रोपाइँपछि थारू गाउँमा  ‘हर्ढावा’

रोपाइँपछि थारू गाउँमा  ‘हर्ढावा’

२९१ दिन अगाडि

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४ साउन २०८२

पच्छिवैसे उमरल कारि रि बडरिया रे

पच्छिवैसे उमरल कारि रि बडरिया रे

३०० दिन अगाडि

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२६ असार २०८२

थारू कृषि लोकगीतमे द्वापर युगके श्रीकृष्ण ओ महाभारतकालीन गाथा समाहित हुइनाले थारू समुदायमे प्राचीन कृषि प्रणालीके झझल्को विल्गाइठ । रोपाइँके बेला घामपानीसे जोग्न छटरी टरे बैके धानके बेर्ना उखर्ना मचिया, खटोली, धान ढर्ना माटीक डेहरी, कुठला, कुठली हिलामे लगाके नेंग्ना खराउ, धान बोक्न सिक्हर बहिङ्गा, सामान ओसार्न लह्रिया, खेटुवामे खाना पुगाई जाईबेर बेलस जैना सामग्री ढकिया, डेलवा, बिँडा, सिरहट्टा, पानी पिना करवा, जाँड पिना करै, बैठक लाग बेर्री जैसिन सामग्री अपनही बनैठै, थारू किसान । मुसनसे अन्न जोगैना कठुवक ओड्रा थारू बस्तीमे अभिन फे हेरे सेक्जाइठ । गीत गैटि खेतीपाती करलेसे श्रमिकके थकान मेटठ, एक प्रकारके उत्साह जागठ । टबमारे कृषि पेसा अपनाइल प्रायः आदिवासी जनजातिमे कृषिसम्बन्धी गीत फेला परठ । थारू लोकजीवनमे सजना, मैना, होरी, अस्टिम्की, सख्या, सुर्खेल, ढमार, मघौटा, बरमासा, रतनचवा, दिननचवा, बिरहैन जैसिन लोकगीत बा। प्रायः यी सक्कु गीतमे खेतीपातीके प्रसङ्ग प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूपसे जोर जाइठ । यी आलेखमे पश्चिमा थारू समुदायमे कृषिसम्बन्धी सजनालगायत अन्य लोकगीतबारे चर्चा करल बा । खेतीपातीके बेला सजना गीत गा जाइठ । यम्ने खेती प्रणाली, सिकारी संस्कार, पौराणिक पात्रके गाथालगायत प्रसंग समेटल रहठ । पानी मंग्टि गइया बेंढ्ना समयमे पानी नैपरलेसे गइया/गोरु बेंढ्ना संस्कृति अन्तर्गत सजना गैटी पानी पर्ना अनुरोध करजाइठ । गइया/गोरु बेंढ्ना कहल गैयागोरुहे बन्धक बनैना हो । पाँच पाण्डव राजा विराट्कहाँ गुप्तवास बैठेबेर ओइनके १२ बर्से वनवासके ध्यान भङ्ग कैना कौरव पक्षसे राजा विराट्के गैयागोरु बन्धक बनाइल रहे । उ गैयागोरु छुटैना अर्जुन महिलाके भेषमे गैल महाभारतमे मिथक बा । यैसिक गइया/गोरु बेंढ्ना संस्कृतिमे लउण्डीहुक्रे लउण्डाके पोसाक लगाके गाउँ गाउँ छाता ओढके गीत गैटी, टिना मग्टी नेंग्ठै । महाभारतके प्रसङ्गफे सजनामे आइठ । ब्याड छिटेबेर पानी नैजुरके प्रायः वैशाखके अन्त्यओर गोरु बेंढ्न चलन बा । गैयाहे बन्धन बनैना जैना बेला ओइने सजना गैठैः उटरे डखिने चुरवा चम्के रे, कि बिजलि टाेँरगन काटि ढर्बु रैनि मछरिया कि मेघवा बाबा पानि डेउ । उत्तर दक्षिण बिजुली चम्कल, चुरियाफे चम्कल । बरु रैनी मच्छी काटके चढैम, मेघवा बाबा (भ्यागुता) पानी पारडेउ । गोरु बेंढुइया गैयासंगे, मेघवा बाबाहेफे बन्दी बनैठै ओ भोजन करैठै । सजना गैटी गाउँबाहेर निकरठै– चारु कोना कलस ढरैबुँ रे कि कलसा मैँ छुआइटुँ हाँठ जोरि बिन्टि सुरुजा डेउटा कि मै बर्खा मनाइटुँ पच्छिवैसे उमरल कारि रि बडरिया रे, एक बुन्डा पनिया गिराइडेउ मोर हिरना भिजाइडेउ अर्थात् चारु कोनुवा कलश धारे लगैना, कलश मै छुवैबु, ए सूर्य देउता, टोहानसँग कर जोर बिन्ती करटि बर्सातके लाग आह्वान करटु । पश्चिमसे करिया बद्रि आइल मने पूर्व भागल । एक बुँद टे पानी परडेउ, मोर हिरना (धर्ती) भिजाइदेऊ । आश्चर्यके बाट का बा कलेस जोन दिन जोन गाउँठाउँमे गोरु बेंढना रित पूरा करजाइठ, उ दिन संयोगसे उ वरपर पानी परल रहठ । छाइ, पटोहियाके बिलौना रोपाइँके समय प्रायः जेठसे सावनसम होे । टबेमारे सजना प्रायः जेठसे सावनसम गाजाइठ । जेठ लग्लेसे फेन पानी नैपरके किसानसे सजनाके राग छोरठैंः हरे पुरुवसे उमरल कारि रि बडरिया रे, पछिउ चलि जावै, अरि परि गैला, जेठ–असरिया, पनिया नहि बरसल । अर्थात् पूर्वसे करिया बद्रि मडारल ओ पश्चिममे जाके हेराइल । जेठ, असार महिना लग्लेसेसमेत पानी नैपरल । ओहोर पानी नैपरके खेती करे नैपाके अपन अभिभावकहे दुःखी हुइल डेख्के उहाँक जवान छाइ फेन बिलौना करठि सजनामार्फत– हरे गिउरक बिनल झलुरि छटरिया रे, उपरे पावोन डोलै अरि छि छि बुन्डा पनिया न परल, मोर चुन्डरि नै भिजल । गैँरी (भँगेरासे बनाइल छटरी (गाउँसले छाता) उप्पर उप्पर हावा बहल । सामान्य एक बुँद पानीसम नैपरल, मोर चुनरी नैभिजल । जब पानी परठ, किसान खेतमे अइठैं । यहोर पुरुष नैरहल घरके महिला पानी परलेसे फेन खुसी नैरठैं । सावन सजनि बरसे झिन बुँडिया रे, टुटे बजरा केवरियाँ अरे रानि भिजै रंगि रे महलिया, पिहा हो परुडेसे । खेतीपाती करना बेला जारसे सटाइल मौसममे श्रीमान् (राजा) सँगसँगे नैहुइल बेला कौन भर रानीके मन खुसी हुइ टे ? रंगीन महलमे भिजल ओकर अंगमे काँडा उम्रठ मने काँडा सम्यइना पति नैरहठ । यहोर भर्खर भर्खर नयाँ दुलही भित्राइल श्रीमान् खेतमे काम, घरके यादसे उहिनसे ढेर सताइल रहठ । सँगे काम करना गोचाली (साथी) उहिनहे सजनामार्फत गिज्याइठ– खेट्वा टे जोटल मुरसुवा रे… कि कोडरा छनाछन कब अइहि लौलि डुल्हनिया, कलवा पानि डेहे । अर्थात् मुरसुवा नामक व्यक्ति खेतमे दनादन कोद्रा खेलाइटा, उहिनहे भोक सटाइटिस । ओकर नयाँ दुलही कलवा (बिहानके खाना) डेहे कब आइ कपटा ? ओहोर नयाँ दुलही खाना पानी लेके खेत पुग्ठि ओ सजनामार्फत अइसिके उहाँक भाव व्यक्त हुइठ– सिरे टे लेहल गगरिया रे, हाँठे र करुवा पानि भुजवा टे लेहल कोछियाइ, चलल खेट पानि डेहे ना मै डेखुँ रुख्वा, बरिख्वा, ना सिटल जुर छाँहि घैला छलक चुन्डरि भिजे, कहाँ रे ढारु पैला ?                          (कुशुम्हिया, २०५७ः १९) शिरमे गग्री, हातमे करुवाक पानी, कम्मरमे भोजन लेके खेतमे जैटिरहल दुलही खेतमे ना रुख देख्ठि, ना कौनो शीतल स्थान । उहाँक घैला छल्कठ चुनरी भिजल रहठ । टबेमारे पुछ्ठी, ए स्वामी घैलाके पानी कहाँ ढरु हँ ? अइसिके किसान खेतीपातीके लाग जब खेतमे छिट्कठैं, सजना गीतके रागसे खेत गीतमय रहठ । विडम्बना यी झंकार आब सुस्ताइ लागल बा । गीतमे पशुपन्छीके प्रसंग खेतीपातीके लाग गाईगोरु अभिन्न वस्तु हो । सजनामे कान्हा अर्थात् कृष्णके फेन गाथा गाजाइठ । ओम्ने गाईगोरुके प्रसंग आइठ– सुनो सुनो कृष्ण भाइ रे, टोर गौवा हेरानि कहाँ अइलो मोरे डुवारे कि टोर रहिया भुलानि ना मोरे गौवा हेरानि रे, ना मोरे रहिया भुलानि कारि नाग फुला टुरबुँ, मामा रे पुजा करहिँ । नागिन पुछ्ठी, “ए कृष्ण, टोहान गैया हेराइल कि डगर भुलके यहोर आइल ।” कृष्ण कठैं, “ना मोर गैया हेराइल हो, ना टे डगर भुलाइल हो । ए नागिन टोहान रक्षा करल फूल मामाके पूजाके लाग टुरे आइल बटु ।” अस्टिम्की गीतमे जैसिक कृष्णके बाबाहे हर बनैना सामग्री लेना वन पठैलैं, खेत जोटल प्रसंग बा, रटि रटि महादेव–पार्वतीहे फेन खेतीपाती करल प्रसंग थारू लोकसाहित्यमे नानल डेखाइठ, जेकर वर्णन सजनामे मिलठ– गौरी टे गैनै जगाइ रे, उठो हो महाडेव बसहा बरडा बेचि डारो, छिन भर सुटो । बेटुक डण्डा मारी जगैबुँ रे, उठो हो महादेव । टुहिन बिना हाँठ नहिँ पसरी, सुरुज नहिँ उघरी । सोइ कइ जागैं महादेव रे, हाँठ मुँह ढोवैं । नही बेचबुँ बसहर बरडा, कि छिनभर सुटबुँ ।                       कुलप्रसाद थारू, बर्दिया (२०५७) यहाँ निडाइल महादेवहे गौरी (पार्वती) कठि, “कत्रा सुत्बो ए महादेव, यहाँ ग्राहक आइल बटैं, बेसहा (गोरु) बेचो ओ फेन सुटो । नैउठ्बो कलेसे टे बेटके लट्ठीसे पिटके फेन जगइम । ओहोर अल्छी महादेव सुटके उठके हातमुख टे धोइठैं मने बेसहा गोरु नैबेच्ठैं कहिके फेन सुटेक लाग च्यादर टन्ठैं– भोर भइल भिनसरिया रे, मुरगा बाग बोलैं । छोरो हो बरडिवा आपन बरडा, मैं पनघट जैबुँ ।।१।। बरडा टे छोरल बरडिवा रे, खेटुवम पुगैलाँ । लेउ हो हरोहियो आपन बरडा, मैं घाट छेके जैबुँ ।।२।। औरे गीतके प्रसंगमे एक गृहिणी बिहान हुइल, मुर्गासमेत बोलसेकल । टबेमारे आब टे गोरु छोरो कहिके अपन स्वामीहे घारिमसे  गोरु निकरना आग्रह करठि । उहाँ टे गोरु खेतमे पुगैना फेन सहयोग करटि कठि, लेउ गोरु सम्हारो, मै टे पानी भरे घटवाओर लागटु । खेतीपाती प्रसंगके अन्य गीत खेतीपाती प्रसंग जोरल विविध गीत थारू समुदायमे रहल बा । बिउ लगैना बेला छुट्टे बिया–बैठौनी गीत गा जाइठ । जेठमे जाब असारे नाइ आइब सावन गुडिया खेलब नइहरवे । सावन जाब भादो रे नाइ आइब भादोमे बरत भुखब नइहरवे ।             बमबहादुर थारू, रूपन्देही (२०७७) यी गीतमे बाह्रैमासके वर्णन रहल बा । यहाँ एक चेली कठि, जेठमे जाब, असारमे नै अइम । सावनके गुडिया खेलम लैहरमे । सावनमे जाब, भदौके व्रत बैठम लैरहमे । भदौमे जाब, कुँवारके नै अइम । कात्तिकके दिया बारक लैहरमे । अगहनमे जाब, पुसमे नै अइम । माघमे त्रिवेणी लहाइम लैहरमे । माघमे जाब, फागुनके होली खेलम लैहरमे । धान लगाके, धान पनाके ओराइल खाली समयमे थारू महिला बलहा (पिङ) बनाके ‘सावन बलहा गीत’ फेन गैठैं । यी गीतमे सावन महिना सम्झटि लैहर  याद करठैं । भैया घोरवा लेके लेहे आइल कल्पना करठि । भैयाहे मिष्ठान्न भोजन डेठि । छावासहित भैयासँग लैहर जैठि– उँचवे अमर चढी बैनी जे चितवे, बिरन सावन रे, नैहरेक लोग नाही आवे, सावन रे सुहावन रे पिसहु रे मैया बिरहन सतुववा, बिरन सावन रे, हम जाब बहिनी बोलावे, सावन रे सुहावन रे घोडवा बान्हहु भैया, ओही घोडसरिया, बिरन सावन रे, बैठा भैया लाली पलङिया, सावन रे सुहावन रे ।                                (सीताराम थारू, रूपन्देही) ओरौनि खेतीपातीके बेला गैना सजना गीत थारू समुदायमे लोकप्रिय बा । विडम्बना मोबाइलमे गीत सुन्टि रमैना नयाँ पुस्ताहे अइसिन पौराणिक गीतमे रुचि, चास नैहो । नेपालमे कृषि प्रणाली जत्रा पुरान बा, ओत्रे पुरान सम्बन्ध थारूलगायत टमान समुदायके लोकगीतमे बा । विडम्बना हर ओ हरोइयाके ठाउँमे ट्याक्टर ओ ड्राइभर, धान लगैना मेसिनसे करना प्रविधि आके कृषि प्रणालीमे आधुनिकता छाइलसँगे कृषिसम्बन्धी लोकगीत लोप हुइना अवस्थामे पुगल बा । कुछ थारू गायक धान लगैना गीत रेकर्ड करे फेन लागल पा जाइठ । मने, लोकसंस्कृति/गायन संस्कृतिहे जीवन्तता डेना, संरक्षण करक लग स्थानीय तह रोपाइँ गीत प्रतियोगिता आयोजना करना जरुरी डेखाइठ । साभारः गोरखापत्र दैनिकमे छापल लेखके थारु उल्ठा पहुरा दैनिकसे

