिन्छ । त्यही वेला आमाले भनिन्, जितिया पवैन वर भारी धियापुताके ठोइक सुतेलि अपना लेली भोइर थारी । दिउँसो,  गाउँका सबै सखी मिलेर  डालो बोकी हिँड्यौँ सुन्न  जितमहान बाबाको कथा सुन्यौँ जितमहानको कथा बुझ्यौँ चुलही, सियारीको चरित्र कथा सुनेर, बाबा जितमहानको पूजा गर्दै  गरेँ कामना सन्तानको  सुख, शान्ति र दीर्घायुको ।  दिनभरि र रातभरि निवाला व्रत बसी बिहान सूर्य उदाउने बित्तिकै  नुहाएर धूप बाली घिरौलाको पातमा घिरौलाको फूल र दही, चिउरा, सुपारी चढाउँदै  सुकेक कुश नङ्ले काटेर चारै दिशामा फाल्दै जितमहान बाबासित फेरि  सन्तानको दिर्घायुको कामना गर्दै  बौटरा निल्दै तोडेँ व्रत । शनिबार ओटघन ( दर) खाएर आइतबार निवाला व्रत बसी सोमबार व्रत तोड्छ त्यसलाई जितिया सुइध लागेको भनिन्छ । भर्खर बिवाह भएका र जुठो पर्दा व्रत टुटेका दिदी, बैनीहरूले सुइध लागेपछि  जितियाको व्रत उठाउने गर्छन् ।  जितिया पर्व उदार छ यो पुरूष प्रधानको ओकालत गर्दैन  दिदी, बैनीहरू श्रीमानको लागि होइन सन्तानको दीर्घायुको कामना गर्न व्रत बस्छन्  सन्तानको रक्षक आमा हुन्  सन्तानको लागि आमा धरती शान्ति,  ममताकी खानी सहनशीलताकी प्रतिमूर्ति हुन् । सन्तानमाथि कुनै वज्रपात आउन लागे आमा दुर्गा, काली, लक्ष्मी र सरस्वती  सबै बन्न तयार हुन्छिन् । अनुवादः कवियत्री स्वयम् सिरहा नेपाल, हालः पोर्चुगल

गजलः डस्या आ गिल जसिन लग्ठा

गजलः डस्या आ गिल जसिन लग्ठा

२३४ दिन अगाडि

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२९ भदौ २०८२

                                                                                                                                                                         फोटुः भरतविक्रम शाह दिलबहादुर चौधरी  जब अङ्ना म डौना ओ बेबरी फुलल डेख्टुँ ट डस्या आ गिल जसिन लग्ठा जब बठ्न्यावन झौँ झौँ पैयाँ लागट डेख्टुँ ट डस्या आ गिल् जसिन लग्ठा हो भारी संस्कृति ब्वाकल् हमार थारु जात, नाचगान म रमिता  कर्ना जब चक्डाउ चक्डाउ मन्ड्रा बाजट सुन्ठु ट  डस्या आ गिल् जसिन लग्ठा डिउँटावन छाँकिबुंडी डेहक लाग डारु बनइना,  हमार  पुरान  रिति   हो  जब डाइहँ गुम्रक डारु जोटाइल डेख्टुँ ट डस्या  आ गिल् जसिन लग्ठा चाडबाडके ब्याल म हमन थारुन हँ सिढ्रा, मच्छी अनिवार्य चहठा जब मामा घरक् माइ हँ सिढ्रा सुखाइ्ट डेख्ठुँ ट  डस्या आ गिल् जसिन लग्ठा आब डस्या आइ्टा लौव लुगा लगाइ पैम कना, म्वार खुसिके  सिमा नि रह जब डज्र्याव डसिहाँ जरावर सियट डेख्ठुँ ट डस्या आ गिल जसिन लग्ठा कैलारी गाउँपालिका–५, कैलाली  हालः रानीवन, काठमाडौं २०८२ भदौ २८ गते, ठुम्रार साहित्यिक बखेरी अंक १०८ मे जुमसे वाचन करल रचना