देशः खरानी खरानी छ, म कसरी हेर्न सक्छु

देशः खरानी खरानी छ, म कसरी हेर्न सक्छु

२३८ दिन अगाडि

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२५ भदौ २०८२

हामी सबै नेपाली  

हामी सबै नेपाली  

२४४ दिन अगाडि

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१९ भदौ २०८२

                                                                                                                                                                             तस्विरः एआइ कोइलीलाई हेला किन भनी काली काली ऊ त मीठो गीत गाउँछे भाका हाली हाली कागलाई हेला किन भनी काली काली ऊ त खबर बोकी ल्याउँछे पखेटा है हाली औंसी रातलाई हेला किन भनी काली काली जुनकीरीले उज्यालो छर्छे बत्ती बाली बाली बहिनीलाई हेला किन भनी काली काली समयमै होमवर्क गर्छे, छैनन् पाना खाली  माली दिदीलाई हेला किन भनी काली काली फूल दिन्छिन् हामीलाई भर्छौ डाली डाली किन गर्छौ रंगरूपमा हेला, तिम्रो मनै जाली  गोरी हौं या काली, हामी त सबै नेपाली ।  लमही नपा–४, दाङदेउखुरी हालः कीर्तिपुर–५, काठमाडौं साभारः नेबासास प्रतिनिधि नेपाली बालकविता, २०८२

चौठिचान

चौठिचान

२४८ दिन अगाडि

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१५ भदौ २०८२

दुर दुर तक सुनसान छै अकाश केकरोले रूकल छै धरती धरती चानके देखैले असियाल छै सुरूजके लाजसे नै निकलै छै चान आइ चानके बरी हतार छै ऊ सुरूज डुगैके इन्तजारमे छै । सुरूज चानके देखैले रूकल रूकल थाइक गेलै नै निकललै चान (चाँदनी) थाकल सुरूज चैले गेलै आराम करैले तेकर वाद निकललै चान   चान धरती दिसर ताकलकै या धरती चान दिसर ताकलकै देखलकै धरती चानके शान्त, सुन्दर मुह । चान देखलकै धरतीमे धरतीवासी सब अङ्नामे  चौका बनाइने छेलै दिनभोइर निवाला व्रत वैठके चानके देखैले असियाल छेलै, माइटसे निपलाहा चौकामे कन्तरामे दही, खिर, तेलपौर, रोटी केरा, स्याऊ फलफूल थारी भोइरके राखने छेलै अकाशमे चानके देखते मातर सबकोई खुसी हैत  चान दिसर अौङरी देखाइत कहैले लागलै देख चान निकललै, चान निकललै ..... धरतीवासी सब तेलपौर रोटी, दही चानके चरहाइले असियाल छेलै अकाशमे चानके देखैत मातर दिनभोइर निवाला व्रत बैठल भक्तालु चानके सरर या अगरवतीकृ धूप देखाइले लागलै दहीसे भोरल कन्तरा, तेलपौर रोटीसे भोरल थारी हाथमे बोकलकै चानके पूजा करलकै तेकरबाद चानके दही, रोटी, फलफूल चरहाइलकै । चान दिसना देखैत मनेमन धरतीवासी सब, कोइ कौबला करैछेलै कोइ कौबला करने छेलै से पूरा भेला पर चानके धन्यवाद कहैछेलै कोइ गाई, माल चौपाया सब दिन स्वस्थ रहे  सेके कामना करैछेलै  कोइ घरपरिवारके सुख, शान्तिके कामना करैछेलै कोइ सन्तान या परिवारके सैब सदस्यके  कुशल स्वस्थ जीवनके कामना करै छेलै । चान खुसी हैत सबके दही, रोटी चाखलकै सबके मनके बात सुनलकै  सबके मनोकामना पूरा करलकै   आपने जेखा  बनैले सिखाइलकै अन्धकार हटाइले सिखाइलकै असगरे पूरा अकाश या पूरा धरतीमे चम्कैले सिखाइलकै । लहान न.पा. १२, भोटियाटोल, सिरहा, हालः पोर्चुगल