महाभूकम्पको सामनाः मृत्युसंग साक्षत्कार

महाभूकम्पको सामनाः मृत्युसंग साक्षत्कार

३७६ दिन अगाडि

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१२ वैशाख २०८२

सुशील चौधरी महाभूकम्प २०७२ वैशाख १२ ले ९ हजार भन्दा बढीको ज्यान लियो । हजारौ घाइते भए, लाखौलाख घरवारविहीन भए । त्यसमध्ये परिवार मेरो पनि प्रत्यक्ष प्रभावित परिवार रहन गयो । भूकम्पको पीडा बिर्सन नसकेर काठमाडौको अस्थायी बसोवास पनि मैले बर्दिया सारें । प्रवेशिका परीक्षा दिन तयार छोराको विद्यालय पनि स्थानान्तरण गर्नुपर्‍यो । धन्न शिक्षा मन्त्रालयले भूकम्पपीडित परिवारले सहजै आफ्ना बालबालिकाको विद्यालय स्थानान्तरण गर्ने अनुमति दियो ।   भूकम्पको दिन दिन (१२ देखि १४, बैशाख, २०७२) मा मैले जे देखें, त्यो क्षण र परिवेश मेरा लागि अविस्मरणीय छन् । म कहिल्यै भुल्न सक्नेछैन । जीवन र मृत्यु आकस्मिक कुरा हो, भाग्य भन्ने चिज छ भने मैले भाग्यले आजको जीवन पाएँ । संगै धरहरामा गएर पनि म धरहरा नचढ्नाले ज्यान जोगियो । त्यही धरहरामा मृत्युवरण गरेका भतिजले एक पटकमात्र आग्रह गरेको भए, सायद मैले टार्न सक्दिन थिए वा मिल्दैनथ्यो । उनी यति आत्मविश्वासी थिए कि आँटेको काम गरि छाड्थे । मलाई लाग्छ, सानोबाबालाई किन दुःख दिने भनेर उनले केही नभनी पूmर्तिका साथ भर्याङ उक्लिए । एसएलसी दिएर आएका जिज्ञासु युवकले दुई–तीन मिनेट धरहराभित्र जाने गेटैमा राखिएका ठूला–ठूला होर्डिङबोर्डका सूचना पढ्न समय विताएका भए उनी जोगिने थिए ।  भतिजको मृत्युपछि उनको आमा–बुवालाई कसरी बताउने र कसरी त्यो पीडा सहन गर्न सक्ने हुन् र मलाई के भन्ने हुन् भन्ने पीडादायी र अप्ठ्यारो परिवेशले मेरो हृदय छिया छिया भएको थियो । धरहरा ढलेर आफन्त गुमाएर सहाराविहीन भएर एकसुरे दिमाग लिएर फर्कदा बसन्तपुर दरवारको उराठ उजाड अवस्था देख्दा म झण्डै बेहोस भएको थिएँ । निरन्तर परकम्पका बीच काठमाडौका सडकहरुमा मोटरसाइकिलमा हुइकिँदा साँझ के धनी के गरीव, के नेता के जनता र सर्वसाधरण आफ्ना आलिशान महल छाडी सिरक र तन्ना च्यापेर खुल्ला ठाउँमा बास बस्न निन्याउरो अनुहार लगाई भौतारिरहेको दृश्यले मानव जीवन बुझ्न सघायो । सम्पत्तिको शान त क्षणिक रहेछ । प्रकृतिले कसैलाई विभेद गर्दो रहेनछ । जतिसुकै धनसम्पत्ति आर्जन गरेपनि विपत्तिमा त मान्छे नै चाहिने रहेछ ।  महाभूकम्प व्यहोरेको एक वर्षलाई फर्केर हेर्दा कठिन राजनीतिक अवस्थालाई निकाश दिन मुख्य राजनीतिक दलहरुबीच राजनीतिक सहमाति जुटाउने सवालमा महाभूकम्पले ठूलो भूमिका खेल्यो ।  संविधानसभाले नेपालको संविधान २०७२ असोज ३ गते जारी गर्‍यो ।  तराईकेन्द्रित आन्दोलन र नाकाबन्दी साथै त्यसले सिर्जना गरेको आपूर्ति व्यवस्थाको अवरोध सरकारको जिम्मेवारीवाट भाग्ने बलियो बहाना बन्यो । लामो राजनीतिक खिचातानी पछिभूकम्प पछिको पुनःनिर्माणका लागि प्राधिकरण त बन्यो तर अपेक्षाकृत काम सुरु गर्न सकेन । यही परिवेशमा म पुनः आफ्नो परिवेश, पीडा, अनुभूति साट्ने जमर्को गर्दैछु ।  २०७२ बैशाख १२ गते शनिवार परेको थियो । मेरी जेठी सासुको कान्छो छोरा भतिज (जगतराम थारु, वर्ष १६) प्रवेशिका परीक्षा सकेर घुम्न काठमाडौ आएको हप्ता दिन पुग्दै थियो । मेरो अफिसको कामको व्यस्तताका कारण घुमाउन लिएर जान सकेको थिएन । शनिवार परेकोले सो दिन विहानको खाना चाडै खाएर १०.३० बजे मोटरसाइकलमा हिँड्यौं । नैकापबाट कलंकी हुदै भोटेवहालको बाटो हुदै सबैभन्दा पहिले टाढैबाट धरहरा देखाएँ । न्युरोड, रत्नपार्क, रानी पोखरी, कान्तिपथ, नारायणहिटी, दरवारमार्ग हुदै सिंहदरवार, अनामनगर छिराएर संविधानसभा भवन देखाएँ । बानेश्वर चोकपुग्दा पुग्दा नपुग्दै मेरो मनमा दोधार भयो । शंखमुल हुदै पाटन कृष्णमन्दिर लैजाने कि सुन्धारा लैजाने ? ठिक त्यसैबेला माइतीघर तर्फको बाटो खुल्यो । बिहान सुन्धारा पुग्दा फर्केर आएर धरहरा चढ्ने  र मःमः खाएर घर फर्कने योजना गरेकोले मोटरसाइकिलको हैण्डल माइतीघर तर्फ मोडियो । सुन्धाराको पूर्वपट्टि रहेका निःशुल्क पार्किङ क्षेत्रमा मोटरसाइकिल राखेर टिकट घरतर्फ हान्नियौं । म आफै अभिभावकको भूमिका निर्वाह गर्न पाएकोमा दंग थिएँ भने भतिज धरहरा चढ्न लालयित भतिज फुर्तिलो ढंगले टिकट घरको सिढी चढे । उनको अनुहार खुशीले धपक्क बलेको थियो । म चिनी रोगी भएकोले दुई घण्टासम्म निरन्तर ड्राइभिङ गरेकोले केही शिथिलता महसुस गरिरहेको थिएँ । त्यसैले धरहरा नचढ्ने सोच बनाएँ । पचास रुपैयाँको टिकट किनेर भतिजलाई दिंदै जाउ चढेर आउ, म यही बगैचामा आराम गर्छु भनें । फेरि सोचें, उनी माथि गएपछि उनको फोटो कसले खिचिदेला । माथि धरहराको टुप्पोमा हेरें, आठ दस जना मानिसहरु देखिए । त्यहीका कसैलाई फोटो खिच्न अनुरोध गर्नु भने, उनले हवस् भनेर खुरुरु धरहराको प्रवेशद्वारतर्फ हानिए । म पूर्वको बगैचातर्फ लागें । नियतिको मिति पुगेको मलाई के थाहा, म भतिज धरहरा चढेर फर्केपछि मज्जाले मिठो मःमः खाँदै काठमाडौ घुमाईको अनुभव साटौला र भोलिको घुम्ने योजना बनाउँला भनेर मनमा खेलाउँदै के थिए, आफू असन्तुलत भएको महसुस गरें । हर्दाहर्दे म बगैचाको फलामको कुर्ची समातेर अडिने प्रयास गर्न थाले । फर्केर धरहरामाथि दृष्टिपात गर्दा त निरीह धरहरा घडीको लंगुर जसरी हल्लिरहेको थियो । क्षणभरमै धरहरा गल्र्याम्मै पश्चिमतर्फ ढल्यो । सुन्धारा पुरै धुलोले पुरियो । म अवाक भएं ।  मेरो छेउछाउका मानिसहरु रुन कराउन थालेपछि म पनि होशमा आाएछु । आफूसंगै केही क्षण आत्मियतका साथ कुराकानी गरिरहेको व्यक्ति धरहरासंगै ढलेको अवस्था थियो । सबै चिज गुमाएको बेसहारा मानिस जस्तो भएँ म । कति सपना बुनेर धरहरा चढेको छोरा सपनासंगै अलप भयो । सबै मानिसहरु आफन्त खोज्न पल्टिएको विवश खण्डहरको धुलोमा खोस्रन थाले । म पनि मुटुमा उर्लिएको पीडा र आँखामा बगिरहेको अश्रुधारासंगै आफ्नो मान्छे खोज्न थालें । त्यो धरहराको धुलोमा तप तप खसिरहेको आँसु विस्तारै बिलीन भइरहेका थिए । कतिपय जिउँदा व्यक्तिहरु भेटिइरहेको बेला कतै भतिज जिउँदै भेटिइ हाल्ने हुन् कि भन्ने झिनो आसमा खोज्ने सकेको प्रयास गरें ।  