जोहारी वकिल साप, आब कबु नाइ बजि ‘डिजे’

जोहारी वकिल साप, आब कबु नाइ बजि ‘डिजे’

२४७ दिन अगाडि

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१५ पुष २०८२

जब गोचाली सगुनहे २०३३ सालमे जेलमे छुटाइ गैलि...

जब गोचाली सगुनहे २०३३ सालमे जेलमे छुटाइ गैलि...

२४९ दिन अगाडि

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१३ पुष २०८२

भगवतीप्रसाद चौधरी २०२५ सालके अन्टिम ओर २०२६ सालके सुरुवाट सँगे सगुनलाल चौधरी सरसे सिढा रतननाथ मा.वि.नारायणपुर दाङमे मोर पहिला भेट हुइल रहे । पहिला भेटमे, अन्जान भेंटमे टिट–मिठके कुछ बाट नै हुइल । वहाँ एस.एल.सि.परिच्छा डेके शिक्षकके रुपमे मा.वि.मे नियुक्टि हुइल रहिंट कलेसे मै वहिके प्रा.वि. के मस्टरवा । ६–७ महिनाके सँग–सँगेके उठ–बाससे हमार डुइ जन्हुनसे एकापसमे बरा गहिँर सम्बन्ढ बैठल । हरेक छेट्रामे एक्के विचार ढर्ना हुइलक ओरसे हम्रे डुनु जे एक सिक्काके डुइ पाटा हस हु गइलि ।  क.नेत्रलाल, नारायणपुर मा.वि.के प्र.अ.रहटि–रहटि भुमिगट हो गइलाँ टे मै बनारस अध्ययनके लग चला गइलँु कलेसे सगुन सर बर्दिया, सेमरह्वा छारा कइके चला अइलाँ । मै बनारससे आके हेकुली प्रा.वि.के प्र.अ. हु गइलुँ टे सगुन सर फेन हेकुली दाङ धरणीधर चौधरीके घरेमे पराइवेट सिच्छक हो गइलाँ । मै फेन प्र.अ. छोरके बैबाङ पदमनाथ चौधरीके घरेम पराइवेट सिच्छक हो गैलु ।  ओहाेंर हमार संघरिया लालबहादुर चौधरीके बैबाङ उट्टर चढान खड्गवीर चौधरीके घरेम पराइवेट सिच्छक हु गइलुँ रहिंट ।  अइसिके हम्रे टिनु जाने संघरियन डोसर–डोसर घरेम लग्गु–लग्गु साँझ बिहान भेंट हुइना मेरिक पर्हाइ लागल रहि । टिन जन्हुनके ‘टिन टिखार, बरे बिखार’ कहे हस टिन जन्हुनके रहाइ बसाइ वहे आनन्ड ओ अलौकिक मेरके रहट रहे ।  यिहिसे पहिले नारायणपुर सिच्छक रहल बेर कमरेड नेत्रलाल अभागीसे सल्लाह कइके हम्रे क.महेश चौधरी, सगुन चौधरी ओ मै मिल्के थारू भाषा तथा साहित्य सुधार समिति पश्चिमाञ्चल नेपाल (गोचाली परिवार (२०२८) नामक् संस्ठा खोल्के टट्कालिन प्रशासनके आँखिक किर्किट बनल रहि । गोचाली परिवार पर परटिबन्ढ लागल । हम्रे जुन ‘कुछ रोग, कुछ भोग’के विचारसे परेरिट मनै हुइलक ओरसे पेसाके बहाना बनाके राजनिटिकसे पछरल ठाउँमे जाके कम्निस्ट विचारहे समाजमे फैलइना रहे ।  टट्कालिन सरकार परटिबन्ढ गोचाली पट्रिका परकासिट करलक बहानामे पकरके सल्यान चलान कर्टि–कर्टि बिच डगरेमेसे सगुन सरहे लइजुइया भगा मर्लस । सगुनजि भग्लग ओरसे मै फेन पुलिसके नजरमे गिर परलुँ । पुलिसके चेवामे बइठे नै सेक्के २०३३ साल बैसाखसे भुमिगट जिवन विटाइ पर्ना बाढ्यटा होके बैबाङ छोर डेलुँ  । क.लालबहादुर चौधरी घर आके घर सहेर्के बइठ गइलाँ । सगुन बिच डगरेसे भागके आके पुर्नकालिन भुमिगट जिवन बिटाइ लागल अवस्ठामे फेनसे धनगढीमे पकरवा पइलाँ । धनगढीमे जेलमे एक बरसके लग सजायके साठ साठे १२००।– (एक हजार डुइ सय) जुर्बानके सजा पइलाँ । उहे १२ सय जुटाइक लग चन्डा उठाके सगुन सरके जरिवाना टिरम कैह्के दाङ, सुर्खेत, बाँके, बर्दिया, कैलाली ओ कन्चनपुर सालभर नेंग्लुँ ओ सेकटसम आपन ओरसे सहयोग फेन मिलल रहे । उहे सिलसिलामे बर्खाहा खेटि मचलबेर एकडिन बर्दिया मनाउके लग्गे परसेहनी गाउँ डिन बुर्वा राट पर्ना पर्ना पुग्लुँ, घरेम पैठलुँ, पानी झाउ–झाउ पर्टि रहे ।  मै भिजट–टिजट जौन घरेम पैठलुँ टे वहे घरक बुह्र्या बुडि कैह बैठलि, ‘अरे ! भैया टोहार घरेम खेटि–पाटि नै हो का ? अइसिन बरखामे खेटि कइना समयमे पहुनि खाइ अइठो ?’  