सुवरानी थारु  उर्फ  कमरेड चेतना

सुवरानी थारु उर्फ कमरेड चेतना

१४४ दिन अगाडि

|

३० चैत २०८२

थारु भाषाक शब्द बेल्साइके बहस चलल् बा

थारु भाषाक शब्द बेल्साइके बहस चलल् बा

१४७ दिन अगाडि

|

२७ चैत २०८२

जग्गु प्रसाद चौधरी (भगोरिया)                               थारु भाषाक् शब्द बेल्साइके बहस चलल् बा आपन मनक विचार डेना डगर खुलल् बा आओ गोचाली बहस करी सक्कुजे मिलके  जिन नुकल रहो कुई बाट बट्वाई खुलके ।   थारु भाषाक आजसम नै मिलल हो लिपि देवनागरिक लिपिक कुछ वर्ण हटैना काजे कर्ना ढिपी निमाङ् शब्द जस्टक बोल्ठी ओस्टक हम्र लिखी साहित्यम लौव लौव शब्द बेल्स सिखी ।   वर्णसे शब्द बनल शब्दसे साहित्य माला सक्कुजान बोली हम्र आपन आपन पाला डारल घाना सब्जे मिल्के निख्राय पर्ना बा दुरगामी विचार कैक बाट हमन ढर्ना बा ।   साहित्यम चलाई हम्र अरगरसे कलम भाषा कहोंर विग्रटा लगाई हम्र मलम उठी पह्रल यूवा वर्ग जङ्ग्रार बन परल छलफल कैक थारु भाषा मानक बनाइ परल ।   भाषा साहित्य कला संस्कृति हमार पहिचान यहीह बँचाइक लाग हम्र चलाइ अभियान ठाउँ ठाउँम विचार गोस्ठी अन्तरक्रिया करी मौलिक ओ आगन्तुक शब्द मिलाके बेल्स परी ।                  बारबर्दिया नगरपालिका–१०, मेरैया, बर्दिया प्रकाशोन्मुख कविता संग्रह म्वार मनक् फुलरिया (२०८३) से साभार । इ कविता संग्रह २०८३ वैशाख १ गते ५५वा गोचाली दिवसके अवसरमे बर्दियामे विमोचन हुइटि बा । 

माटी, समय ओ कोर्रा

माटी, समय ओ कोर्रा

१४९ दिन अगाडि

|

२५ चैत २०८२

जीतबहादुर चौधरी ट्रासन    उठो ए समय । हेरो देश हे पोक्य्राके डोरटैंँ यहँरवहँर झण्डावाल लहरु मे सवार एक झोंडा डैंटुर । उठो ए समय ।  हेरो रजकज करटै गाउँ सहर मुलुक हे बनाके खोखर  वहरो सरकारी सेंडुर । उठो ए समय ।  ममताके छाती फोरके लहडोरामे लौटटै करिया सुअर जो बनाइल देश हे ढोढर जे देश खैनामे बा सिपार फेन्से उठाइटै कपार माटी हे भुवा बनैना खेलमें जुमलबाटै भुरे भुवर एक लेहरा गिडार उठो ए समय ।  देश पारन जाके रगतके आँस गिराइटा प्राण के असरा टुर के  रातविरात छटपटाइटा आछट पार्टी कहिया हेरबो यी देशमे कपट डरुईयनके छातिम डिया करिया बरबो उठो ए समय ।  जालिम के डौर के भिटर डपकल यी देशके दुश्मन हे  हाकिम के कौरक भिटर नुकल ऊ जाटिक रावन हे  मानव तस्कर के लस्कर मे कलकल डलिडडकर डायन हे लाही फूला डेखाइक लाग आउ गम्छा भेग्वा ओ टोपी सोमला बैठाके कोर्रा माटी उठो ए समय ।  हेरो भोर होगिल देश खोंर होगिल हमार माटिम करिया बडरी छागिल उठो ए समय ।  धनगढी–१५ कनरी, कैलाली ९८४८४९३३५७ jeettrasan57@gmail.com