एक घण्टाको अनवरत खोस्राइपछि उनको जुत्ता सहितको खुट्टा भेट्टाएँ । उनले हिंड्दा जुत्ता लगाउँदै गर्दा मेरो नजर जुत्तामा परेको थियो । के थाहा, त्यही चिज उनको मृत्युको पहिचान गर्ने कुरा बन्ला भनेर । मैले अनुमान लगाएँ, उनी सातौ तल्लासम्म पुगेका रहेछन् । ठूलो चाङले शरीर च्यापिएकोले तत्काल निकाल्न सम्भव थिएन । केही क्षणपछि नेपाली सेनाको उद्धार टोली आवश्यक तयारीका साथ आइपुग्यो । चार पाँच घण्टा लगाएर धरहराका सबै भग्नावशेष छेउ लगाएर सबै घाइते र लाश निकालियो  ।  घटना त भयो, अब घरमा कसरी जानकारी गराउने भन्नेबारे म चिन्तामा परें । एकैपटक मृत्युको खबर कसरी दिने ? आखिर भन्न त भन्नै पर्छ । बर्दिया, गुलरियामा बस्ने भाई मानबहादुरलाई अवस्थाको बारेमा जानकारी गराएँ । गाउँका बरघर र जान्ने सुन्नेलाई अवस्था बताउन भनें । विस्तारै बताउने कुरा गरें । उता, मैले लाश नभेटाइसकेकोले अझै जिउँदै भेटिन सक्ने आशा मरिसकेको थिइन । साँभ mसात बजे घाईते र लाश राखिएको ठाउँमा गएँ । ट्रमा सेन्टरमा घाइतेहरु राखेकोले सबैभन्दा पहिले त्यहाँ खोजें, त्यसपछि बीर अस्पतालका पेटी, वार्दली, कोठा र आँगन चहारें । सयौको संख्यामा रहेको शव लस्करै राखिएका थिए । पहिचानका लागि हेर्दै गएँ, त्यहाँ पनि फेला पार्न सकिन । मन झनै हडबडायो । त्यहाँ केही पीडित परिवारले घाइतेहरु शिक्षण अस्पताल महाराजगंजमा राखेको छ अरे, भन्ने कुरा गरिरहेको सुनें । कतै मेरो मान्छे पनि घाइते मात्र पो छन् कि भनेर केही आशा लिएर, टिचिङतर्फ हानिएँ ।  उता, भूकम्पको ससाना पराकक्पन निरन्तर आइरहेको थियो । तर, त्यसको कुनै प्रवाह भएन । कसरी जिवित वा मृत अवस्थामा आफ्नो मान्छे भेटिन सक्छ भन्ने मात्र ध्याउन्न थियो । शिक्षण अस्पतालको परिसर भरिभराउ थियो, घाइतेहरुको उपचार भइरहेको थियो । घाइते र मृतहरुको सूची पनि हेरें तर पाइन । तब, शव राखिएको हलमा पुगें । एक एक गरी हेर्दै जाँदा भतिजको शव बल्ल फेला पारें । सग्लो शरीर, चौडा छाती, हातमा घडी, कम्व्याट ड्रेसमा सजिएको उनको शव बरफमा राखिएको थियो । पीडाका आँसु झर्न थाले वागमती भएर । यसरी अधैर्यताका साथ आफन्तको खोजी गर्दा मानिसका शवहरु बीचमा रहँदा भूकम्पको सामना मात्र गरिरहेको थिइन कि मृत्युसंग आमने सामने बसेर साक्षात्कार पनि गरिरहेको महसुस भइरहेको थियो । म संगै गएका साथी तथा घरबेटी चुर्ण वलीजीलाई ईसारा गर्दै शव चिनाएँ । शव पहिचानका लागि कागजात तयार गरिरहेको प्रहरीलाई आफ्नो मान्छे भएको बताएर नाम, वतन दर्ता गराएँ ।  शव त भेटियो, अब दाहसंस्कार यतै गर्ने कि लिएर गाउँ जाने, लिएर कसरी जाने ? ठूलो संकट आयो । गाउँबाट पनि घरी लिएर आउन सुझाव आउँथ्यो भने घरी त्यतै अन्त्यष्टी गरिदिन भनिन्थ्यो । तर म भने सकेसम्म शव गाउँ नै लिएर जाने सोचमा थिएँ । किनकि आफूकहाँ आएको बच्चा आफैले घुमाउन लैजाँदा भूकम्पमा परी मृत्यु भएकाले उनको आमा बाबु र आफन्तले अन्तिम पटक मुख हेर्न पाए भने राम्रो हुने कुरामा म अडिग थिएँ । मैले गाउँ लैजान काठमाडौका सबैजसो एम्बुलेन्स र शव वाहनहरुसंग विन्ति गरें । तर, यस्तो कठिन अवस्थामा उपत्यका बाहिर जान नसकिने बताए । साथी कृष्ण गौतमले पनि मलाई सघाउनु भयो तर केही लागेन । म निराश भएँ । अनिश्चितताको बालद मडारियो मानसपटलमा । पहिचान गरिएका शवहरु बुझ्दै आफन्तहरु जान थाले, शवहरु निरन्तर आइरहेका थिए । गर्मीको महिना दुई दिन बितिसक्दा शवहरु गनाउन थालिसकेका थिए । त्यसकारण सरकारले पहिचान नभएका शवहरु महानगरपालिकाले अन्त्यष्टी गर्ने निर्णय गरिसकेको थियो ।  ९औ थारु साहित्य राष्ट्रिय सम्मेलनमा पुरस्कृत भएका लेखक सुशील चौधरी आफ्ना भनाई राख्दै । ब्रेन ह्यामरेजका कारण उनी विरामी छन् । मैले नेपालगन्जबाटै शब वाहन लिएर आउन अनुरोध गरें । मेरो अनुरोधलाई स्वीकार गरेर शववाहन आउने भयो । गाउँमा सबैले गक्ष्यअनुसार सहयोग जुटाएर पठाउने व्यवस्था मिलाएका रहेछन् । गाउँबाट बरघर (दुर्गा थारु) जो नाताले मेरा मामा हुन् र मेरो अति मिल्ने साथी दुःखलाल चौधरी, अरु दुईजना आफन्तसहित् १३ बैशाखका दिन हिँडे । १४ गते बिहान १० बजे सम्ममा आइपुग्नु पर्नेमा मुगलिङ खण्डमा सुख्खा पहिरो गएर त्यहीं रोकिए । प्रहरीले छिटो शव उठाउन भन्न थाल्यो । आफ्नो शववाहन आइपुग्दैन । हुलमुलमा आफन्तको शव अरुले नै पो उठाएर लग्ने हो कि भन्ने अर्को डर । बल्ल बल्ल साँझ ७.०० बजे नेपालगन्जबाट शववाहन आइपुग्यो । मैले सन्तोषको लामो सास फेरें । साथीहरु भएपछि आँट पनि थपिदो रहेछ । १५ गते बिहान १२.०० बजे शव कालिका– ३, मयुरवस्ती, बर्दिया पुर्‍याइयो । थारु संस्कारअनुरुप अन्त्येष्टी कर्म गरियो ।  आफ्नो घरमा बस्न आएको बच्चा आफूले घुमाउन लैजाँदा महाभूकम्पमा परी मृत्यु भएको अवस्थाले म र मेरो परिवार मर्माहत भएका थियौं । जति दुःख भएपनि आफैलाई होस, अरुलाई नहोस् भनेर सोच्ने व्यक्ति आज त्यस्तो घटनामा पर्दा ग्लानी भयो । राम्रो गर्न खोज्दा पनि कहिलेकाही परिवेशका कारण अप्ठ्यारोमा परिने रहेछ । म आफैलाई त यति पीडा महसुस  भइरहेको छ भने हुर्केको सन्तान गुमाउँदा उनका बुवा आमालाई कति पीडा भएको होला, म अनुमान लगाउन सक्दिन । सायद, त्यो अभाव कहिल्यै पूर्ति हुनेछैन । करीब दुई महिना मैले नयाँ कुरा सोच्नै सकिन । जेठमा गाउँका सबै आफन्तहरुलाई निम्ता गरेर पूजा लगाइयो । धेरै वर्षदेखि कामको सिलसिलामा गाउँ बाहिर रहकोमा सबै गाउँलेलाई निम्ता गरेर भलाकुसारी गर्न पाउँदा मनमा एक किसिमको आनन्द आउँदो रहेछ । म दश वर्ष पछि पुनः गाउँ फर्केको थिएँ । सबैले माया दिए, मेरो आत्मविश्वास बढेर आयो ।  महाभूकम्पको एक वर्षको अवधिमा राज्यको तर्फबाट जुन रुपमा पुनस्थापना र पुननिर्माणका लागि तदारुकता देखाउनु पर्ने हो, नसकेका कारण एक वर्ष वितिसक्दा पनि भूकम्पपीडित जिल्लाका प्रभावित परिवारहरु पालमा बस्न बाध्य भए । सरकारी तथ्यांकअनुसार, धरहरामा साठी जनाको ज्यान गयो । मृतकलाई सरकारले जम्मा एक लाख चालीस हजार राहत प्रदान गरेको छ । धरहरा सञ्चालनको जिम्मेवारी लिएको संस्थाले विना विमा टिकट काटेर पैसा कमाएको कुरा सार्वजनिक भएको छ । पछि प्रधानमन्त्रीको आश्वानमा आफ्नो धरहरा आफै बनाउने घोषणा पनि गरियो । तर धरहरा भत्किदा ज्यान गुमाएका र घाइते भएकाहरुको अधिकारको सुनिश्चितता नगरी काम थाल्नु कत्तिको न्यायोचित होला । जीर्ण अवस्थामा रहेका इमारतको दुरुपयोग गरी पैसा कमाउने अनि घटनाप्रति जिम्मेवारी नलिने प्रवृत्तिले भोलिका दिनमा कस्तो सुरक्षा हुन सक्ला ? (पुनः प्रकाशित)  