मोर फेन खेटि बा जे बुडि परस्नक उट्टर डेलुँ । समय खेटिके बा, बरखा डिन अइटि बा, जेलके डिन ओरइटि बा । ओट्ठेसे चन्डा उठैना अभियान ओरा गइल । ढिरे–ढिरे सक्कु ओरसे संघरियन आपन–आपन ओरसे सहयोग कर्टि गइलाँ । सगुन छुटेबेर कन्चनपुरसे कुलवीर चौधरी, दाङसे अशोककुमार चौधरी अइना सल्लाह रहे । मै भर उहाँ छुटनासे पहिलहि धनगढी पुगल रहुँ । छुट्नासे पहिलहिसे जो जेलमे भेटघाट करे जाउँ । भेट करेबेर जेल बाहर मिझ्नि खैना एकघरि कुल छुट्टी मिलिन । समय आइलमे वहाँ आपन ठाउँ जेल बिच घुस जाइट रहिँट । सगुनहे जेलमे फेन विसेस किसिमके छुट हुइल सुनगइल रहे ।  डोसर डिन छुटना सयम आइल टे दाङसे अशोककुमार चौधरी अइलाँ । कन्चनपुरसे कुलवीर चौधरी अइलाँ । सक्कु ओरसे टिनु संघरियन जुटलि टे आपन–आपन ओरसे पैसा जुटाके जेल प्रशासनहे बुझाके करट ढरट डिनभर लाग गइल, सन्झा हो गइल ।  सगुन साल भर परसे छुटलाँ कैह्के हम्रे जब जट्रा रहि विड्यार्ठि समेट सक्कु जाने मिल्के खान पिनके बेवस्ठा मिलैलि वहि धनगढीमे । सन्झाके खानापिन कइलि, राट बसेँरा वहि डेरामे बिटैलि । कोह्रि पुलिस राटभर हमार खबर लेटि रलाँ । बिहान बासि खाके सगुन, अशोक ओ मै डेरासे निकरके धनगढी बजार अइलि । कुलवीर भर विडावारि लेके अन्गुट्टे कन्चनपुर गइ सेक्ले रहिट । सगुनहे डि.एस.पी., सिडिओ घर जइनासे पहिले भेट कैके जइहो कलक ओरसे भेट करे गइलि । अब्बे डि.एस.पी. के नाउँ महि पटा नै हो । सगुनजिहे हुँकार कलक बाट महि याड बा, उहाँ कलाँ, ‘अपनेनके सरकार आ जाइ टे फेन कर्मचारि हम्रहि रहब । हम्रहिन अपने जेल सजा कैलकमे बरा डुःख बा । यि टे हमार कर्टव्य हो । सरकारके नोेन सोझ कैलक किल हो । सरकार जौन अर्हाइ, हम्रे उहे करब । मान लेउ अपनेक सरकार अइलेसे फेन हम्रे डोसरहे असहे करब । हम्रे टे डेसमे अमन चयन कइना जिम्मा पइले बटि । अस्टक सि.डी.ओ.हे फेन भेट करेबेर हाँठमे फुलाके गुच्छा डेके सम्मान साठ सगुनहे विडाइ कइलाँ । अन्टिममे धनगढी गौरीफन्टा ओर नेंगे गइलि हम्रे टिनु जाने । गौरीफन्टा टे«नमे चर्हलि गुलरिया चलाअइलि । उहाँसे सगुनके घर बर्दियाके बारबर्दिया नपा–१० (पहिले धधवार पन्चायत) अन्टर्गट सेमरहवा गाउँ पुग्गइलि । अपन मनै भेटैला टे घरक मनै बहुट फोहैलाँ । राटभर उहें रहलि । बिहान कलवा खाके विछिया हुइटि भारत बलरामपुर पुग्लि राट वहि रहलि । वहाँ कवला खाके बलरामपुरसे कोइलावास नेपाल हुइटि गढवा आ पुग्लि । अशोक भर देउखर गढवा, मानपुर मोर घर नै रुक्के सरासर दाङ, मघही चला गइलाँ । पाछेके बिच बिचमे थारू भाषा तथा साहित्य सुधार समिति पश्चिमाञ्चल (गोचाली परिवार २०२८) के कार्यक्रममे दाङ, बाँके, कैलाली, कन्चनपुर, सुर्खेतमे फेन सगुन सरसे भेट हुइटि रहुँ । हरेक सालके बैसाख १ गटे गोचाली डिवस मन्टि रहल समयमे पटक–पटक भेट हुइटि रहि । गोचाली भरिम सबसे लग्गुक लगउटि ढार कलक अक्लेश्वर चौधरी अरविन्द (मटेरिया) सगुनलाल सेमरहवा (बर्दिया) कालीराम चौधरी (मानपुर), महेश चौधरी (बैबाङ) यि चार जाने गोचालिनसे जिन्गिभर मिठे–मिठे निवाह गइल । किहुसे फेन कलह नै हुइल । मानो एक सिक्काके डुइ पाटा हस रहल रलहि ।  अब यि ३ गोचालि अरविन्द, महेश ओ सगुन हमार सँगे नै हुइट । सडाके लग विडा हो सेकल बटाँ । ट फेन मुटुके ढकढिउरिम हरडम रटि रहिहि । हमार मन मस्टिकमे जियल रहिहि । गोचाली आन्दोलनमे लागल मोरे गाउँक् कालीरामके पुरा सफलटाके सुभकामना कर्टि यि कलम बन्ड करटुँ ।    साभारः लावा डग्गर त्रैमासिक, बरस ७, अंक ४, (कार्तिक–पुस) २०७३ सगुनलाल २०५८ पुस १२ गते प्रशासनसे वेपत्ता पारगइल बटाँ । शीर्षकलगायत कुछ संशोधनसहित प्रकाशित ।–सम्पादक