बुह्रान बिन आँसक रुइट 

बुह्रान बिन आँसक रुइट 

२६१ दिन अगाडि

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२ भदौ २०८२

                                                                                                                                                                             चित्रः समर्पण खनाल डट्कर्ल बा उ रोक, बिन आँसक रुइट बुह्रान  बिन आँसक रुइटअ डेख्क, क्याकर पग्लि मन   दाङ रहल म ओस्ट कमैया, बुह्रान आक झन  जहाँ जाओ फुटल करम, क्याकर नि रुइ मन  लराइ म थारुन फन्काइक ला, नारा थारुवान  सत्तम पुग्ल मुद्दा बिस्रैल, फँसिल थारुन झन  क्रान्ति म रक्टक खोल्ह्वा, अधिकार अङ्ग्रि गन  असिक कराइबेर कहाँसे जागि, देशभक्ति पन  खेट्वा निज्वाँटट् जे, डेख्बो ओइह्य ह टनटन  राट–डिन खेट्वा जोटुइयन रठअ भुँख्ल झन  सङ्घियता हमा लाक फे हो कटि, मङ्ल थारुवान  राज्यहन थारुनअ थुन्ना डाउँ हुइलिस झन  बन्ढुक लेक डागट मङ्ठ कैक राज्य थारुवान  हम्र हुइटि कलसे फे यिहाँक धर्ति पुत्र झन  पालटा ड्यासह उ झन फराक बखारिक धान  रोकन्हँ जिअ पर्ठिस खै काजे हो पठ ओहि झन  हक मङ्गाइक लाक पाइल सपुत थारुवान  कमैया, कम्लहरी बनिलिस खै का पठ हो झन  डट्कर्ल बा उ रोक, बिन आँसक रुइट बुह्रान  बिन आँसक रुइटअ डेख्क, क्याकर पग्लि मन ।   ठाकुरबाबा नगरपालिका, गोबरैला, बर्दिया हालः काठमाडौं 

मै मुँवल डिन

मै मुँवल डिन

२६१ दिन अगाडि

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२ भदौ २०८२

                                                                                                                                                                                     तस्विरः एआइ पुराक थारु आज ट मै मुँवल डिन म्वाँर शरीर लास होख सुटाइल बा अँग्नाभर गाउँल्या मनै जो मनै बाट म्वाँर आँख टुमल बा स्वास प्रस्वास चाल नि कर्ठो जब सास सरिरसे बहार निक्रल कलसे लास बन्ठा महि ठाह बा मै मुँवल बाटु  टर भिट्टर भर जिटिहे  शरीर मुँठा टर आट्मा नि मुँवट मनै जो म्वाँर आँन्जर पाँन्जर बैस्ख महि हेरटि बाट सम्वेडना प्रकट करटि अइठ  आफन्ट व इस्टमिट्र ओस्टक म्वाँर सुभचिन्टक आज मै मुँवल डिन डाइ टमन्हे बेहोस होख ढल्लि बहिन्या म्वाँर पन्ज्र बैस्ख आँस बहाइटि भैयक आँखिम डाडुक मैयाँ डेख परटिस् जर्मना सामन्य रलसे फे  मुँनाभर इटिहास बनस् कैख मै महसुस करल रहुँ जर्मना ओ मुँना ट संसारके रिट हो सक्कु जहन ठाह बा टबहे मै सुटल ब्यालम दिनक अजरार म्वाँर अन्ह्वार म परल  सपना हो कि बिपना हो अल्गाइ नि सेक्नु मै झल्याससे जग्नु आँख एक्चोटि उघ्रल नम्मा सास फेर्नु टैट् उ ट सपना पो रह उह ब्याला उठ्नु ओ सोच्नु मन मन आज ट मै मुँवल डिन हो ।                  दंगीशरण गाउँपालिका, सुकदेवा, दाङ 

जिन्गी के गाडी

जिन्गी के गाडी

२६१ दिन अगाडि

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२ भदौ २०८२

रुसी महाकवि अलेक्सान्द्र पुश्किन यद्यपि जिन्गी के गाडी  कहियो कहियो भ्याजाइ छै बहौत भारी लेकिन उतरै नै छै गाडी से, चलती के नाम गाडी,  चलती गाडीए हलुका सवारी । तिलखिचडी केशवाला बहलवान  अनाडी नै, छै बहौत तुर्रमखान, टिटकाइर के चलावै छै, पुच्काईर के चलावै छै, आपन गाडी,  बढैत चल, बढैत चल । भिन्सरवा से राइत तक आपन कपार फोरैत खुश है चियै आलस्य आ आनन्द के तुच्छ सम्झैत हल्ला करै चियैः आँ आँ बढ बढ, चल मादर*द  लेकिन दोपहरिया तक  अब उ हिम्मत नै रहै छै बाँकी हिल जाई चियै, थर्रा जाई चियै खदहा मे आ ढलान मे बहौत डरा जाइ चियै । तब हल्ला करै चियैः आराम से मूर्ख । गाडी फेन चलै छै हिचकोला खाइत चर्र चर्र करैत पहिनके जखा जेकर हम अभ्यस्त चियै । उङ्गहैत ओंग्ह्रैत ठाँग हाथ सोझ करैत  पडाव के तरफ चलै चियै । लेकिन समय के गाडी चलतै रहै छै ।                      भावानुवादः रंजन लेखी                    फत्तेपुर, सप्तरी, हालः साज, बाहिया, ब्राजिल The Cart of Life Although the burden is sometimes heavy, the cart is light on the move; the dashing coachman, gray-haired, carries, does not get off the box. In the morning we get into the cart; We are happy to break our heads And, despising laziness and bliss, We shout: Go! Mother f*ck! But at midday there is no longer that courage; We are shaken; we are more afraid of both the hillsides and the ravines; We shout: take it easy, you fool! The cart rolls on as before; By evening we have become accustomed to it , And, dozing, we ride to the night's lodging - And time drives the horses.  1823 Friday, August 1, 2025