मोदाहा थारूले फर्काएको माघीको रौनक

मोदाहा थारूले फर्काएको माघीको रौनक

४७६ दिन अगाडि

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२ माघ २०८१

माघ लहैनु सुरीक शिकार खैनु रे हाँ... । यस प्रसंगमा पर्वको नाम माघ भन्नुपर्छ तर आजभोलि माघी भन्न थाले । यसमा कतिपयको चित दुखाई रहेका बुझ्ने हो भने कसले माघी भन्न लगाए ? प्रश्न उठ्छ । शायद यो प्रश्नले त्यति ध्यान आकर्षित गर्न नसक्ला कि ? यो आलेखमा यस्ता प्रश्नको जवाफ खोजी गर्ने भन्दा पनि कसरी मोदाहा थारुले माघीको रौनक फर्काउन सफल बन्यो ? प्रस्तुत विषयले पक्रन खोजेको चीज यसकै वरिपरि घुम्ने छन् । अझ मासिन्या मतवाली बनाइएका थारु जातिले आधुनिक नाच तथा मञ्चको सजावट निष्फिक्री तवरले आयोजना गरी माघी बहार ल्याउने गर्छ । करीब एक लाख हाराहारीमा मानिस टुँडिखेलमा भेला भई माघी महोत्सवमा रमाइलो गर्दछन् ।  पहिलो चोटी २०५८ सालमा माघी महोत्सव मनाउने र सरकारलाई यो दिन सार्वजनिक विदा दिन लगाउने निर्णय काठमाडौमा भयो । पूर्वका थारुहरु तिलासंक्राईत बुझ्ने, कतै खिचरी वा खिचरा बुझ्ने र पश्चिममा माघ मनाउँदा निस्राऊको महत्व दर्शाउने गरेको कारण माघी महोत्सव एकमुष्ट साझा बनाउने ध्येयका साथ अंगिकार गरियो ।  माघीमै वितेका यी २५वर्ष छविलाल कोपिलाको “भन साथी ! तिम्रो माघीसंग के छ ?” शीर्षक कविताले नयाँ वहसको ढोका खोलेको छ । माघीसंग अपनत्व बोध गर्न थारुले चुनौतीको सामना गर्दैछ । कारण थुप्रै होला तर माघीको बजारीकरण यति तीब्र रुपमा भयो कि मोदाहा (रक्स्याहा) थारुको रमझममै माघी महोत्सव हुँदै आयो ।  माघी महोत्सव मनाउन काठमाडौमा नेपाल सरकारले पर्यटन प्रबद्र्धन परियोजना अन्तरगत केही आर्थिक सहयोग गर्ने गर्दछ । यसरी प्राप्त सहयोगबाट नपुग रकम जति स्टल तथा व्यापार प्रबद्र्धनका लागि राखिने होर्डिङ बोर्डहरुको नाममा असुल गर्ने गरेको छ । यस विषयमा प्रा.एन्थोनी स्मिथ लेख्छन्–“पर्यटनले सबै संस्कृतिलाई वस्तुकरण गर्दै बजारका निमित्त संस्कृतिको मुल्य तोक्छ र अन्ततः साँस्कृतिक विशेषता र भौगोलिक वैभव विनाश गर्छ ।” यो तर्कलाई नेपालमा छरिएर रहेका आदिवासी जनता र नवउदारवादको आडमा थप वलियो देखिएका पर्यटन उद्योगले सही सावित गर्दैछ । तामझामका साथ मनाइने माघी महोत्सव सामाजिक प्रतिरोधी क्षमतामा ह्रास ल्याए जुन टुंडिखेलको मैदानमा चारैतिर अग्लो फलामे घेराभित्र कैद हुँदैछ । यहाँबाट आन्दोलनको आँधीवेरी ल्याउने चर्का भाषण गरेको त्यहीं पर सामुन्नेको सिंहदरवारमा बस्ने शासक नसुन्ने भए । माघको सन्दर्भमा भन्न सकिन्छ कि “देख्ने तो लग्ता है साला बाँस जैसा लम्बा मगर अन्दर से है खोख्ला ।”  लगानीको हिसावले माघी महोत्सवको बजेट पच्चिस लाख रुपैयाँभन्दा अधिक देखिन्छ । तथापी आयोजक संस्थाहरुको अनुसार खर्च पन्ध्र लाख माथि पुग्छ । यतिका खर्च गरेर माघी महोत्सव मनाइदै गर्दा त्यहाँ आमन्त्रित पाहुनाहरु बोलिरहेको समयमा मञ्च पर पर देखिने दर्शकहरु जब नाचको पालो आउँछ, उनीहरु मञ्च वर वर आउने गर्दछन् । यसले सावित गर्छ कि थारु सचेत धक्का दिन तयार भइसकेका छैनन् । अर्थात् थारुका अगुवाहरु यही मात्रात्मक उपस्थितिलाई सफलताको कडी मान्दै आएका छन् । जबकी मात्रालाई गुणमा रुपान्तरण नगर्दासम्म शक्ति आर्जन हुने विषय असम्भव छ । आयोजक संस्थाहरु एनजीओ चेतनाले लैस भएकै कारण उनीहरु जातीय मतान्धतामा फँसिरहे । यो खतरनाक परिवेश हो । पहिचान राजनीतिको र उनीहरु आफ्नै बलबुताले यो गोलचक्करबाट मुक्ति पाउने छैन । माघी महोत्सवबारे चर्चा गर्दा यो सामुहिकता प्रतिनिधित्व गर्ने पर्व बुझिन्छ । अझ कृषि अर्थतन्त्रमा बाँच्ने थारु खोज्नी बोज्नी शुरु गर्ने अथवा माघ देवानीमार्फत् अगुवा, भलमन्सा निर्वाचित गर्ने परिपाटीलाई निरन्तरता दिने पर्व बुझ्दै आए । यहाँ व्यक्तिगत स्वतन्त्रता र मुल्यको प्रवद्र्धन स्वीकार गरी त्यसलाई अझ लोकसम्मत बनाउने आचरण एवम् व्यवहारलाई प्रधान पक्ष ठहर गरिए । केन्द्रमा खुशीको सपना सजाए । कुल ग्राहस्थ खुशी लक्ष्य राखे र प्रकृतिसंग सामञ्जस्य कायम गर्दै जीवन सहज बनाए ।  जीवन सहजबाट जटिलतर्फ यात्रा तय गर्दैछ । नयाँ नयाँ ज्ञान तथा प्रविधिबारे जानकारी लिने प्रयत्न पनि हुँदै आएको छ । अझ तिब्र परिवर्तन भइरहेको अवस्थामा संसारभरि नै अनिश्चिताको परिवेश देखा परे । यसले ज्ञान मिमांशीय विफलता तर्फ लागेको कारण मुल्यमा ह्रास हुँदैछ । जीवनको गनतव्य नै यसमार्फत् धरापमा पर्दैछ । तसर्थ, चौतर्फी जोखिमको मार थपिंदै मानिसहरुमा त्रास बढेर गएको भान हुन्छ । आफूलाई सुरक्षित बनाउनकै लागि उनीहरु शहरतिर पस्ने र सामुदायिक विमुखताबाट राहत पाउन साँस्कृतिक झुकाव दर्शाउने परम्परा बसाल्न खोजेको देखिन्छ । थारुहरु अन्जानमै आधुनिकताको सुविधामा उत्साहित बन्दै गर्दा माघी महोत्सव वर्षेनी यसैको एक नमूना भई दलाल पूँजीवादी फन्दामा कसिंदैछ । विकृति र विसंगति हटाउने उद्देश्य बोक्नेहरुकै करकमलबाट यस अवसरमा असंगतिपूर्ण नियत प्रष्टिन्छ । अविश्वासले जरा फैलाउन पाउने गर्छ । मोदाहा थारुको नियन्त्रणमा रहेको माघी महोत्सव अब टुँडिखेलको चार दिवारबाट बाहिर आउनैपर्छ । माघ १ गते सैयर माघ अथवा माघ संकल्प संझाउने दिन भनौं । त्यो महोत्सव नै भएपनि माघ देवानीलाई केन्द्रमा राखौं । परिस्थिति राष्ट्रिय स्तरमै फेरिएको कारण शक्ति उत्सर्जनको फ्रेमवर्क अथवा पाराडाइम बदलिन पुगे । संक्रमणकालीन अवस्था लम्बिएको छ र परिस्थितिको ठोस विश्लेषण गरी माघ संकल्पमा थारु स्वायत्त क्षेत्र अथवा विशेष क्षेत्र ग्यारेन्टी गर्न आह्वान गरौं । अभ्यास गर्न माइन्डस्केप, ल्याण्डस्केप र सोसलस्केपमा घनिभूत तथा योजनाबद्ध काम गरौं । यस आधारमा अग्रसरता लिई माघ संकल्प पुरा गर्न दृढता देखाऔं । निरन्तरतामा क्रमभंग गर्न हिम्मत गर्ने हो ।  प्रतिरोधी चेतमार्फत् समाज विज्ञानमा द्वैध अवस्था सिर्जना भइरहनुपर्छ । यसलाई छविलाल कोपिलाले मलजल गर्दै “भन साथी ! तिम्रो माघीसंग के छ ?” भन्ने सवाल तेर्साए । यसको जवाफमा संवादात्मक परिवेश निर्माण गर्ने हो ता कि हाल माघी महोत्सवको नाममा भइआएका विसंगतिहरु सतहमा ल्याउन सकियोस् । साहित्यकारको शब्द वाण फगत सस्तो लोकप्रियताका लागि त हुँदै होइन, बरु यसलाई अलग दृष्टिकोणको रुपमा बुझ्न प्रयत्न गरे सही दिसा पक्रन सघाउँछ । उहाँको शब्द वाणहरु सुन्ने आँट थारु अगुवाहरुले गर्न सक्नुपर्छ । अन्त्यमा, माघ संकल्प पुरा गर्न एक व्यवहारिक नारा पनि चाहिन्छ । थारु संस्कृति प्रवद्र्धन र विकासको नारा आफैंमा हराउने खालको देखियो । थारु संस्कृतिको सिर्जनात्मक प्रयोग गर्न जुन अलमल देखा परे । आज सहजबाट जटिलतातर्फ उनीहरुको जीवनशैली प्रतित हुन्छ । विकसित देश क्यानाडाबाट काठमाडौमा आई आत्महत्या गर्न पुगेको सुनसरीका माझी दम्पतिको कथाले यही सार खिंचेको बुझ्न सकिन्छ । २५ वर्षदेखि काठमाडौको धर्तीमा थारु संस्कृति प्रवद्र्धन गर्न मनाउँदै गरेको माघी महोत्सव आगामी वर्ष मात्र माघ १ गतेका लागि मोदाहा थारुले फर्काएको माघीको रौनक नबनोस् ।  प्रकृति र मानव जीवन सामञ्जस्य कायम गर्दै अगाडि बढ्नुपर्छ । थारु संस्कृति प्रवद्र्धन गर्नुको अर्थ धर्ती माताको अधिकार संरक्षण गर्नु पनि हो । मघौटा नाच थारु संस्कृति भित्रका विषय वस्तु (कन्टेन्ट) हो । माघ नयाँ वर्षको रुपमा थारु आत्मसात गर्दै गर्दा यसका साँस्कृतिक विरासत विर्सिन मिल्दैन । हामी थारु आर्थिक वर्षको नविकरण गर्ने संस्कृतिलाई सम्झना गर्न अभिप्रेरित हुँदैछौं । यथार्थमा माघ संकल्प सामुहिकतामा झल्किएता पनि त्यहाँ व्यक्तिको अस्तित्व विद्यमान भई आएका हुन्छन् । त्यसैले व्यक्तिको चाहना र अस्तित्वलाई सम्मान गर्दै माघ संकल्प वर्षभरिको कर्म, पूजा पाठ, संगठनात्मक सोंच तथा सामाजिक उत्तरदायित्व सम्बन्धमा कार्ययोजना पारित गर्नुपर्ने हुन्छ । यसलाई राजनीति शास्त्रमा थारुको वडीपोलिटिक भने पनि अन्यथा हुनेछैन ।  लोकतन्त्रको अभ्यासलाई जीवन पद्धतिसंग एकाकार गर्दै सामुदायिक समाजवादप्रति आफ्ना विश्वास कायम राख्न सक्ने थारु  रणनीतिक लक्ष्यमा अडिग रहेको छ । यसलाई माघ संकल्पको आधारमा कार्यनीतिक चाल मिलाउने तथ वर्षभरिको कामको समीक्षा गर्ने सन्दर्भमा केही प्राविधिक विषयप्रति व्यवहारिक लचकता अपनाउन सके यो देशमा थारु समस्या हैन, समाधान हुन् भनी प्रमाण पेश गर्न सकिन्छ । तसर्थ, माघ संकल्पको सम्बन्धमा यो वर्ष एक वहुलराष्ट्रिय लोकतन्त्र संस्थागत गर्ने चार्टर जारी गरौं र त्यसलाई मार्गनिर्देशक ठानी वर्ष दिनको कार्ययोजना तयार गरेर इमानदारिताका साथ लागु गरौं । तबमात्र, नेपालको सन्दर्भमा साँचिक्कै थारु विशिष्ट देखिनेछ । हिम्मतवाला थारु कहलिन योग्य हुनेछौं ।   