भुलाई के मैथिली नै आबै छै

भुलाई के मैथिली नै आबै छै

२५३ दिन अगाडि

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९ पुष २०८२

भुलाई चौधरी २०२५/०२६ साल के बात चियै जब हम बिराटनगर के मोरंङ कलेज मे आई.एस्सी.मे परहैत रहियै वहै समय मे सप्तरी डिमन निबासी मीत भैया गंगाधर झा जे गजेन्द्र नारायण सिहं पार्टी के पार्टी प्रवक्ता रहै, ओकर सम्पर्क मे आईब के हमौ गजेन्द्र नारायण सिंह पार्टी से आवद्घ भ्या गेलरहियै ।  गजेन्द्र नारायण सिंह सप्तरी कोइलारी के निबासी रहै और उ पहिने नेपाली कांग्रेस मे रहै और जब वै पार्टी मे मधेसी प्रति कुछ विभेद देखल्कै त उ नेपाली कांग्रेस पार्टी से अलगे दोसर पार्टी खोलल्कै जे पार्टी वै समय मे गजेन्द्र नारायण सिंह पार्टी से परिचित रहै । एकदिन के बात चियै । गजेन्द्र नारायण सिंह के पार्टी के कोनो कार्यक्रम मे हमहुँ बाजलियै । अपना अनुभव भ्याल जे हम खौब नीक बाजलियै । मगर कुछेक समय मे प्रतिक्रिया सुने परलस गंगाधर झार मीत भैया बाजलै जे भुलाई के मैथिली नै आबै छै । सुइनके हमरा बहौत दुःख लागल । हम भैया के कहलियै जे भुलाई के मैथिली आबै छै कि नै, वै से कोन मतलब ? भुलाई चाहे आपने भाषा मे ने बाजेस बात त ई होना चाही जे भुलाई जे बाजलै उ ठीक बात चियै कि नै ? से बात त बाजवहक नै स बाजवहक केवल जे भुलाई के मैथिली नै आबै छै । यैठो मैथिली कते से येलै ?  वै दिन भैया, गंंगाधर झा के भाषावाला बात ल्याके हमरा बहौत दुस्ख लागल और हम वहै समय से गजेन्द्र नारायण सिंह के पार्टी छोइर देलियै । लगभग २०२९/०३० साल से थारु समाज मे सेहो थारु भाषा के संरक्षण, सम्र्बधन तथा विकासवाला चर्चा परिचर्चा बेसी हेबे लाग्लै । फलस्वरुप, २०३३ साल से महान्यायधिवक्ता श्री रमानन्द प्रसाद सिंह के प्रधान सम्पादन मे थारु संस्कृति परिवार के प्रकाशन मे थारु संस्कृति प्रत्रिका प्रकाशन हेबे लागलै । यैठो स्मरणीय बात ई छै जे उ पत्रिका थारु या थारु संघ संस्था संरक्षण केने हेतैै यै मे हमरा शंका लागैये । मगर बहौत मधेशी समुदाय सब वै पत्रिका के बहौत अंक सुरक्षित राख्ने छै ।  एक दिन हम कोनो काम विशेष से मीत विमल झा के घर राजबिराज मे गेल रहियै त गंगाधर झा/मीत भैया प्रकाशित भेलहा थारु संस्कृति पत्रिका के हरेक अंक देखे देने रहे आ तब वै दिन भैया गंगाधर झा फेन प्रतिक्रिया देने रहै जे भुलाई तुहँु सब मैथिलीये बाजै चहक । हमरा सब के बीच ई थारु भाषा सम्बन्ध मे छोट–मोट बहसो भेल रहे और हमर जवाफ रहै जे लगभग आई से १० वर्ष पहिने भैया वै दिन मिटिङ्ग मे तोहे ठीक बाजल रहअ जे भुलाई के मैथिली नै आबै छै । वै समय मे तोहर बात सुइनके हमरा रिस त रिसे उठल रहे । हमरा आशा रहे जे तोहे हमर कथन के समर्थन करवहक । मगर तोहे समर्थन कि करतियह रु उल्टे भुलाई के मैथिली नै आबै छै तै तर्फ बात के अलझ्याके  वहै ठाम हमर बात निर्मूल क्या देलहक । नतीजा ई भेलै जे हमरा तोहर सब के पार्टीये परित्याग करे परल । मगर फेन आई ई बात कते से येलै जे भुलाई तुहुँ मैथिलीये बाजै चहक । येबकीवेर कि राजनीति छअ रु जे कहै चहक भुलाई तुहुँ मैथिलीये बाजै चहक । ई त नै होना चाही ने । जब भुलाई कहे हम मैथिली बाजैचियै त तो कहक  भुलाई के मैथिली नै आबै छै आ जब भुलाई कहे जे हमरा मैथिली नै आबै छै त तोहे कहैचहक भुलाई तुहुँ मैथिलीये बाजै चहक । कोनो एक धार मे रह ने । सब बात तोरे सब के रु से आब नै चलतअ । थारु के ने कहियो मैथिली आबै छेलै आ ने अबैछै । सदैव वोकर मातृभाषा थारु रहै और अखुन्तो थारु के मातृभाषा थारु चियै । यै मे आब गलत  राजनीति नै चलतअ, कैहके वैठो से हम फेन आपन काम ले विदा भ्या गेलियै ।   सप्तरी, हालः पेप्सीकोला, काठमाडौं साभारः लावा डग्गर त्रैमासिक, बरस ७, अंक ४, (कार्तिक–पुस) २०७३

