बुढनी लोकबट्कोही उपन्यासमे आके थारु भासा संरक्षणमे सहयोग पुगल एक कार्यक्रमके सहभागीहुक्रे बिचार ढैले बटै ।
लोककथामे आधारित इन्दु थारुसे थारु भासामे उल्ठा करल बट्कोही ‘बुढनी’के २८ असार शनिच्चरके रोज धनगढीमे हुइल समिक्षा कार्यक्रममे सहभागीहुक्रे टिप्पणी करटि इ किताबमे हेरैटि रहल लोककथा ओ लोप हुइटि थारु भासा, शब्दके संरक्षणमे सहयोग पुगल बटाइल रहिट ।
थारु कल्याणकारिणी सभा कञ्चनपुरके सभापति सुनिता चौधरी ‘सानु’ बुढनी बट्कोहीमे एकठो सघर्षशिल जन्नी मनैनके खिस्सा जोरल बटैलि । उहाँ कहलि, “एकठो डाइ मनै आपन लर्कापर्का, परिवारमे कौनो विपट ना आए कना चिज समेटल बा ।” यकर संगसंगे हमार पुर्खनके बोल्ना थारु शब्द लिखल बेलसगिल बा, जौन अब्बेक लौवा पिढी विस्राई लागल बटै ।
उ बुढनी बट्कोहीमे थारु समुदायसे बेल्ना रुख्वा बरिख्वा, चिरैचुरङगन, किराकाँटीनके नाउँ उल्लेखसे हमार भासा मौलिक शब्दके संरक्षणमे सहयोग पुगल सभापति सानु बटैलि ।
जानकी गाउँपालिकाके अध्यक्ष गणेश चौधरी अब्बे लोकखिस्सामे आधारित बट्कोही सुन्ना ओ सुनुइया मनै कम हुइटि गैल बटैलै । उहाँ कहलै, “इ किताबके खोलमे उल्लेख हुइल थारु समुदायसे मनाजैना अष्टिमकी चित्र हँठिया, घोरुवा, हर्ना, मञ्जोर, पाँच पाण्डव, चिरैयाके चित्र, थारु नाउँ जोरल बुढनी बट्कोही थारु समुदायके पहिचान झलकल बा ।”
उहाँ कहलै, “किताव पह्रुइयनके संख्या घटटी गैल बा । मने मै इ किताव पह्रेबेर थारु समुदायसे बेल्सना मौलिक भासा, शब्द पैनु । पहिले पहिले थारु समुदायहुक्रे ज्ञानगुनके रुपमे लेजैना बट्कोही सुनाइट, मैं यम्ने उहे इतिहासके उल्लेख हुइल पैनु ।”
ओस्टेक, करके बुढनीके समीक्षा करटि बाँधुराम हरडिउला कुश्मी हेरैटि रहल लोकखिस्साहे जिवन्त ढैना सहयोग पुगल बटैलै । इ बट्कोहिसे जन्नी मनै शसक्त हुइ परठ कना सन्देश डेहल फे बटैलैं ।
लोककथामे आधारित थारु भासामे उल्ठा बुढनी बट्कोही उल्ठा करुइया इन्दु थारु बुढनी बट्कोही काल्पनिक रहल मने थारु समुदायके जन्नी मनैसे भोगल परिस्थितिमे आधारित खिस्सासे जोरल बटैलि ।
बुढनी उपन्यासके मुल लेखक प्रविण अधिकारी हुइट । उहाँ अंग्रेजी भासामे लिखल पोस्टाहे इन्दु थारु थारु भासामे उल्ठा कर्लि, जेकर सम्पाडन छविलाल कोपिला कर्ला । पहुरासे

प्रकाशित:
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२९ असार २०८२
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