थाकस २३औं महाधिवेशनः नङ्गा नाच–एकताको सन्देशमा आँच 

थाकस २३औं महाधिवेशनः नङ्गा नाच–एकताको सन्देशमा आँच 

५३२ दिन अगाडि

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५ मंसिर २०८१

थारू कल्याणकारिणी सभा सामाजिक संस्था हो भन्नेहरु प्रशस्तै छन् । प्रश्न उठ्छः एउटा सामाजिक संस्था आफ्नो जीवनको महत्वपूर्ण हिस्सा मानिएको महाधिवेशन एकताको सन्देश बाँड्ने नाममा के कारण होला कि आफ्नो स्वायत्तता गुमाउने अवस्थाबाट गुज्रियो । भैरहवामा यही मंसिर पहिलो साता भएको थाकसको २३औ महाधिवेशनमा महाधिवेशन प्रतिनिधिको बिचबाट निर्णय नभई स्टार होटलका कोठाबाट भएको दिन देख्नु पर्यो ।  स्टार होटलका कोठाबाट भएको निर्णयलाई थारू एकताको सन्देश भन्ने मत स्वीकार गर्ने हो भने तीन सयभन्दा अधिक प्रतिनिधिहरु र २६ जिल्लाका सभापतिहरुले आफ्नो आफ्नो जिल्लाका थारूलाई हामी खुशी बाँड्न आयौं भनेर ढुक्क हुँदै भन्न सक्छन् त ? अहं उहाँहरु सक्नुहुन्न । किनकि उहाँहरु नङ्गा नाच हेरेर फर्किनुभएको छ । बन्धक बनेको पीडा अनि थोपरेका निर्णयको भारी बोकी आगामी तीन वर्ष गुजार्न विवश बनेका छन् ।  परिवर्तन स्वीकार्न नसकी यथास्थिति कायम रहेको महसुस गर्ने अगुवा पदाधिकारी तथा केन्द्रीय सदस्यहरु भरोसायोग्य थारू कल्याणकारिणी सभा निर्माणमा योगदान दिने योजना किन वहसमा ल्याएनन् ? किन गोलचक्करको यात्रा तय गर्न सहज ठाने ? अर्थात् आन्तरिक लोकतन्त्रको अभ्यासलाई बन्ध्याकरण गर्न पछि नपर्ने अगुवाहरु यस संस्थामा आउने राजनीतिक दवाव झेल्नु पर्दा कुन हिम्मतले साथ समर्थन देलान् ? म दावा गर्छु कि तदर्थवादको शिकार थारू कल्याणकारिणी सभा यस पटक पनि भयो ।  परिवर्तन स्वीकार्न नसकी यथास्थिति कायम रहेको महसुस गर्ने अगुवा पदाधिकारी तथा केन्द्रीय सदस्यहरु भरोसायोग्य थारू कल्याणकारिणी सभा निर्माणमा योगदान दिने योजना किन वहसमा ल्याएनन् ? किन गोलचक्करको यात्रा तय गर्न सहज ठाने ? थारू कल्याणकारिणी सभाको २३औं महाधिवेशन मंसिर ५ गते सम्पन्न भएको घोषणा भयो । सबै पदाधिकारी तथा सदस्यहरु निर्विरोध निर्वाचित भएका छन् । यो प्रक्रियामा निर्वाचन समिति पनि सहज महसुस गरेको र निर्वाचनका सबै प्रक्रिया पुरा गरी आएको कारण निर्वाचित सबैलाई उत्तरोत्तर प्रगतिको कामनासहित सफल कार्यकालको लागि हार्दिक शुभेच्छा छ । थारू कल्याणकारिणी सभाले करिब आठ दशकभित्र २३ वटा महाधिवेशन सम्पन्न गर्नु परिपक्वताको ठूलो आश गर्नु अनुचित होइन । तर खासमा यो महाधिवेशनको समीक्षा हुने दिन ऐतिहासिक रुपमा सफल भएको घोषणा हुनेछ । देख्नेमें लगता है साला बाँस जैसा मगर अन्दर से है खोख्ला भने जस्तै आवरणमा एकताको सन्देश भट्याए पनि आन्तरिक रुपमा यसले स्वायत्तता गुमाएको छ र प्रतिरोधी क्षमतामा ह्रास आएको देख्न सकिन्छ ।   एकताको सन्देश दिन २३औं महाधिवेशनको आग्रह तय भएको जनाउ उदघाटन सत्रमा पूर्व अध्यक्ष नरेन्द्र चौधरी र विशेष अतिथि विजय गच्छदारको थियो । एकताको सन्देश भनेको उनीहरुको लागि केन्द्रीय समितिका पदाधिकारी तथा सदस्यहरु निर्विरोध निर्वाचित हुनुपर्ने तर्क गरियो । यही आदर्शलाई व्यवहारमा उतार्न उनीहरु ३० घण्टा निरन्तर दवावको भूमिका बनाइ रहे । यसले थाकस सम्बन्धमा उनीहरुको नियत प्रष्ट बुझिन्थ्यो । थारू आन्दोलनलाई उनीहरु करियर निर्माणको साधन बनाउन एकमत थिए र अन्ततः सोही लक्ष्य प्राप्त गर्न महाधिवेशन बन्धक बनेको यो प्रथम पटक पक्कै थिएन । प्रत्यक्ष हस्तक्षेप देख्न २३औं महाधिवेशन प्रयोग भयो र नवनिर्वाचित अध्यक्षलाई समेत चौवन्नी सदस्यता लिन बाध्य बनाइयो । त्यसैले भन्न सक्छौं कि पूर्व मेचीदेखि पश्चिम महाकाली सम्मका थारू एकै हौं र नीतिगत रुपमा अमुक पार्टीका बधुँवा मजदुर–कमैयाहरु । व्यक्तिगत रुपमा भन्नु पर्दा म यसपटक मिनराज चौधरी थारू कल्याणकारिणी सभाको अध्यक्ष निर्वाचित हुनुपर्ने मिसनमा थिएँ । अरु विद्यार्थी कालमा रहेका साथीहरु शैलेन्द्र चौधरी तथा रमेश चौधरीसमेत यो मिसनलाई आत्मसात गर्न थालेका कारण जिल्लावासी उत्साहित थिए । जिल्ला सभापतिहरु पनि विमर्श गर्दै थिए र त्यसमा महत्वपूर्ण भूमिका चितवन तथा वर्दियाका सभापतिहरु खेल्दै हुनुहुन्थ्यो ।  अस्वभाविक ढंगले विजय गच्छदारलाई यस प्रक्रियामा तान्न लगाइयो । शायद उनका लागि यो घटना रुनु न हाँस्नु बनाइयो । यस घटनामा विजय गच्छदारको जीवनमा ठूलो पाठ सिकाई होला । यसका बावजूद अस्वभाविक ढंगले विजय गच्छदारलाई यस प्रक्रियामा तान्न लगाइयो । शायद उनका लागि यो घटना रुनु न हाँस्नु बनाइयो । यस घटनामा विजय गच्छदारको जीवनमा ठूलो पाठ सिकाई होला । मंगलबारको दिन थियो र संकट मोचनका लागि विजय दाइले जे निर्णय दिनुहुन्छ मान्छौं पनि  भन्ने अनि मेरो मतमा सहमति चाहिन्छ भन्ने दवाव पनि बढाइ राख्ने कामले असहज परिस्थिति भोग्न बाध्य उनले अन्ततः एउटा निर्णय सुनाए । अध्यक्षका तीन दावेदार देवीप्रसाद चौधरी, प्रेमीलाल चौधरी र मिनराज चौधरीमध्य अध्यक्ष प्रेमीलाल चौधरी, वरिष्ठ उपाध्यक्ष देवीप्रसाद चौधरी तथा महामन्त्री मिनराज चौधरी ।  गच्छदार प्रस्तावको अनुमोदन थाकसका पूर्व अध्यक्ष नरेन्द्र चौधरी, नेपाली काँगे्रसका नेताहरु उमाकान्त चौधरी, तेजुलाल चौधरी, पद्म नारायण चौधरी, रामजनम चौधरी, डा गोपाल दहित, डिल्लीबहादुर चौधरी, योगेन्द्र चौधरी, जनकराज चौधरी तथा किशोर सिंह राठौर सम्मले गरेको बुझियो । तर यसको जस अपजस लिन तयार भएका विजय गच्छदार भविष्यमा थारू कल्याणकारिणी सभामा फस्टाएको तदर्थवाद अन्त्यका खातिर जिम्मेवारी बोक्ने कि न बोक्ने ? थारू कल्याणकारिणी सभालाई आफ्नो नेता छान्ने स्वायत्तता उपर धावा बोल्दा ऐयासमेत भन्न नपाएका केन्द्रीय पार्षदहरुको संरक्षण विजय दाइको निर्णय अनुमोदन गर्ने अन्य व्यक्तित्वहरु गर्न तयार हुने कि हुने ? के यी सबका लागि भविष्यमा जयनेपाल दाइ भन्दै उनीहरुका घरदैलोमा चाकरी बजाउनु पर्ने भयो त ? सवाल विचारणीय छ ।  आफूलाई कलाकार, पत्रकार, साहित्यकार, संगीतकार, खेलाडी तथा समाजसेवी भनी चिनारी दिएर रेशम चौधरीले समेत तीन पृष्ठमा उल्लेख भएका ६ बुँदामा समेटिएका पत्र बाँडे । आफ्नो भूमिका देखाउन उनले केही नीतिगत विषय उठाउन जरुरी ठानी त्यो पत्र हात हातमा बाँडेका होलान् । तर, अपेक्षा गरेको प्रतिक्रिया प्राप्त गर्न नसक्दा उनी फर्किए । यो महाधिवेशनमा उपस्थित सहभागीहरु माझ बाँडिएका उनका सन्देश महत्वहीन ठहर भए पनि थाकस राजनीतिक छाँयाबाट टाढा रहनुपर्ने उनका सुझाव धेरैका लागि भजाउने वस्तु हुन पुग्यो । यसलाई सक्नेले भजाउलान् र नसक्नेले चुप बस्लान् अर्को २४औं महाधिवेशन कुर्दै । जवाफदेहिताको कसिमा सबै अयोग्य देखिएपछि आफ्नो कमजोरी ढाक्ने र अरुलाई खुइल्याउने त हो । परिस्थितिले थारू कल्याणकारिणी सभालाई प्रतिस्पर्धात्मक बनाउन रोकी राखे, जसले परिणाम दिने किसिमको योजनाबाट विमुख रह्यो ।  धोखाघडी तथा शक्तिको दुरुपयोग भएको छ । यथार्थमा दिशाहीन र प्रभावहीन वस्तु बन्ने यात्रामा चलिरहेका अगुवा पदाधिकारी तथा केन्द्रीय सदस्यहरुको कुराले च्युरा भिज्नेवाला छैन ।  अब विस्तारै थारू सुमदायको माघ मनाउने चटारो देखा पर्ने होला । एकताको सन्देश प्राप्त गर्न माघ कुर्नुपर्ने त होइन होला । तर, धेरै आशावादी नबनौं, कारण यिनीहरुसंग एकताको सन्देश सुनाउने न त शब्द छन्, न हिम्मत । जुन जगमा उनीहरु एकता स्थापित गर्न खोजे, त्यो पाखण्ड ठहर हुँदैछ । धोखाघडी तथा शक्तिको दुरुपयोग भएको छ । यथार्थमा दिशाहीन र प्रभावहीन वस्तु बन्ने यात्रामा चलिरहेका अगुवा पदाधिकारी तथा केन्द्रीय सदस्यहरुको कुराले च्युरा भिज्नेवाला छैन ।  तर्क जेसुकै गरुन् तर परिणाम निकाल्न सकिएन भने त्यो तर्क गफाडीको गफ मात्र बुझिन्छ । भनिन्छ “गफाडीके गाईर में गाछ जन्मल त कहैछै हम छहाइरे में चियै ।” अर्थात् एकता सन्देशको नयाँ आधार तय भएन भने नवनिर्वाचित केन्द्रीय कार्यसमिति स्वार्थीहरुको झुण्ड बन्ने खतरा यथावत छ । निर्णयकर्ता तथा त्यसलाई अनुमोदन गर्ने स्वनामधारीहरु गाँठो कसेका हुन् कि फुकाएका हुन् ? जवाफ उहाँहरुसंग मागिने छैन, बरु कार्यसमितिका अध्यक्षलगायत सदस्यहरुको कार्यशैलीमार्फत् प्राप्त गर्न चाहन्छन् । भविष्यमा पुरानै नियती दोहरिने सम्भावना बलियो देख्छु म, कारण एकतापश्चात संघर्षको यात्रा शुरु हुनुपर्ने हो । यहाँ संघर्षसंग भयभित हुने र संघर्षको काउण्टर मोडेल थाहा नपाएका समाजसुधारक संस्थाको नेतृत्व हात पारेपछि पुग्यो त । बाँकी भोट बैंक भएर त बस्ने हुन् ।  भजनमण्डली एकताको गीत गाउनुहोला तर मेरो पक्षधरता कायम रहनेछ । तटस्थ बस्ने मेरो राजनीतिक कर्म होइन । थारू कल्याणकारिणी सभामा राजनीतिको छाँया परेकै ह । यहाँ स्वायत्तता कमजोर बनाएपछि निर्णय प्रक्रिया अब कसरी छिटो छिटो सम्भव छ ? सामुहिक निर्णय र व्यक्तिगत जिम्मेवारी नारामा सीमित रहे हालै देखा परेको अविश्वास थप संकट ल्याउने हुन्छ, जसलाई आत्मआलोचना मार्फत् कम गर्न विजय दाइ लगायतका स्वनामधारीहरुले पहल लिनुपर्ने थियो ।  अविश्वासको माहोल न्यून बनाउन एकताको गाँठो कस्ने ती सम्मानित व्यक्तित्वहरु जब हामीलाई भोट बैंकमा परिणत गर्न हिम्मत गर्दै आए, त्यसबखत सचेत धक्का दिने तागत किन सञ्चय गर्न असफल हुँदैछौं ? यो सत्य हो कि विजय दाइहरुको शक्ति र सम्बन्धको अगाडि हाम्रो केही जोड चलेन । तर फेरि पनि हामी सम्मान खोज्दै हिँड्नेभन्दा पनि परिणाम खोजी गर्ने भएकाले साधन अर्को चयन गर्न सक्छौं । यही थारू कल्याणकारिणी सभा सबै समस्याको हल हिजो पनि मानिएको होइन र भविष्यमा पनि त्यस्तो बुझाई हुनेछैन ।  अन्त्यमा, थाकसका पूर्व अध्यक्ष नरेन्द्र चौधरी, विजय दादा लगायत सबैको गच्छेअनुसार सम्मान हुनुपर्छ । सम्बन्धित ठाउँमा उहाँहरु सम्मानयोग्य हो र जीवनका उतार चढाव पार गर्दै अनुभव बटुल्नु भएकै छ । ती अनुभव र शक्ति–सम्बन्धलाई उचित प्रयोग गरे थारू कल्याणकारिणी सभालाई कुनै हानी नभएको स्वीकार्न सकिन्छ । यहाँ बन्धक बनाउनैपर्ने अवस्था कसरी र कसले सिर्जना गर्यो ? सवाल यो हो । डिगनिटी र सामाजिक न्यायका खातिर लडेको बताउनेहरु आफ्नो स्वायत्तता गुमाउदै गर्दा किन आवाज दिएनन् भन्ने हो । नङ्गा नाच देखाएर एकताको सन्देश कसरी जन जनमा पुर्याउन सकिन्छ भन्ने नैतिक प्रश्न छ । अविश्वासको माहोल न्यून बनाउन एकताको गाँठो कस्ने ती सम्मानित व्यक्तित्वहरु जब हामीलाई भोट बैंकमा परिणत गर्न हिम्मत गर्दै आए, त्यसबखत सचेत धक्का दिने तागत किन सञ्चय गर्न असफल हुँदैछौं ? यसरी झोले त बनाए बनाए, साथै गुनासो गर्ने ठाउँ पनि बाँकी राखेनन् ।  