थारू मातृभाषामा पत्रकारिताः अनौठो सन्तुष्टी

थारू मातृभाषामा पत्रकारिताः अनौठो सन्तुष्टी

२६६ दिन अगाडि

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२६ मंसिर २०८२

सन्तोष दहित न त कुनै दाम छ, न कसैको कर। न त निश्चित भविष्यको कुनै भरोसा। तर पनि,  रातदिन यही यात्रामा तन्मय छु। कहिलेकाही आफैलाई प्रश्न  गर्छु,  जानेर लागेको हुँ कि नजानेर ? तर उत्तर भेटिन्न। लेख्दा, टाइप गर्दा, सेटिङ मिलाउँदा समयको होशै रहँदैन। कहिले रातको १ बज्छ, कहिले भाले कुकार्ने बेलासम्म । भोलिको भविष्य के होला ? के खानु, के लाउनु, कुनै ठेगान छैन। तर पनि एउटा अनौठो सन्तुष्टि अनुभूति हुन्छ । यही काममा, यही समर्पणमा। आज लौव अग्रासन साप्ताहिक १८ औँ वर्षमा प्रवेश गरेको छ। यदि यो समय कुनै सरकारी सेवामा बिताएको भए, आज रिटायर्ड हुने बेला नजिकै पुग्थेँ होला। कम्तीमा बुढेसकालको साहारा त हुन्थ्यो। तर मिडियाको यस यात्रामा न आफूका लागि आधार बन्न सकें, न परिवारका लागि। यद्यपि, आत्मसन्तुष्टि भने प्रचुर छ । किनभने यो यात्रा अर्थका लागि होइन, उद्देश्यका लागि हो। थारू भाषा, साहित्य र संस्कृति संरक्षण तथा प्रवर्द्धनको ध्येय बोकेर सुरु गरिएको लौव अग्रासन १७ वर्षअघि एउटा सानो बीज थियो। आज त्यो बीज १८ वर्षको दृढ रुखमा परिणत भएको छ। रचनाकार र स्तम्भकारको अभावका बीच पनि पत्रिका निरन्तर छापिनु आफैंमा ठूलो उपलब्धि हो। आज डिजिटल प्रतिस्पर्धाको युगमा छापा मिडियालाई जोगाउनु सजिलो छैन। त्यसमा पनि मातृभाषामा पत्रिका चलाउनु त फलामको चिउरा चपाउनु जस्तै हो। न पर्याप्त थारू स्तम्भकार छन्, न थारू  भाषामा लेख्ने पत्रकार। विज्ञापन पनि लोककल्याणकारी भावना बोकेका सीमित स्रोतहरूबाट मात्रै। कहिले त्यो स्रोत रोकिएला, अग्रासन बन्द होला । त्यो पनि  थाहा छैन। तर यथार्थ जस्तो भए पनि, हाम्रा संकल्पहरू अटल छन्। हरेक चूनौतिको सामाना गर्दै  लौव अग्रासन साप्ताहिकलाई निरन्तरता दिनेछौं  । हरेक मंगलबार नयाँ अंक छाप्नेछौं, खोजमूलक सामग्री ल्याउनेछौं, छापासंगै  डिजिटल प्लेटफर्म www.agrasankhabar.com  मार्फत दैनिक रूपमा समाचार र सन्देश पुर्‍याइरहनेछौं। अन्त्यमा, यो सुखद अवसरमा हामीलाई अहिलेसम्म साथ दिने सम्पूर्ण मैगर कबिला,  लेखक, स्तम्भकार, पाठक, विज्ञापनदाता र शुभेच्छुक सबैप्रति हार्दिक आभार र कृतज्ञता व्यक्त गर्दछौं। र, लौव अग्रासन साप्ताहिकका सम्पूर्ण परिवारतर्फबाट १८ औं वार्षिकोत्सवको यस अवसरमा सबैमा हार्दिक बधाई र शुभकामना !