खखरी

खखरी

१५२ दिन अगाडि

|

२२ चैत २०८२

घर पछारी के बारीमे  फेकल फचारल ढरहियाल छै पाइन मे भिजै छै रौद मे टटाइ  छै कोनो काम के नै छै से कैहैत अपहेलना करैत फेक देने छेलियै घर पछारीके बारीमे खखरी । कोनो काम के नै छै  घरमे राखबै कथिले ? घर मे त ओकरा राखै छै जे काम लागै छै सुरक्षा ओकरा करै छै जे काम दै छै यी कोन काम के चियै ? कोनो काम के नै चियै यी यहया कहैत फेक देलियै खखरी के बारी मे लतियाइलियै वेवास्ता करलियै खखरी हमर कोनो स्वार्थ पूरा नै करतै हम यहया सोचैत रहिलयै हरदम खखरी के कोनो काम नै लागतै हमरा । जब चुइल्ह  बनाइ के बेर येलै ताब खखरी के सम्झलियै जब कोइठ बनाइ के बेर येलै या घुर तापै के बेर येलै ताब  खखरीके सम्झलियै खखरी चुइल्ह या कोइठ बनाइले काम लागै छै खखरी घुर तापैले काम लागै छै से बात त हम भुइल गेल छेलियै । जब ओकर आवश्यक्ता महसुस भेलै ताब  ढकिया ल्या के दौरल गेलियै बारी आनलियै समैर के  एक ढकिया खखरी चलाइलियै आपन काम चुइल्ह बनेलियै कोइठ बनेलियै घुर तापलियै खखरी नै रहतियै त कोइठ नै ठरा हेतियै हमरा कैहियो ने काम लागतै  कैहके जेकरा बारी मे फेक देने छेलियै से हमरा समस्या के बेर  काम लागल कहै छै खखरी के कोन काम ?  हम कहै चियै खखरी वर काम लागै छै कोनो आद्मी के एक समय मे  निरीह या खखरी के संज्ञा द्या के लोकसब आपन जीवन से दुर कैर दै छै स्यह्या निरीह लोक एक समय मे ओकरा  काम लागै छै  साथ दैछै तैदुवारे केकरो निरीह कैह के अपमान नै कर निरीह लोक के साथ दया के  सहयोग कैर के  अगारी बरहै के मौका दियौ एक दिन समय येलापर ओह्या खखरी  मूल्यवान रूपमे  काम लागै छै ।                     सिरहा, लहान, नेपाल                     हालः पोर्चुगल

बाँदर, मदारी र हामी 

बाँदर, मदारी र हामी 

१८३ दिन अगाडि

|

२१ फागुन २०८२

राबत अनारकली रामकली या यस्तै कुनै 'कलि' नाम पाएकी बाँदर्नीले पहिरिएर दुरुस्त मान्छेको लुगा नाच्छे- डिमिडिमी, डिमिडिमी, डिमिडिमी डमरुको तालमा । त्यस्तै- धर्मेन्दर जितेन्दर या यस्तै-यस्तै उपनाम पाएको बाँदर काँधमा लौरो बोकेर गरिटोपल्छ चौकीदारी गरिटोपल्छ माया गइटोपल्छ ससुराली । प्रतिक्रियामा हामी हाँस्छौं, दु:ख लुकाएर ताली दिन्छौं, गाली लुकाएर । यथार्थमा तिनले टोपलेका मात्र हुन् सत्य त- बाँदरको काम बिगार्नु हो । तर सरोकार छैन हामीलाई बाँदरको पूर्वकथा, मध्यकथा या अन्त्यसँग सरोकार छैन हामीलाई मदारीको नाम, थर या वतनसँग पनि । दीर्घकालीन दु:ख साँचेर बाँचेका हामीहरू केवल साट्छौं- चानचुन नोटसँग क्षणिक हाँसो... प्रिय, रमिते मित्र ! यो पहिले-पहिलेको दृश्य हो  जसका बाँदरहरू  कहाँकहाँ गइसके होलान् जसका मदारीहरू कहाँकहाँ पुगिसके होलान् ! हामी भने अझैसम्म त्यहीँ छौं जहाँ बाँदर र मदारीले छाडी गएका थिए । फरक यत्ति भो कि- अचेल हामी  भोट दिएर रमिता हेर्छौं ।