जातीय स्वशासनको सवालमा थाकसको भूमिका अब के ?

जातीय स्वशासनको सवालमा थाकसको भूमिका अब के ?

५३७ दिन अगाडि

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३० कात्तिक २०८१

विषय प्रवेशः थारु जातिको प्रतिनिधि संस्था कुन होला ? यो जातिको भरोसालायक प्रतिनिधि संस्थाबारे कतै बहस छ ? अथवा सबैलाई समेट्न सक्ने थारु जातिकै प्रतिनिधिमुलक संस्था कस्तो हुनुपर्ने देखिन्छ ? यस्तै सवालको सेरोफेरोमा रही यो लेखमार्फत् बहस उठान गर्न प्रयत्न गरिने छ ।  खासमा थारु जातिको प्रतिनिधि संस्था कुन भन्ने सवालको टुंगो नलाग्दै थारु कल्याणकारिणी सभालाई वैधता प्रदान गर्ने कोशिश भयो ।आधुनिकीकरणको लहरसंगै स्थापना गरिएको यो संस्थाले आर्थिक, सामाजिक–साँस्कृतिक लगायत शिक्षामा पहुँच बढाउन वाल विवाहजस्ता कुरीति अन्त्य गर्ने उद्देश्य तय गरे । साथै जाँड दारु खाएर थारु प्रगति गर्न नसकेको भन्दै बुझाईलाई सत्य सावित गर्न लागि  थारु कल्याणकारिणी सभा नामक संस्था जन्माए । हालपर्यन्त यही भाष्यलाई काँखी च्यापेर समाजको मूल प्रवाहीकरणमा सामेल हुने चाहना बोकी रक्षात्मक अवस्था गुजार्न बाध्य छ । यो अवस्थाले गर्दा योजनावद्ध कार्यहरु अगाडि बढाउन सकिराखेको छैन र प्रभाव छोड्न असर्थ छ । तथापि, आधुनिकताको कसीमा त्यसको लहरले ल्याउने प्रगति थारु कल्याणकारिणी सभासंग जोडेर हेर्नु अनुचित होइन ।  आधुनिक राजनीतिले स्वशासनको अवधारणालाई निषेध गरेन । तर मूलप्रवाहिकरण गर्ने नीति, विधि र प्रक्रिया ठीक नभएको जनस्तरबाटै आवाज दिए । त्यसलाई असभ्य र अविवेकी करार गर्दै पन्छिने बाटो तय गरे । फलस्वरुप वहिष्करण, सीमान्तिकरण लगायत नश्लीय चिन्तनमार्फत् देशको राजनीतिक खेलको नियम बनाई विविधतालाई समस्या बुझे । लोकतन्त्रको बाधक ठहर गरी एकल राष्ट्रिय राज्य निर्माणमा राज्यशक्ति लगाए । त्यसका विरुद्ध लामो संघर्ष भयो । जहाँनिया राणा शासनको २००७ सालमा अन्त्य गरियो, निरंकुश पञ्चायती व्यवस्था फालियो र २०६३ सालमा वंश परम्परामा आधारित राजतन्त्रको विदाई भयो । राजनीतिक संघर्ष र जनविद्रोहको दौरान थारु कल्याणकारिणी सभाको भूमिका गौण र पदाधिकारीहरुको कार्यशैली यथास्थितिवादी नै थियो ।  थारु जातिको चाहना परशासनबाट मुक्त हुने नै थियो र छ । आधुनिक राजनीतिबाट निर्देशित राज्यको नीति स्वशासनको अधिकार खोसे । थारुलाई कानुनी तवरबाटै मासिन्या मतवाली करार गर्दै उनीहरुलाई सामाजिक न्यायमा शुद्र वा सो सरह व्यवहार गरे । देशप्रेमलाई केन्द्र ठान्ने थारुलाई यही देशमा परायाकरण गर्दा उनीहरु लामो समय कमैया–कमलरी भएर बँधुवा मजदुरी गर्न बाध्य भए । उनीहरु आफ्नै घरमा बास माग्नु परेको अवस्था कसरी सिर्जना भयो ? यथार्थ बुझ्न नसकिने विषय होइन । तर, आजसम्म थारुहरुले आफ्नै भाग्य/कर्मलाई धिक्कार्नु किन जरुरी ठाने ? कार्य/कारणकै तहमा यसबारे बुझाई स्पष्ट गर्नुपर्छ ताकि हामी को होइनौं भन्ने प्रश्नको सही जवाफ प्राप्त गर्न सक्ने छौं । यही जवाफको आधारमा हामी कसका विरुद्ध छौं भनी आफ्ना प्रतिस्पर्धी किटान गर्न सकिन्छ । बदलिएको राजनीतिक पाराडाइमभित्र प्रतिपक्षी शक्तिको प्रतिनिधित्व थारुको प्रतिनिधि संस्थाले गर्न सक्नुपर्छ । सामुहिकताको कसीमा थारुको प्रतिनिधि संस्था ः  थारुको जीवन र जगत सम्बन्धि बुझाई तुलनात्मक रुपमा कमजोर देखिन्न । अझ थप ज्ञान मिमांशीय दृष्टिकोण बलियो बनाउन जरुरी छ । परिवारजस्ता आधारभूत तहबाट शुरु भई प्रगन्नासम्म गुल्जार गर्ने सामुहिकताको संस्था पूर्णतः लोकतन्त्रमा आधारित छन् । त्यसैले, न्यायको खोजी हुने देखिएको छ । यसभित्र संस्कारगत पक्षहरु पनि  छन् । व्यक्तिको जन्मदेखि मृत्युसम्मका कर्महरु यही प्रतिनिधि संस्थाको क्रियाशिलतामा भइआएका छन् । तर राज्यको सेवा सुविधा वितरण र सुरक्षासम्बन्धि काम उपरोक्त सबै चिजलाई ओझेलमा पार्दै लगेपश्चात थारुको प्रतिनिधि संस्था प्रतिरक्षात्मक भइरहेको छ । आज थप असान्दर्भिक बनाउन राज्यको नीति उद्दत रहेको छ, जसका कारण उपभोक्ता समितिको प्रतिस्पर्धा गर्नसमेत यी संस्थाहरु काविल बन्न सकेको छैनन् ।  हामी प्रतिबद्ध छौं र थारु प्रतिनिधि संस्थाको जगमा संस्कृति र विकासलाई टेवा प्रदान गर्न लालयित छौं । एक दिन हामी संघर्षमा विजयी हुने आधार तयार गर्दैछौं । त्यसका लागि थारुको एक राष्ट्रिय परिषद चाहिएको छ । ग्राम गणतन्त्रलाई मजबुत बनाई स्वराज सञ्चालन गर्नका लागि यसको आवश्यकता पर्न गयो । अर्थात् सत्ता साझेदारीसम्म नीति बनाउन सकिने भयो । तर, सत्तामा समर्पण र मुद्दाको विसर्जन स्वीकार गर्न सकिन्न । थारुको प्रतिनिधि संस्था राज्यको लागि सहमति उत्पादन गर्नका लागि गठन भएकै होइन । त्यसो हो भने  थारुको प्रतिनिधि संस्था स्वाशासन मजबुत पार्न  अत्यावश्यक छ । सबैको साझा संस्था थारु कल्याणकारिणी सभा भनि प्रचार गरिन्छ । यसको विधान र कार्यशैली अध्ययन गर्दा थाहा लाग्छ कि साधारण सदस्य, मानार्थ सदस्य अथवा आजीवन सदस्य व्यक्तिगत पहिचानको आधारमा वितरण हुन्छ । अर्को कुरो दलीय प्रभावबाट पदाधिकारी चयन भएर निश्चित अर्हाएका कामहरु गर्न थाल्छन् । यसले थारु कल्याणकारिणी सभा एनजिओ, सिबिओ अथवा आइपीओमध्ये कुन सही हो ? थाकसका पदाधिकारीहरु आफ्नो मनपर्दी व्यख्या गरी हिँड्छन् । यसरी भ्रम र वास्तविकताबिच अन्तरविरोधी सम्बन्ध खडा गर्दा सबैजना अन्यौलमा रहेका छन् । त्यसैले सामुहिकताको कसीमा थारुको प्रतिनिधि संस्था परिभाषित गर्न सक्नुपर्छ भन्दा अतिशयोक्ति नहोला । सामुहिक नेतृत्वको अनिवार्यतालाई थारुको प्रतिनिधि संस्थाले सम्बोधन गर्नुपर्ने हुन्छ । त्यसका लागि थारु कल्याणकारिणी सभा आइपीओ परिभाषित हुनुपर्नेछ, कारण आइपीओ सम्बन्धित राष्ट्र(जाति)को रक्तसम्बन्ध अनुसार परिभाषित हुने भएपछि स्वभाविक रुपमा उक्त राष्ट्र(जाति)को आत्मनिर्णयको अधिकार सुनिश्चित गराउन पहलकदमी लिने गर्छ ।  