कोपिलाके ‘हमार संस्कृति’मे एक लजर

कोपिलाके ‘हमार संस्कृति’मे एक लजर

२७९ दिन अगाडि

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१३ मंसिर २०८२

२०५९ सालमे मुक्तिक खोज उपन्यासमार्फत् थारू साहित्यके फँटुवामे पैला ढारल छविलाल कोपिला संयुक्त संग्रह लगाके दर्जनसे ढेर पोस्टा निकार सेक्ले बटाँ । उपन्यासबाहेक उहाँक आकुर पोस्टा खासकैके कविता बिधामे केन्द्रित बटिन् । उहाँ साहित्यकार व्यक्तित्वके अलावा पत्रकार व्यक्तित्वसे फेन परिचित बटाँ । आजकल लावा डग्गर त्रैमासिकमार्फत् साहित्यिक पत्रकारितामे उहाँक् पैला आगे बह्रल बटिन् । इहे सिलसिलामे उहाँक् ‘हमार संस्कृति’ नामक् खोजमूलक लेख संग्रह २०७१ वैशाखमे प्रकाशन हुइल बा ।  पत्रकारितामे लेख लिख्ना सिलसिलामे समसामयिक बिसयमे कलम चलैना एकठो बाट, मने पत्रकार मनै आपन लेखके छुट्टे संग्रह जो निकारेबेर सन्दर्भ स्रोतमे बहुट ध्यान पुगाइ परठ । यम्ने सन्दर्भ सामग्रीके उल्लेख हुइल बा । ओहेसे इ पोस्टा थारू सांस्कृतिक लेखके लग महत्वपूर्ण दस्तावेज ओ संग्रह करे लाइक बनल बा । इ पोस्टामे १९ ठो सांस्कृतिक लेख संग्रहित बा । थारू जातिनके लोकगीत, संस्कृति ओ गीतिसाहित्य सिर्सकके पहिला लेखमे ढेर बाट अँट्वइना प्रयास कइगैल बा । थारू समुदायमे लोकगीत कहटि कि गीतिसाहित्य ओस्टे आ जाइठ । उप्परसे संस्कृति बिसय जोरटि कि यकर फैलावट ओस्टे बह्र जाइठ । ओहेसे इ लेख कुछ छ्र्यासमिस लागठ । मने थारू समुदायमे गा जैना टिउहारगीत, ऋतुगीतलगायत मेरमेरीक गीत, नाचके बारेम कुछ आख्यान सहितके वर्णन लेखहे खोजमूलक बनैले बा ।  जहाँ सजना गैलेसे पानी बर्सठ्, सिर्सकके डोसर लेखमे गोरु बेह्रना चलनके बारेम उल्लेख बा ।  गोरु बेह्रना चलनहे कहुँ कहुँ गैया बेह्रना फेन कैह जाइठ । इ चलन कहियासे ओ कसिक चलल् ? यकर उत्तर खोज्ना प्रयास कैगैल बा । इ लेखके कमजोर पक्ष गोरु बेह्रेबेर गा जैना सजनाके सप्रसंग व्याख्या नइ हो । सजनामे जन्निन्के जौन बिरह बेदना रठिन, ओकर व्याख्या छुट्टे पोस्टा जो बन सेकठ ।  महाभारतके प्रारुप बर्का नाच टिसर लेखमे खास कइके डस्या ओ डेवारीम नाचजैना महाभारतके कथावस्तुसे जोरगैल बर्का नाचके बारेम बा । इ नाच आब केवल दाङदेखउर, घोराही उपमहानगरपालिका, जलौरा गाउँमे किल नाचजाइठ कना लेखकके कहाइ बटिन ।  मै सुनल अनुसार बर्दियाके उल्टनपुरमे फेन बर्का नाच कैना चलन रहे । बर्का नाचके बारेम कुर्ट मेयर ओ पामेला डुयल अंग्रेजी संस्करण महाभारतः द थारु बर्का नाच (२०५५) मे पोस्टा निकारके अन्तर्राष्ट्रियकरण कर्ले बटाँ । असिन आउर ढेर थारू लोकगीत, नाचके बारेम अन्तर्राष्ट्रियकरण करे पर्ना जरुरि बा । थारू समुदायमे भोज—वियाह ओ थारू समुदायमे भोंर—पैठ्ना चलन, इ छुट्टाछुट्टे लेखमे मेरमेरिक भोज कैना चलनबारे वर्नन बा । पहिला लेखमे ठोकौनिसे, विदाइ समके बाट ओ माँगरके चर्चा ढेर बा । डोसर लेखमे भोंर पेलल् बाबासे हुइल लर्कापर्का, भोंरपैठा स्वयम् अंशके दावेदार हुइ नइ पैना कानुनी समस्याके जटिललताके बारेम लेखक अंग्रेयइले बटाँ ।  छैठौसे बाह्रौ लेख थारू समुदायमे मनाजैना टरटिउहारके बारेम केन्द्रित बा । जेम्ने गुर्ही, अष्टिम्कि, अँट्वारि, डस्या  डेवारि, माघ ओ ढुर्हेरि मनैना चलनके बारेम खोज कैगैल बा । यम्ने थारू जलम संस्कार ओ मृत्यु संस्कार बारेम फेन छुट्टाछुट्टे चर्चा बा । टरटिउहार असिक मनैठाँ, ओसिक मनैठाँ कना छिछलि चर्चासे लेख कुछ उप्पर उठ्लेसे फेन थारू समुदायमे मनाजैना टरटिउहार आब् कसिक रंग बड्लटा ? उ बड्लाउ का अर्थ राखठ ? इ बारेम चिन्तन मनन कम बा ।  