ठनुवा सेमरा 

ठनुवा सेमरा 

१८७ दिन अगाडि

|

१७ फागुन २०८२

अमित दहित   गाउँक पुरुव डहरचन्डि ग्याँरम जबसे मै जन्ना हुईनु टबसे  हमार बाजे कहैं जबसे देखनु मै फे टबसे  चारवर डाहाँका फैलईल अर्गराईल बा  हमार गाउँक ठनुवा सेमरा ।। कति मेर मेरिक चिरैयनके ट काेटाल रह  काैवा मैनीक चिरबिर चिरबिर कुईलरियक कुहु कुहुले  चैनार रह  सारा  ग्याँरा बरा जाेर साहम  घारक घार मधरिनके बन बसेरा  हमार गाउँक ठनुवा सेमरा ।। फाँडम गेहदुल ट बाझैं बाझैं मैनी काैवनके बच्चा त काेटालमसे कार्हि मधरिन ट माघम थ्वाँच थ्वाँच ढेला मारि टर टर  सहट चुह चटाकसे चाटि आब ट सुनसान हमार गाउँक ठनुवा सेमरा ।। हर साल गाउँक पुजा पाठ दुल्हनके भाेजाहा  दिया बाटि छाँकि बुँदा ढर्कावा पाई गाउँ राेगब्याधी किराकाँटि भूत प्रेतनसे   निक निक रुखुईया दिउँटक थान  हमार गाउँक ठनुवा सेमरा । हुईट ठुठ्ठा  फेन लउटट मने रुखुवा जिँउ का टिउँ  चैत्या  ध्वाँटले डेखनउस  ढकर मकर बर चुम्मर बैशखिया गएरुवा बेराहा अखाेरिएनके सिटरैना कमदा घामक छ्याँका टिउगरिएम लागल छटरि बनट हमार गाउँक ठनुवा सेमरा ।। गाउँक पुरुव डहरचन्डि ग्याँरम जबसे मै जन्ना  हुईनु टबसे  हमार बाजे कहैं जबसे डेखनु मै फे टबसे   अस्ट चारवर डाहाँका  फैलईल अर्गराईल बा  हमार गाउँक ठनुवा सेमरा ।। राजापुर–२, जोतपुर, बर्दिया 

छिङ्गटाहन भउजिक चुनाउ

छिङ्गटाहन भउजिक चुनाउ

१९५ दिन अगाडि

|

९ फागुन २०८२

पुराक थारू  गाउँभर चम्पन बा  आझ अचम्हँक खबर छिङ्गटाहन भउजि उठल बाटि चुनाउ । हाँठम्  सैट्ना, कपारिम झउह्वा लेख, कहटि- "आब मै फेरम गाउँक डगर ।" गाउँक चौराह म बैस्क डेठि भासन, हाँस हाँस्ख जिट्ल बटि सक्कुनके मन । काल्हुक डिनसम बनबन्याट म आघ सरँठ, आझ विकासक योजना खुलस्ट कहटि। कह भिरलि नस्से- "पानी लनम सकुन्हँक घर-घर, लर्कन्हँक पहरना बिढ्यालय सँप्रैम  आपन पाले म । बुर्हा-पाखन सम्मान व सहयोग करना, ठरयँन हँ सीप सिखैना रोजगार डेना । रान परोस  मन्के हँस्ठ- "भउजि टे बर-कर्रा बटि!" पाछ ओँरसे किउ कठ- "आब ट फुरसे लरहि !" मने भउजिक आँख सपनाले भरल, गाउँक मुँह फेरना अठोट बाटि करल । चुनाउक डिन आइल, बाजल मन्ड्रा व नारा, सकुन्हँक मनम बा उट्साहके पारा ।    छिङ्गटाहन भउजिक साहस व चाहा, गाउँलेन सम्झटि आघ हुँकाहार सरना आहा । जिट ह्वाए या हार, बट्कोहि खास, आपन हक अढिकारके लाग उठल बरा आस । छिङ्गटाहन भउजिक चुनाउक आवाज, गाउँ फेरजिना हुइल सुरुवाट ।                                        २०८२/११/९                      दंगीशरण गाउँपालिका, सुकदेवा दाङ