यी सबै गर्न आइपीओले अन्तर्राष्ट्रिय कानुन एवम् विधिशास्त्र अबलम्बन गर्ने र सत्ता साझेदारीलाई कार्यान्वयनमा लैजाने महत्वपूर्ण भूमिका रहन्छ । सत्तासंगको पहुँच अन्ततः हामीलाई नयाँ शक्तिव्यूहमा प्रवेश गराउँछ र राजनीतिको नयाँ खेलको नियम तयार गर्न सघाउँछ । परिवर्तन यी यस्ता कर्महरुबाट सम्भव बनाउँछ ।  थारुको प्रतिनिधि संस्था र तुलनात्मक अध्ययन ः   वाल्टर डी मिग्नोलोको भनाई छ, “औपनिवेशिकताको अन्त्य भएको छैन बरु यो सर्वत्र व्याप्त छ ।” थारु जातिले अभ्यास गर्र्ने संस्थाहरु विभिन्न नामले चिन्न सकिन्छ । बरघर प्रणालीसमेत ती मध्ये एक हो । त्यस्तै, मुख्या, माइन्जन, गहदार (गच्छदार), गुमस्ता आदि आदि । समाज व्यवस्थित गर्न ती सबै संस्थाहरु अग्रसर रहेका छन् । ग्राम गणतन्त्रको अभ्यास गर्दै स्वराज स्थापनामा यी सबै क्रियाशील हुँदा परम्परागत संस्था भनि बुझाउने आधुनिकतावादी समूह थारु जातिभित्र आधुनिक संस्थाको रुपमा थारु कल्णकारिणी सभा जन्माए ।  कुनै समयका विद्यालय शिक्षा लिएर शिक्षित कहलिएका ती आधुनिकतावादी समूहले जन्माएका थाकस संस्थालाई नेतृत्व गर्नेहरु आज विश्वविद्यालय डिग्री प्राप्त व्यक्ति छन् । तर, आधुनिकताका पक्षधर ती जमात हाल किन औपनिवेशिकताका शिकार भए ? बुझ्नै पर्ने भएको छ । थारु कल्याणकारिणी सभा किन सहमति निर्माण गर्ने संस्थाको रुपमा देखिएन, जसका कारण सामाजिक प्रतिरोधी क्षमतामा ह्रास मात्र हात लाग्यो । राज्यको नीति थारुप्रति अनुदार हुँदासमेत चुपचाप बसे । अझ राज्यका संयन्त्रसंगै गुहार लगाई आफ्ना सामुहिक समस्याबिच व्यक्तिगत लाभ लिने गरी इतिहासमा काम भए ।  संस्कृतिको सम्बन्ध प्रकृतिसंग हुने आम बुझाईलाई माथ गर्दै जब अनियन्त्रित तवरले थारु वस्तीका प्राकृतिक सम्पदाहरु उपर दोहनकारी नीति राज्यले लियो, थारुको अस्तित्व उपर थप संकट बढेर गएको छ । यसलाई हाम्रो संस्कृतिको विनाश बुझ्न हदैसम्म अल्छी भएका छौं । तर के ती आधुनिकतावादी समूह आफु र आफ्ना सदस्यबिच साँस्कृतिक भूमिको संरक्षण र सामुहिक जिम्मेवारीको लागि तयार छन् ? व्यवहारवाद उनीहरुको आदत बन्यो, जसका कारण उनीहरु जता मल्कु, उतै ढल्कु भएका छन् ।  यहाँ तुलनात्मक अध्ययन गर्दा जसलाई परम्परागत संस्था भनि बुझाउने प्रयत्न गरियो र वर्षौंसम्म किनाराकृत गरियो, आज त्यही संस्था मूलधार बुझ्नैपर्ने भयो । अन्तर्राष्ट्रिय सरकार बुझ्न थालेका एजेन्सी युएन स्थायी मञ्चले बरघर प्रणाली चिने तर थारु कल्याणकारिणी सभालाई चिनेनन्, किन होला ? बरघर प्रणालीको सहयात्रा बिना वर्तमान सरकारहरु अपूर्ण घोषणा गर्न भ्याए । यहाँ बरघर प्रणाली लोकतन्त्रको आधार भएको बुझाईसहित अन्य जातीय समूहमा समेत प्रतिस्थापन गर्न सकिने मत अन्तर्राष्ट्रिय सरकारको रह्यो । तसर्थ, थारुको प्रतिनिधि संस्थाको तुलनात्मक अध्ययन जरुरी ठहर भएको छ ।  संस्था भनेका हाम्रा लागि औजार मात्र हुन् । कुन कामका लागि कस्ता हतियार चलाउने भन्ने विषय सम्बन्धित जातिको छनौट हुने र थारुको प्रतिनिधि संस्था औपनिवेशिकता विरुद्ध ठहर भएको हो भने कम्तिमा आफ्नै घरमा आफू बास माग्नुपर्ने अवस्थाको अन्त्य चाहिएको छ । त्यसका लागि आफ्नै पूर्खाको ज्ञानको श्रोत स्वदेशवादलाई अांत्मसात गरी थप विकसित बनाउन सकिन्छ । साथै, आफ्नै संस्कृति, कला, परम्परालगायत अर्थव्यवस्थामा गर्व गर्न सक्नुपर्छ, ताकि हामी उपभोक्तावादी हुनबाट जोगिन सकौं ।  त्यसैले, हाल आफ्नै मूलतिर फर्किने लहर शुरु भएको छ । राना थारुले पनि साँचिक्कै अलग हौं भन्ने मनसाय बनाएको हो भने ज्ञान मिमांशाको कसीमा घोटिनु पर्ने हुन्छ । तात्विक रुपमा कुन अर्थमा अलग छन् भन्ने भाष्य निर्माण अनिवार्य शर्त देखिन्छ, जसले प्रकृति र संस्कृति बिचको अन्तरसम्बन्ध अभिव्यक्त गर्छ । यी शर्तयुक्त अवस्था राना थारुको लागि कसैले योगदान गर्छ भने ऊ त्यही प्राकृतिक मानव समूह नै हुनेछ । त्यो ज्ञानसत्ताले अन्ततः राजकीय सत्ता स्थापनामा समेत बल पुर्याउँछ । किनकी सत्ताको बलमा सत्य स्थापना हुने गर्दछ ।  निष्कर्ष ः यो आलेख तयार गर्दै गर्दा थारु कल्याणकारिणी सभाको महाधिवेशनको माहोल छ । हुन त त्यो माहोलको आफ्नै अर्थ होला तर यहाँ विमर्श गर्न खोजिएको विषय थारुको प्रतिनिधि संस्था हो । थारुको प्रतिनिधि संस्थाले थारुको जातीय स्वशासन स्थापनामा बल पुर्याउँछ वा पुर्याउन सक्दैन भन्ने तर्क त पक्कै होइन । यहाँ परशासनबाट मुक्त गराउने संस्था चाहिएको छ । राज्यको नीतिको समर्थन र सहमति निर्माणमा भूमिका खेल्नु भनेको परशासनको मतियार बन्नु हो । त्यस्ता संस्थाहरुबाट सजग तथा दुरी कायम गर्न सक्नुपर्छ । अथवा त्यसको विकल्पमा स्वदेशवादले निर्देशित संस्था चाहिएको छ ।  हामीले जोड दिएर भन्न सक्नुपर्छ कि थारु कल्याणकारिणी सभा प्रचार गरेजस्तै थारु जातिको प्रतिनिधि संस्था हुने हो, परिवर्तन यसको अवधारणा र नेतृत्व दुइटै पक्षमा हुनुपर्छ । तर, अहिले नै त्यस्तो सम्भावना देखिन्न । थारु जातिको प्राण सामुहिकतामा खोजी गर्नुपर्छ । वैयक्तिक स्वतन्त्रता त्यसैभित्र अभ्यास गर्ने हो । पश्चिमा ज्ञान प्रणाली हाम्रा प्रकृतिलाई उपभोग्य सावित गर्न खोजे र संस्कृति बजारको विक्रीका वस्तु तर स्वदेशवाद प्रकृतिमैत्री जीवन पद्दति व्याख्या गर्न केन्द्रीत छ । यसले कुल ग्राहस्थ खुशी बढाउन योगदान दिन्छ । अर्थात् समुदायका सदस्यहरुको खुशी मापन हुन्छ । यस अर्थमा आर्थिक व्यवस्थापनको अवधारणा नै अलग हुने गर्दछ ।  थारु कल्याणकारिणी सभाको अवधारणा, संरचना तथा आर्थिक व्यवस्थापन सम्बन्धि नीति समुदायको लागि भनिए पनि राजकीय सत्तासंग खासै सरोकार नभएको देखिन्छ । मार्क्सको मत सापटी लिने हो भने शक्ति राजनीतिमा सत्ताबाहेक अन्य सबै भ्रम हुन् । परशासनको जगमा आधुनिक भनिएका थारु कल्याणकारिणी सभा क्रिमी लेयर निर्माण गर्ने र उनीहरुको हित संरक्षण गर्दा समुदायको भन्दै प्रचार गरी बस्छ, जहाँ खासै उपलब्धी समुदायले लिन सकेको देखिन्न ।

रविको गिरफ्तारीः नयाँ र पुराना सोंच बिचको लडाई ?