जस्टे कि माघ टिउहारके चर्चा । माघ डेवानिके भुरा खेलमे गाउँक् अगुवा बरघर चुनजैना प्रसंग टे यहाँ बा, मने थारू गाउँक् अगुवाइ आब गैरथारून्के हाँठेम् जाइटा । इ सवालमे बहस कर्ना कि नै कर्ना ? मुक्त होके कमैयन् गाउँक् अगुवाइ अपनेहे कैके सभासदसम बन्टि बटाँ । मने आम थारू अगुवन् बरघरमे किल सीमित बटाँ, ओइन चुनावमे गोटि किल बनाजाइटा । माघ डेवानिके अवसरमे आपन मुद्धा, आपन नेतृत्व इ सवालमे बहस कर्ना कि नै कर्ना ?  ओस्टक जरुरी बा– अष्टिम्कि, अँट्वारि, डस्या  डेवारि, माघ ओ ढुर्हेरिम बनाजैना परिकारके व्यावसायिकताके चर्चा फेन । लेखकके चिन्तन बटिन कि थारू समुदायमे विकृति बन्टि जाइटा जाँर डारु । इहे हो थारून् कमैया, कमलहरी बनुइया । महि लागठ, कुछ प्रतिशत यकर फेन हाँठ हुइ सेकठ, मने वास्ताविकता का हो कलेसे राज्यके नीति जो थारून् गरिब बनाइल, ओइनके मोहियानि हक सुरक्षित नै करल । ओइन मतवालीमे गरना करल । धर्म, थारू समाज ओ वास्तविकता इ लेखमे थारू जाति किल नाहि, अन्य समुदायके मनै फेन पुरान, रुढिवादी ओ अन्धविश्वासमे अन्धभक्त होके दुःख पैलक बाट उठागैल बा ।  थारून्के धर्म का ? यकर बारेम कौनो चर्चा नइ हो ।  थारू भासा ओे पत्रकारिताके अवस्था लेखमे लेखकके ठहर बटिन कि थारू भाषक् पत्रिका संख्यात्मक हिसाबसे ढेर प्रकाशन हुइल बिल्गैलेसे फेन गुणस्तर ओ निरन्तरताके हिसाबसे बहुट नाजुक अवस्था बिलगाइठ, इ सोह्रे आना सहि हो । मने हालसम कठेक थारू पत्रिका निक्रल, उ खुलाइल नइ हो । गुणस्तर ओ निरन्तरता कसिक कायम कर्ना यकर कौनो उपाय नइ सुझाइल हो । हमार कला, साहित्य ओ संस्कृति लेखमे बर्गीय साहित्यके चिन्तन बा । हाल आधुनिकताके नाउँमे संस्कृति परिवर्तनमे डेख्गैलक विकृतिक् बारेम टिस्लार प्रहार बा । थारू पहिचानके धरोहर जंगलकुट्टी  ऐतिहासिक पर्यटकीय क्षेत्रके परिचयात्मक जानकारि डेहल इ पोस्टाके पुछ्यावन लेख हो । मोर जानकारि अनुसार इ लेख कार्यपत्र हुइल ओरसे आउर लेखसे गरु बा ।  यम्ने संकलित लेख पहिले कहाँ कहाँ छपल रहे ? ओकर सुचि फेन डेहल रहट टे उचित हुइना रहे । कौनो कौनो लेखमे फोटु नइ हो । मने ढेरहस लेखके बिच बिचमे डेगैल फोटु पोस्टाहे आउर वजनदार बनैले बा, यद्यपि छपाइमे फोटु ढुमिल बा । फोटु मौलिक हो या औरे जन्हक साभार ? इ फेन अनिवार्य खुलाइक चाहि । काजेकि आब मनै अपन फोटुक कपिराइट खोजे लागल बटाँ । हमार संस्कृति इ पोस्टा मातृभासा थारूमे जो अनुसन्धानमूलक कृतिके लावा परम्परा बैठाइल ओर्से लेखक धन्यवादके पात्र बटाँ ।  अन्तमे, छविलाल कोपिला अनुसन्धानकर्मीके परिचय इ पोस्टामार्फत् उजागर कर्ले बटाँ ।  महि अस्रा बा, पत्रकारिता ओ साहित्यकारके पगरिसंगे अनुसन्धानकर्मीके पगरिहे उहाँ अइना डिनमे फेन निरन्तरता डिहिं । थारू समुदायके ढेर बखारि उहाँक् मनेम भरल बटिन । उ बखारिमे घुन लगैनासे आम पाठकमे बँटहि ओ खोजमूलक लेखनमे निरन्तर लग्हि, बहुट बहुट सुभकामना । ओ इ पोस्टाहे प्रकासनमे सहयोग करल आदिवासी जनजाति उत्थान राष्ट्रिय प्रतिष्ठान धन्यवादके पात्र बा ।  (पोस्टाके भूमिकासे, कुछ संसोढिट)  

संगीतमा ‘एआइ’को उच्छृङ्खल प्रयोगः कला, संगीत र साहित्यको अपमान

संगीतमा ‘एआइ’को उच्छृङ्खल प्रयोगः कला, संगीत र साहित्यको अपमान

२९१ दिन अगाडि

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१ मंसिर २०८२

                                           एआइबाट बनाइएको गीतकार महेश कुचिलाको ‘मान लेनु साथी टुहार’ बोलको थारु भाषाको गीतको भिडियोको दृष्य । सञ्जय सुमन आजको प्रविधिक युगमा कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) ले जीवनका धेरै क्षेत्रमा क्रान्ति ल्याइरहेको छ। तर सबै क्षेत्र प्रविधिद्वारा प्रतिस्थापन हुन उपयुक्त हुँदैनन्। तीमध्ये सबैभन्दा संवेदनशील क्षेत्र हो—गीत–संगीत। कलाको आत्मा मानवीय अनुभूति, साधना, र सांस्कृतिक चेतनामा बसेको हुन्छ। यिनै कारणले धेरैको दाबी छ कि गीत–संगीतमा एआईको प्रयोग गलत हो र यसले संगीत साधक तथा संगीतकर्मीको अवमूल्यन गर्छ।  संगीत केवल धुन र तालको संयोजन मात्र होइन; त्यो हृदयको संवेदना, पीडा, आनन्द तथा व्यक्तिगत यात्राबाट जन्मिएको कला हो। एआईले लाखौँ डाटाबाट नयाँ धुन ‘जेनरेट’ गर्न सक्छ, तर अनुभूतिद्वारा जन्मिएको संगीत सिर्जना गर्न सक्दैन। मानवीय आत्मा नभएको कलालाई वास्तवमै “संगीत” भन्न मिल्छ ? यही प्रश्नले एआई संगीतको वैधतामा शंका उत्पन्न गर्छ। एक संगीतकारले स्वर, ताल, लय, र प्रस्तुतीकरणमा पुग्न वर्षौँसम्म निरन्तर साधना गर्छन्। पछिको पुस्तालाई प्रेरणा दिने यही संघर्ष हो। तर एआईले एक क्लिकमा गीत सिर्जना गर्न सक्छ। यसले कलाकारको सीप, समय, मेहनत र समर्पणको मूल्य घटाइदिन्छ, किनकि बजार उत्पादनमुखी बन्दै जाँदा “द्रुत उत्पादन” लाई प्राथमिकता दिन थाल्छ। एआईले सिक्ने आधार फेरि मानवकै सिर्जना हो। एआईद्वारा बनेका धेरै गीत–धुनमा प्लेजरिज्मको जोखिम उच्च हुन्छ। मौलिकता कमजोर हुँदै जाँदा सर्जकको पहिचान ओझेल पर्न सक्छ। संगीत कला हो, तर एआईले संगीतलाई डाटा प्रवाह बनाइदिन्छ। न मौलिकता, न सांस्कृतिक आत्मा—कला केवल मिश्रणको परिणाम बन्न पुग्छ ।  संगीतकार, गीतकार, एरेंजर, कम्पोजर, स्टुडियो टेक्निसियन, सेसन प्लेयर—यी सबै पेशा मानवीय सर्जनात्मकतामा आधारित छन्। एआईले यिनका धेरै भूमिकालाई सस्तो, छिटो र ‘परफेक्ट’ भनेर प्रतिस्थापन गर्न थालेपछि हजारौँ कलाकारको रोजगारी प्रभावित हुन्छ। संगीतको बजारमा आर्थिक असमानता बढ्दै जान्छ—प्रविधि कब्जा गर्ने थोरै कम्पनी वा व्यक्ति फाइदा लिन्छन्, तर कलाकारहरू पछाडि धकेलिन्छन्। हाम्रो संस्कृति, लोककला, र परम्परा मौखिक र प्रयोगात्मक अभ्यास मार्फत बाँचेको छ। यदि एआईले भजन, लोकगीत, तीज, सोरठी, चौथी, अरनिको शैली, गण्डकी लोकधुन जस्ता परम्परागत स्वरूपलाई ढाँचाबद्ध मात्र बनाइदियो भने मनको भावना हटेर संस्कृति डिजिटल आर्काइभको वस्तु बन्ने जोखिम हुन्छ। मानिसले बनाई राखेको संगीतलाई मेसिनले पुनःपरिभाषित गर्न थाल्नु सांस्कृतिक क्षति हो । एआईले सिर्जना गर्ने गीतको उत्तरदायित्व कसको ? यदि धुन चोरी भयो भने ? यदि गीतले गलत सन्देश दियो भने ? कलाकारसँग नैतिक दायित्व हुन्छ; एआईसँग हुँदैन। यसले संगीतलाई जिम्मेवारीविहीन उत्पादन बनाइदिन सक्छ।

थारू पुस्तकमा पहिलो भूमिका अनुवादः  दंगीशरण बडकिमार गुरुबाबाकि जन्मौति (२०१६) 

थारू पुस्तकमा पहिलो भूमिका अनुवादः दंगीशरण बडकिमार गुरुबाबाकि जन्मौति (२०१६) 