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५५४ दिन अगाडि

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१३ कात्तिक २०८१

विशेषतः कार्तिक २ गतेपछि नेपालमा सबैभन्दा बढी लिइने नाम रवि लामिछानेको भएको छ । रवि लामिछानेको नाम कोही माया, स्नेहले, कोही ब्यक्तिगत रिसिबीले, कोही राजनीतिक दाउपेचका कारणले लिइरहेका छन् । यस्तो लाग्छ, उनको चर्चा नगर्ने व्यक्ति अहिले देशमा शायद कोही छैन । सहकारी पीडितहरु उनलाई सहकारी ठगका रुपमा लिइरहेका छन्, उता कोही उनलाई भ्रष्टाचार नगरेका बेदाग ब्यक्तिका रुपमा लिइरहेका छन् । उनको राष्ट्रिय स्वतन्त्र पार्टी उनको पक्षमा नउभिने कुरै भएन । उनका नेता, कार्यकर्ताहरु रवि सहकारी ठग नभएको, उनलाई फँसाउन खोजिएको कुरा दरो गरी राखिरहेका छन् । यसले आम नेपालीहरु भ्रमित भैरहेका छन् ।  देशमा जसरी राज्यको मूलधारमा रहेका जातजाति र राज्यको मूलधार बाहिर रहेका जातजातिहरुबिच अप्रत्यक्ष तर निरन्तर मतभेद र संघर्ष जारी छ, त्यसरी नै राज्यको मूलधारमा पकड जमाइसकेका र राज्यको मूलधार बाहिर रहेका तर मूलधारमा पकड जमाउन कोशिश गरिरहेका पार्टीहरु बिचमा पनि संघर्ष जारी छ । रास्वपा र सरकारमा रहेका दलहरु बिचको किचलो पनि अप्रत्यक्ष रुपमा मूलधारमा रहेका र मूलधार बाहिर रहेका बिचको संघर्ष नै हो ।  लामिछाने, देउवा, ओली, दाहाल को राम्रो भन्दा राज्यका मूलधार बाहिर रहेका जातिहरुलाई बोल्न अलि गाह्रो छ । बोल्नै पर्यो भने बचतकर्ताहरुको रकम बचतकर्ताहरुलाई फिर्ता हुनुपर्दछ भन्नु न्यायोचित हुनेछ । कम उचित भन्नु पर्दा २०४७ देखि अहिलेसम्म (३५ वर्ष) शासन सत्तामा रही काम गरिसकेका तर देशमा सुधार गर्न नसकेका ब्यक्ति भन्दा रवि ठिक छन् भन्नुपर्ने हुन्छ । यो भन्दा बढी बोल्नु न्यायोचित होला जस्तो लाग्दैन ।  राज्यको मूलधार बाहिर रहेका उत्पीडित जातिहरुलाई थाहा हुनुपर्ने हो, प्रदेश नामकरणको लडाई लडिरहँदा एकातिर उत्पीडित जाति अर्कोतिर पुरै राज्य, काँग्रेस, एमाले, माओवादी थिए । त्यसमा होस्टेमा हैंसे गर्ने तात्कालीन मिडियाकर्मी रवि थिए । त्यसैले थरुहट, किरात, ताम्सालिङको सवालमा त रवि, ओली, देउबा, दाहालको मत अहिले पनि एउटै हुन सक्छ । तर देश बनाउने सवालमा, विकासको सवालमा शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगारीको सवालमा रवि र उनका युवा साथीहरु ओली, देउवा, दाहालभन्दा प्रगतिशील छन् भन्ने कुरा उनीहरुको अभिब्यक्तिबाटै थाहा हुन्छ । रवि गृहमन्त्री, सुमना शिक्षा मन्त्री, तोसिमा स्वास्थ्य मन्त्री हुँदा गरिएको केही फरकपनको आधारमा पनि भन्न सकिन्छ कि रास्वपा पुराना भन्दा केही नयाँ हो र नयाँपन ल्याउन चाहन्छ, सक्छ । तर अरुको सवालमा भन्न गाह्रो छ । किनकि उनीहरु आलोपालो गरी ३५ वर्षसम्म शासन गरिसकेका छन् ।  रवि गृहमन्त्री, सुमना शिक्षा मन्त्री, तोसिमा स्वास्थ्य मन्त्री हुँदा गरिएको केही फरकपनको आधारमा पनि भन्न सकिन्छ कि रास्वपा पुराना भन्दा केही नयाँ हो र नयाँपन ल्याउन चाहन्छ, सक्छ । तर अरुको सवालमा भन्न गाह्रो छ । अर्को कुरा गएको चुनाव (२०७९) मा नै देशमा ‘नो नट अगेन’ अभियानले सामाजिक सञ्जाल तातिसकेको थियो । यो अभियान चलाउनु पर्दछ भनी शुरुवात गर्ने को को हुन् ? जानकारी भएन । तर गहिरिएर हेर्दा अप्रत्यक्ष रुपमा अहिले त्यही ‘नो नट अगेन’ र ‘अगेन एण्ड अगेन’ आमने सामने हुँदैछन् कि जस्तो लागिरहेको छ । समाचार पढ्दा, सुन्दा पनि मूलधारमा रहेका बढी रेडियो, टिभी रविको विपक्षमा लेखिरहेका छन्, बोलिरहेका छन् भने युट्यूब समाचार, सामाजिक सञ्जालहरु बढी रविको पक्षमा लेखिरहेका छन्, बोलिरहेका छन् । यसरी आम नागरिकलाई को सहि को गलत छुट्याउन कठिन भइरहेको छ ।  धेरै रेडियो, टिभी, पत्रिका रवि दोषी हो भनिरहेका छन् । जिबी राई कहाँ थिए ? के गरिरहेका थिए ? रवि कति सालमा गोर्खा मिडिया प्रालि ज्वाइन गरे ? गोर्खा मिडिया प्रालिमा रकम ल्याउने जिबी राई हुन् वा रवि हुन् ? रवि गोर्खा मिडिया प्रालिमा कति बर्ष बसे, गोर्खा मिडिया प्रालिमा बस्दा कहाँबाट कति रकम भित्रिएको थियो ? नागरिक यस्ता गहिरो जानकारी पाउनबाट बञ्चित छन् र भ्रमित भइरहेका छन् ।  धनराज गुरुङ, ऋषिकेश पोखरेलको नाम सहकारी काण्डमा किन जोडियो ? किन उनीहरु वा उनीहरुका परिवारलाई समातिएन ? आम जिज्ञासा छ तर मिडियामा आइरहेको छैन । के रवि मात्रै नेपालको समस्याको मूल जड हुन् ? यति, ओम्नी, ललिता निवास, गिरविन्धु टी स्टेट सबै रविका अगाडी केही होइनन् भन्ने मिडियाबाजी भइरहेको देखिंदैछ । अढाई वर्षको अवधिमै रवि कसरी राज्य, सरकारको मोस्ट वान्टेड सूचीमा परे ? यही अवधिमै उनले कसरी देशलाई डुबाए ? सोचनीय बिषय बनेको छ ।  कहिले बालेन र बालुवाटार, कहिले कुलमान र बालुवाटार आमने सामने भैरहेको अवस्था देखिन्छ भने कहिले हर्क साम्पाङको बिरुद्धमा दलहरुको मोर्चाबन्दी देखिन्छ । यसरी गहिरिएर विचार गर्ने हो भने सतहमा रवि र संघीय सरकार, बालेन र बालुवाटार, कुलमान र सरकार, हर्क साम्पाङ र दलीय मोर्चाबन्दी देखिए पनि सार रुपमा अहिले नयाँ र पुराना सोंच बिचमा संघर्ष चलिरहेको छ ।   स्वतन्त्र भनेका बिना पिंढका लोटा हुन्, हावामा लट्किएका बेलुन हुन् भन्ने बुद्धिजीबीहरुको भाष्यलाई बालेन, हर्क साम्पाङ र गोपी हमालको निर्वाचन परिणामले गलत साबित गरिदिएको छ । यिनीहरुलाई पंगु नबनाउने हो भने काठमाडांै, धरान र धनगढीमा देखिएको विकासले नागरिकमा राम्रो प्रभाव पर्ने र भोलिका दिनमा हुने स्थानीय तहहरुमा अझ बढी स्वतन्त्र ब्यक्तिहरु छनौट हुन सक्ने भय पुराना दलहरुमा ब्याप्त छ । यही कारणले पनि जनतालाई भ्रमित पार्ने विचार प्रवाहित भइरहेका छन् जस्तो लाग्छ ।  पार्टीको अध्यक्ष संसदीय दलको नेता हुने, संसदीय दलका नेता प्रधानमन्त्री हुने संबैधानिक ब्यवस्थाका कारण आम नागरिकले चाहेको ब्यक्तिलाई प्रधानमन्त्री बनाउन सक्ने अवस्था छैन । कार्यकारी प्रधानमन्त्रीलाई प्रत्यक्ष रुपमा चुन्न नपाउने ब्यवस्थाका कारण पनि दलहरुमा, सरकारमा, ब्युरोक्रेसीमा भ्रष्टाचार र निरंकुशता हावी छ । जनतासँग प्रत्यक्ष सरोकार राख्ने स्थानीय तहमा पनि पार्टीको चुनाव चिन्ह लिई निर्वाचनमा लड्नुपर्ने कानुनी ब्यवस्थाले पनि नागरिकले चाहेका राम्रा ब्यक्तिलाई पालिका प्रमुखको रुपमा ल्याउन गाह्रो छ । मलाई लाग्छ, नागरिक सर्वोच्चताका कुरा गर्ने दलहरु यी बिषयमा गम्भीर हुन र कानुन संशोधन गर्न जरुरी छ ।  रवि गिरफ्तार हुनु ठूलो कुरा होइन, ठूलो कुरो हो नयाँ पुस्ता र नयाँ नेतृत्वलाई जनताका बिचमा कसरी ल्याउने ? सरकार, सारा मिडिया, सारा विचार प्रवाहकहरु पहिचानको आधारमा प्रदेश निर्माण गर्नु गलत हो भनेजस्तै रवि मात्रै दोषी हुन्, अरु सबै सहकारी ठगहरु निर्दोष हुन् भनी बोलिदियो, लेखिदियो भने अवस्था के होला ?  त्यसैले, रवि गिरफ्तार हुनु ठूलो कुरा होइन, ठूलो कुरो हो नयाँ पुस्ता र नयाँ नेतृत्वलाई जनताका बिचमा कसरी ल्याउने ? सरकार, सारा मिडिया, सारा विचार प्रवाहकहरु पहिचानको आधारमा प्रदेश निर्माण गर्नु गलत हो भनेजस्तै रवि मात्रै दोषी हुन्, अरु सबै सहकारी ठगहरु निर्दोष हुन् भनी बोलिदियो, लेखिदियो भने अवस्था के होला ?  थरुहट प्रदेशको मागको बिरुद्धमा जसरी तीन ठूला दल, सरकार, मिडिया सबै एक भएका थिए, आज रास्वपा र रविको बिरुद्धमा पनि एक भैरहेको अवस्था देखिंदैछ । तर थरुहटविरुद्ध जसरी सबै एक भएका थिए, रास्वपाको विरुद्धमा एक हुन गाह्रो पर्ला । यो काण्डले रविलाई चुनावमा उठ्नै नपाउने अभियोग सावित गरी जेल कोच्न सके र सबै सहकारी पीडितहरुका बचत, बचतकर्ताहरुलाई फिर्ता गर्न सके पुराना दलहरुलाई फाइदा पुग्ने देखिन्छ । उनीहरु शायद यही प्रयासमा छन् । यद्यपि, रवि गिरफ्तारीको सनसनीखेज खबरले अहिले रास्वपा देशको कुना कन्दरामा पुगिरहेको छ, एक हिसाबले उसको राम्रो प्रचारप्रसार भैरहेको छ । अब हेर्दै जाउँ, नयाँ र पुराना सोंच बिचको यो लडाईमा कसको पल्ला भारी हुन्छ ?