२९६ दिन अगाडि

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२६ कात्तिक २०८२

२०१६ सालमा दाङबाट प्रकाशित भएको ‘दंगीशरण बडकिमार गुरुबाबाकि जन्मौति’ पुस्तक २०८२ सालमा पुनः प्रकाशन भएको छ । हालसम्म प्राप्त थारु भाषाको यो पहिलो पुस्तक हो । यसको भूमिका थारु तथा नेपाली भाषामा रहेको छ । उल्था हुबहु नमिले पनि थारू जातिको उत्थान कसरी होला ? शीर्षकमा थारू पुस्तकमा पहिलो भूमिका अनुवाद यही नै भएको लावा डग्गरको ठहर छः थारू जातिको उत्थान कसरी होला ? दुःख सकिये पछि सुख आउँछ । रात सकिये पछि दिन आउँछ । तर हाम्रा पछौटे जातिहरूको उत्थान कैले होला ? र कसरी होला ? भन्ने कुरा अझै राम्रो सँग खुल्न सकेको छैन । यसमा थारूश्र जाति प्रधान छ । थारू जातिको उत्थान कसरी होला ? भन्ने प्रश्नमा हाम्रो त उत्तर यो छ कि थारू जति मात्र होइन समस्त जातिको र राष्ट्रको उत्थान, जब सम्म आफ्नु यथार्थ मौलिक इतिहास प्रकाशमा आउँदैन, तब सम्म कसैको उत्थान हुन सक्दैन ।  तसर्थ प्रत्येकको आफनु–आफनु सत्य इतिहास खोजेर प्रकाशित गरि प्रचार गर्नु पर्छ । अनिमात्र उन्नतिको बाटो पैल्याउन सकियेला । यो काम सबैको साझो हो । यौटाले मरि मेटिये पनि होइ सक्दैन । यसो हुनाले सबैले मिलेर तन मन धनले आफनु जातीय काम गर्नु पर्छ । नत्र पछौटेका पछौटे नै रहुन पर्ला । इतिहास भनेको त्रिकालदर्शी दिव्यदृष्टि हो । शिलावंशावली, खण्डहर, किला, काँडा, क्रिया, कर्मकाण्ड, कथा, किंवदन्ती, लोकप्रसिद्धि, भजन, बडकिमार, छोटकिमार, अम्मारपाटी, गुरुवावाकी जन्मौति, सुरखेल, रामजनम्, रतनपारखूकथा, दङगीशरण कथा चाल, चलन, व्यवहार, वेष, भूषा, भाषा इत्यादि इतिहासका सामग्री हुन् । इनको सङग्रह सबै ठाउँ बाट गरेर सर्वाङगीण इतिहास लेखेर प्रचार गर्नु पर्छ । इतिहासका जगमाथि सबै तिरबाट सुधार गर्दै लग्नु पर्छ । अनिमात्र थारू जातिको र अरु कुनै जातिको उत्थान हुन सक्ला । राउटया आदि कतिपय जातिको इतिहास –इतिहास प्रकाशमा प्रकाशित भै सक्यो । परन्तु थारू जातिको इतिहास प्रकाशित भयेको छैन । अरुले लेखेको इतिहास साँचो हुन सक्तैन । तसर्थ समस्त थारूजति सँग अनुरोध छ कि आफनु कल्याण गर्नु छ भने माथिका कुरामा ध्यान दिउन् ।  अज भनौँ भने कतिपय हाम्रा थारू जाति भाइहरूमा आफना दँगाली थारू राजा दङगीशरण को कथा (इतिहास) सम्म पनि थाहा हुँदैन । जब सम्म आफनो जातिको इतिहासको सिंहावलोकन गरिदैन  तब सम्म उन्नतिको मार्ग लिन सक्दैन । थारू जाति अधिवासी हुन् । प्राचीन थारू राजा थिए भन्ने कुरा राष्टका इतिहासले प्रमाण साथ बताइ रहेको छ । यस युगमा पनि हाम्रा जाति भाइमा इतिहास तर्फ विचार भएन भने कति सम्म पछौटे जाति हुनु पर्ने हो भन्न सकिदैन ।  अनुरोधक                            प्रा.मं नियमनाथ महानुभाव बदरीनाथ                        दाङ १२/१२/१२    अनुवादः थारू जातिके उत्थान कैसिक होइ ? दुःख ओराइ तब सुख हुइत् । रात गैल से तय दिन आईट् । परन्तु हमार पाछे पीछरलक् जाति हमार के उद्धार कैह्या होई ? कैसिन होई ? कहलक बाट चुम्मर से खुलल नै हो । इहुर थारू जाति बडा वा । थारू जातिके उद्धार कैसी करके बनि ? कहलक बाटमा हमार कहना इह बाकी थारूके तैसन् बतक्वोई (इतिहास–कथा) नहि देख परि तब सम्म सक्कुके कैसिक जान परि । वह अलग अलग  आफन फुरफुर पुरान लिखलक सुनलक देखलक बाट खोजके सकुनक लाग देखाय परी, बुझाय परी, समझाय परी । तब ठुन्यार डगर मिली, चुम्मर–चुम्मर कमाही मिली । इ सज्या धन्दा सकुनक हो । एकल मनइ मुगइलसे फेन नइ हो सकी । ऐसिन आफन जातउद्धार धन्दा विचार कै के आफन तन मन धन से आफन जातीय धन्दा कर परी । नहि तो पाछक पाछ रह परि । इतिहास कहलक त्रिकालदर्शी दिव्य दृृष्टि कहल बा । शिलापत्र तामापत्र मुनापात्र चाँदिपत्र मुद्रा  लालमोहोर स्याहामोहोर वंशावली खण्ढहर किला काँडा क्रिया कर्मकाण्ड कथा किंवदन्ती लोकप्रसिद्धि भजन बडकिमार छोटकिमार अम्मार माटी गुरुवावाकि जन्मौति सुरखेल रामजलम् रतनपारखू कथा दंगीशरणकथा चाल चलन व्यवहार वेष भूषा भाषा सक्कु इतिहास सामान हुइत् । यकार सक्कु जमा कैके सक्कु आपन पुरान इतिहास लेखके सक्कु बाँट परि तबमात्र थारू जाति अउर फे उद्धार होई  । राउट्या जाति अउर के इतिहास–इतिहास प्रकाशमा प्रकाशित भइल । थारू जाति के इतिहास प्रकाश नइ भइल बा । अउर मनै के लेखल इतिहास सच्चा नै हुइत् । सकु थारू जाति सङ आग्रह हमार बा आपन जात उद्धार (कल्याण) करना मन बा तो उपर लिखल बाट माहा विचार करि । दाङ के थारू राजा दङगीशरण के बतखोइ (कथा) तुलसीकृत रामायन जैसीन हमार सङ मीलल बा, उसके प्रकाशन न करके नइ हुइना बा ।  योगप्रचारिणीतः                         प्रकाशक प्रचारको संवत् २०१२                             म.भा. बदरीनाथ योगी शिवरात्रि                            प्रा.मं. नियमनाथ योगी   नोटः पुस्तकको भूमिका थारूबाट नेपालीमा अनुवाद कार्य भएको थियो । भूमिकामा उल्लेख भए अनुसार पुस्तक छाप्न २०१२ सालमै तयारी थियो । अनुवाद हुवहु भने मिल्दैन । यसको भाषा डंगौरा भन्दा अवधी मिश्रित छ । त्यसैले यो अनुवाद कुनै थारू स्रष्टाबाट नगराई योगीद्वय स्वयमले गरेको बुझिन्छ ।